क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ १
अथ नवमोत्सवः
(नौवा प्रकरण)
अथ संधानकम्
राजिकाजीरलवणनिशाढ्ये कटुतैलके।
फलं मूलं च पुष्पं च घर्मे स्थाप्यं दिनत्रयम्॥ १॥
ततश्चाम्लतरं जातं शीघ्रं संधानकं स्मृतम्।
संधान विधि
राजिका (राई) जीरक (जीरा), लवण (सेंधानमक) तथा निशा (हरिद्रा-हल्दी)- इन
समस्त द्रव्यों को सम्मिलित करके, कटु तैल (सर्षप तैल-सरसों के तैल) में, फल (जड़),
मूल (कन्द) जड़। तथा पुष्प (फूलों) को डालकर, दिनत्रय (तीन दिनों) की अवधि तक
घर्म (सूर्य की रोशनी-किरणों के प्रकाश) में स्थापित कर देते हैं। इस प्रकार, यह मिश्रण
अम्लतर (अधिक अम्लयुक्त-अधिक खट्टा) ही जायेगा। इस मिश्रण को 'संधानक' या
संधान कहा जाता है॥११/२॥
निम्बाम्रबिम्बिवार्ताकमार्द्रकं त्रपुषीफलम्॥ २॥
कूष्माण्डबिल्वमरिचं पिप्पलीविशतिन्दुकम्।
सूरणं कदलीकन्दो मूलकं बंसजाङ्कुरः॥ ३॥
इत्यादिबस्ततजातं हि सन्धेयं दृष्टकर्मणा।
वार्ताकं तेषु सुस्वेद्य सन्धेयं चान्यदामकम्॥ ४॥
एवं निम्बादिकं सर्वं कटुतैले विनिक्षिपेत्।
स्थापयेद्वर्षमात्रं तु तदूर्ध्वं नैव युज्यते॥ ५॥
विभिन्न द्रव्यों का संधानक
१. निम्ब (नीम) २. आम्र (आम) ३. निम्बी (कन्दूरी)
४. वार्ताक (बैंगन) ५. आर्द्रक (अदरक) ६. त्रपुषीफल (खीरा)
७. कूष्माण्ड (कुंहड़ा) ८. बिल्व (बेल) ९. मरिच (काली मिरच)
१०. पिप्पली (छोटी पीपल) ११. विश्वा (सोंठ) १२. तिन्दुक (तेंदू)
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१३. सूरण (जिमीकन्द) १४. कदली कन्द (केला) १५. मूलक (मूली)
१६. वंशजाङ्कुर (बाँस अंकुर)
इन द्रव्यों का संधान करने हुए, जिस व्यक्तियों ने इस विधि का प्रत्यक्षकर्म
(दृष्टकर्मणाम्) का अभ्यास किया हो या अवलोकन (प्रत्यक्ष कर्माभ्यास) कर रखा हो,
उसके द्वारा (या संधान कर्म ज्ञाता के निर्देशन) संधानक तैयार करना चाहिए।
इस संधान कर्म में वृन्ताक (बैंगन) को सुस्वेद्य (उबाल कर अल्प स्वेदन) करके
प्रयोग करते हैं, जबकि अन्य द्रव्यों (१-१६) को आमरूप (कच्चा-अस्वेद-बिना
उबाले हुए) प्रयोग किया जाता है।
इन समस्त द्रव्यों (उपरोक्त नामांकित-१-१६) की कटु तैल (सर्षप तेल-सरसों
के तैल) में डालकर, एक वर्ष की अवधि पर्यन्त स्थापित कर देते हैं। (एक साल तक
रखा रहे)। तदुपरान्त इस 'संधानक' की प्रक्रिया पूर्ण होने पर उपयोग में लाते हैं, परन्तु
इस (संधानक को) एक वर्ष के उपरान्त (एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर) करने का निर्देश
(अनुमति) नहीं है॥२-५॥
अथ लावासन्धानकम्
लावकान् मत्स्यखण्डान् वा स्वेदयेदिक्षुजे रसे।
कृत्वा फाणितमध्ये तु तैले वा सर्षपोद्भवे॥ ६॥
स्थापिताः सर्वकालं तु तिष्ठन्ति वै हि तादृशाः।
लावासंधानक
लावा (पक्षी) का मांस या मत्स्य (मछली) के खण्डों (टुकड़ों) को इक्षुरस (गन्ने
के रस) में स्वेदन (उबाल) कर, फाणित (राब) के बीच (मध्य) में अथवा सर्षपोद्भूत
(सरसों के) तैल में रखते हैं। इसको इस विधि से स्थापित करने से अपने स्वरूप में
ही सदैव रहते हैं (स्थापिताः सर्वकालं तु तिष्ठन्ति वै हि तादृशः)॥६१/२॥
अथ तित्तिरिसन्धानम्
स्विन्नन्निर्गलिते दध्नि तैले पक्त्वाऽथ तित्तिरिम्॥ ७॥
तदेव तैलसंयुक्तं निम्बुकस्य रसे न्यसेत्।
तित्तिर संधानक
तित्तिर (तीतर) के मांस (के टुकड़ों) को दधि (दही) में उबाल करते हैं, तथा