सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 94

१८२
क्षेमकुतूहलम्
बाह्लीकधूमाकूलपात्रमध्ये
सराजिके वारि किरेदणीयः।
तत्रारनालोदरपूर्णवर्ती
सराजिकोऽयं वटकः पटीयान् ॥ ४५ ॥
सराजिक वटक
साजिका जल (सुगन्धित हिंगु धूम से सुवासित) से परिपूर्ण पात्र के बीच में
वटक बड़े (आकृति में छोटे) डाल देते हैं। इस तरह से आरनाल (काँजिक) से परिपूर्ण
'सराजिक वटक' का निर्माण हो जाता है॥४५॥
तुषाम्बुवटकों हृद्यो वातजिद्रुचिकारकः।
रक्तपित्त करश्चोष्णास्त्वहितो नेत्ररोगिणाम् ॥ ४६ ॥
तुषाम्बु वटक
तुषाम्बु वटक के प्रयोग करने से गुण-कर्म इस प्रकार हैं—
१. हृद्य (हृदय के लिए बलदायक)
२. वातजित् (वातनाशक)
३. रुचिकारक (रोचन-रुचिवर्द्धन)
४. रक्तपित्तकर (रक्तपित्तकारक)
५. उष्ण (उष्णवीर्य)
६. अहितकर-नेत्ररोग (अचक्षुष्य)
अथाश्चर्यवटक निर्माणं गुणाश्च
कणान् गोधूमानामपगततुषाभां सुरभिते
जले बद्ध्वा वस्त्रे परिलघु निदध्याद्दिनयुगम्।
ततस्तोये तस्मिल्लवणमुखकुक्षिम्भरियं
स्थितः पक्षं यावद्भवति रुचिदाश्चर्यवटकः ॥ ४७ ॥
आश्चर्यवटकस्तृप्तिकारकौ रुचिकारकः।
वातहृद्यावकः सद्यः पित्तकृच्छोफकारकः ॥ ४८ ॥
आश्चर्यवटक
क. विधि- तुष विहीन गोधूम कण (भूसी निकले हुए गेंहूँ के दानों) को (कणान्
नवमोत्सवः १८३
गोधूमनामपगततुषाभां सुरभिते) पतले कपड़े में बाँधकर सुरभितया सुगन्धयुक्त जल
में (जले बद्ध्वा वस्त्रे पीरलघु) दो दिवस (निदध्याद्दिनयुगम्) तक रखा रहने देते
हैं, इसमें लवण के समान मुखकुक्षिमभारियम्)। इसको एक पक्ष पर्यन्त स्थित रहने
देते है (द्रव क्षिप्त वटक); अन्ततः 'आश्चर्य वटक' का निर्माण, सम्पन्न हो जाता
है। जोकि रुचिद (स्वयं तथा भोजन में रुचिवर्द्धक) प्रमुख गुण-युक्त होता है।
ख. गुण-कर्म
१. तृप्तिकारक (भोजन में आ वटक खाने से तृप्ति देनेवाला)
२. रुचिकारक (रुचिवर्धक)
३. वातहृत् (वातनाशक)
४. सद्य पित्तकारक ] (दृष्टव्य सं. ६)
५. शोथ कारक
६. यावक (यव/जौ से निर्मित वटक सद्य पित्तकारक तथा शोथकारक)
अथ चिञ्चावटकनिर्माणं गुणाश्च
शैलपचेलिमचिञ्चा
जलगुडगुलितो मरीचसंपृक्तः।
प्रविशति चिञ्चावटकः
सुकृतिनमेवाननं रुचिकः ॥ ४९ ॥
चिञ्चेयवटकस्त्वम्लो पित्तकृद्रुचिकार्कः।
मधुरो बातहृद्बल्यः पित्तकृच्छोफकृत्सरः॥ ५० ॥
चिञ्चा वटक
क. विधि- चिंचा रस- जो पर्वतीय क्षेत्रो में उत्पन्न होने इमली के वृक्षो से संग्रहीत
फलों को रस (शैलेय चेलिमचिञ्चा) में गुड़ तथा मरिच चूर्ण मिलाकर, वटक को
प्रक्षिप्त कर देते हैं- यह 'चिंचा वटक' को तैयार करने की प्रक्रिया सम्पन्न
(सरलता से) हो जाती है।
ख. गुण-कर्म-वैशिष्ट्य- यह 'चिंचा वटक' सुकृतियो शुभकार्य करते वालो के
मुख में प्रवेश करता है। (प्रविशति चिञ्चावटकः सुकृतिन मेवाननम्) अर्थात्
भाग्यशाली व्यक्तियों का चिंचा वटक सेवन का अवसर मिलता है। इस वटक
(माष या मुद्ग से निर्मित तथा तैल में तलित) को चिंचारस में प्रक्षेपण करके