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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 136 में से

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१८८ क्षेमकुतूहलम्
नवनीत फेणिका
क. विधि- दुग्ध (दूध) में स्विन्न (उबाले हुए) मुद्र (मूँग) दाल्वि, को तण्डुल के
साथ भिष्टी (पिट्टी) बनाकर, नवनीत (मक्खन) तथा दधि (दही) मिश्रित कर
वटक बना लेते हैं, फिर इनको तप्त घृत में पका कर रखते हैं। इन वटकों को
बाहर से खण्ड चूर्ण (पिसी शर्करा) से उद्धूलन किया जाता है।
ख. गुण-कर्मादि- नवनीत तथा दुग्ध से युक्त मृदु फेनिका के गुण इस प्रकार हैं-
१. वातपित्त हरा (वातपित्त नाशक) २. बल्या (शरीर बलवर्धक)
३. स्निग्ध (मोहयुक्त चिकनी) ४. शीत (शीतल)
५. अति पुष्टिदा (अत्यन्त पुष्टिदायक)
अथ माषफेणिकानिर्माणं गुणाश्च
निस्तुषां माषविदलां सूक्ष्मा द्विस्त्रिस्तु पेषयेत्।
शिलायां पिष्टितामित्थं नवनीतेव संयुताम्॥ ११॥
छागचर्ममयोपेते छिद्रिते पूरितां दृढम्।
घृतपूर्णभाजनस्य तप्तस्योपरि भ्रामयेत्॥ १२॥
पूरिता तेन छिद्रेण सा षिष्ठी धारया घृते।
पतिता पच्यते स्वच्छा ह्रस्वा पक्वा प्रपूरिणी॥ १३॥
वर्तुला चसुरस्त्रा वा दीर्घा वा फेनिका ततः।
प्रलेपयेद्बहिर्भिश्चन्नं पक्वखण्ड धारया॥ १४॥
माषपिष्टभवा फेणी गुर्वी स्निग्धाऽतिवातहा।
उष्णा संतर्पणा बल्या शुक्रस्थूलत्वकृत्सरा॥ १५॥
माष फेणिका
क. विधि- माष (उड़द) की दाल (मिस्तुषां माष विदलाम्)- जिसमें भूसी नहीं हो
तथा महीन (सूक्ष्मा) दो-तीन बार पाषाण पर पिसी हुई (द्विस्त्रिस्तु पेषयेत् शिलायां
पिष्टितामित्थं) लेते हैं; इस दाल की पिट्टी में नवनीत (मक्खन) मिश्रित करते
हैं, जिसको छागचर्म की थैली (द्वारा चर्ममयोपेते छिद्रिते) में पूर्ण करके तथा
दृढ़ता पूर्वक पीड़ित करते (पूरितां दृढ़म्) हुए, तप्तघृत से परिपूर्ण भाजन
(घृतपूर्ण भाजनस्य तप्तस्योपरि) पर घास रूप में घुमाते हैं (भ्रामयेत्)। इस रीति
से पिष्ट (थैली से निकल कर- घी की कड़ाही (कटाह या उपयुक्त-पात्र अग्नि


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दशमोत्सवः १८९
पर स्थापित) में गिरकर पकने पर स्वच्छ तथा खिंता जाती है (पतिता पच्यते
स्वच्छा ह्रस्वा पक्वा प्रपूरिणी); वह वर्तुल, चौकोर या लम्बी-विभिन्न आकारो में
फेनिका बन जाती है; तदनन्तर इसको बाह्य रूप से पक्व खण्ड (चाशनी) का
प्रलेपित किया जाता है। इस प्रकार 'माषफेनिका' का निर्माण हो जाता है,
(जिसका लोक परम्परा में 'इमरती'- इमिरिती भी कहा जा सकता है) वह
माषपिष्टभवा फेणी' का मिष्ट व्यंजनों (मिठाइयों को संमिलित है।
ख. गुण-
१. गुरु (भारी-दुर्जर) २. स्निग्ध (चिकनी/अन्तः स्निग्धता कारक)
३. अतिवातहा (अत्यन्त वातनाशक)
४. उष्णा (गर्भ) ५. संतर्पणा (तर्पणकारी)
६. बल्या (शरीर को बलप्रदायक)
७. शुक्रस्थूल कृत् (शुक्र-वीर्य में सान्द्रताकर)
८. सरा (सुखविरेचक)
अथ लड्डुकप्रकारः
प्रथमं दधिलड्डुकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
वस्त्रान्निर्गल्य पिष्टं तु शालेस्तरयुतेन तु।
दध्ना सेवा घृते पक्त्वा मेलयेद्दलितां सिताम्॥ १६॥
दधिशालिभवं मेध्यं लड्डुकं पित्तनाशनम्।
बल्यं वातहरं हृद्यं विशेषाद्दाहनाशनम्॥ १७॥
लड्डू प्रभेद
दधि लड्डुक
क. विधि- शालि (चावल) की पिष्टी-दधि मिश्रित-को वस्त्र से छानकर, सेव की
आकृति में बनाते हैं तथा घृत में (डालकर) पका लेते हैं तथा इसमे सिता
(शक्कर-बूरा) को मिलदिते हैं। इस प्रकार 'दधि लड्डू' का निर्माण करते हैं।
ख. गुण-
१. मेध्य (मस्तिष्क बल/कार्य शान्तिवर्धक) २. पित्तनाशन (पित्तशामक)
३. बल्य (शरीरबल दायक) ४. वताहर (वायुनाशक)
क्षे. कु. 13