क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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छानकर तैल में पाक करते हैं तथा फिर निम्बूक स्वरस में मिलाकर रखा रहने देते
हैं।।७^१/_२।।
अथ वाराहब्रध्नसन्धानम्
वाराहाजिनमुद्धृत्य निशाराजिसैन्धवैः ॥ ८ ॥
तीक्ष्णे घर्मेऽतिसंशुष्कं क्षालितं हिङ्गुसंयुतम् ।
सनिम्बकरसं शुष्कं क्षिपेत्तैले सनिम्बुके ॥ ९ ॥
वाराहब्रध्न संधानक
वाराह (सूअर) के मांस-त्वक (चमड़ा निष्कासित-अजित) रहित करके-प्रक्षालन
कर, शुष्क कर लेते हैं; फिर हिंगु, हरिद्रा, राजिका तथा सैंधवलवण मिलाकर तीक्ष्ण
घर्म (तीव्रधूप) में रखकर; शुष्क कर (सुखा) लेते हैं, तथा निम्बूक स्वरस को
मिलाकर, फिर शुष्क कर लेते हैं। इसके बाद मांस को निम्बूक स्वरस सहित, तैल में
डालकर रखते हैं।।८-९।।
अथ मत्स्यसन्धानकम्
खण्डा मत्स्यस्य तैलेन सुपक्वाः कोष्ठासंभवाः।
स्थापिताः सार्षपे तैले सदा तिष्ठन्ति तादृशाः ॥ १० ॥
सर्वं पित्तकरं प्रोक्तं सन्धानं रुचिकारकम्।
वातहृद्द्रस्तुभेदाच्च संविचार्य गुणागणम् ॥ ११ ॥
मत्स्यसंधानक
क. विधि- मत्स्य (मछली) के कोष्ठांगों के खण्डों (टुकड़ों) को सर्षप तैल में
भलीभांति पक्व करके, इसी तैल में स्थापित कर देते है, जिससे वह एक समान
ही रहेगा।
ख. मत्स्यसंधानक-गुण-कर्म
१. समस्त संधानीय द्रव्य पित्तकारक (सर्वं पित्तकरम्), रुचिकारक, वातहृत्।
२. द्रव्यों के भेद-गुण तथा दुर्गुण (गुणागुणम्) विचारणीय (संविचार्य)
अथ वटिकावटकप्रकारः
अथ पिष्टशुष्कवटी
तप्ततैले विनिक्षिप्ता वटिका माषपिष्टजा ।
नवमोत्सवः १७३
तलिता तक्रसिक्ता च शुष्कीकृत्य प्रचालिता ॥ १२ ॥
अथवा क्वथिते तक्रे सर्वोपस्करसंयुते ।
मांसप्रलेहवत्पाच्या वटी पिष्टसमुद्भवा ॥ १३ ॥
वटिकावटक प्रकार
पिष्टशुष्कवटी- माष (उड़द) की पिष्ट (पिट्ठी) बनाकर तप्त तैल (सरसों के
तैल) में डालकर तलन करें (तलते हैं)। इसकी तक्र (मट्ठा) में डाल देते हैं, अथवा
शुष्क करके (सुखाकर) कर रखते हैं। इसमें सर्व उपस्कार (मसाल), लवण आदि-
हिंगु, तैल आदि सहित) मिलाते हैं। इसको क्वथित (उबाले हुए) तक्र (मट्ठे) में मिश्रण
करके, प्रलेह विधि के अनुसार पाक किया जाता है। इस निर्माण को 'पिष्टवटी'
कहते हैं।
अथार्द्रपिष्टवटी
तैले पक्त्वा वटीं तप्ते रन्धयेद्वेसवारकैः।
सर्वद्रव्यसमायुक्तैर्वटीतुल्यं च रन्धयेत् ॥ १४॥
आर्द्रपिष्ट वटी
माष (उड़द) की पिष्ट (पिट्ठी) तैयार करके, गर्म (तप्त) तैल में डालते हैं, इसमें
वेसवार (मसाल, लवण तथा हिंगु सहित) पाक करते हैं, अथवा समस्त द्रव्यो का
मिश्रण करके, वटी के समान पाक करना चाहिए।।१४।।
अथ धूमांसी वटिका
धूमांसीवटिकाऽप्येवं स्थूला तैलेन पाचिता ।
मेलिता संस्कृते तक्रे क्वथिते च मनोरमे ॥ १५ ॥
माषस्य वटिका हृद्या बल्या पुष्टिप्रदायिनी ।
वातहच्छुक्लला सा च तलिताऽथ प्रलेहिता ॥ १६ ॥
धूमांसी वटिका
धूमांसी (पंचांग) को ग्रहण-स्वच्छ करके वटी तथा वटिका का निर्माण किया
जाता है (इसके लिए पूर्ववत् विधि के अनुसरण करना चाहिए। इसको तप्त तैल में
पका लेने हैं, तथा राजिका, हिंगु, लवण आदि सहित, क्वथित (उबाला हुआ) मनोहरी
तक्र (मट्ठे) में मिला देते हैं। यह पदार्थ तैयार हो गया है- भोज्य द्रव्य के रूप में
उपयोगी है।
क्षे. कु. 12