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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 136 में से

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पृष्ठ 90

१७४ क्षेमकुतूहलम्
क. माष वटिका (कर्म-गुण) - माष (उड़द) की वटिका के विशिष्ट गुण निम्नोक्त हैं:
१. हृद्य २. बल्य ३. पुष्टिप्रदायिनी
४. वातहृत् ५. शुक्रत्
ख. विधि- यह वटिका को तल कर (तलित) या प्रलेह बनाकर प्रयोग करते हैं। इन
दोनों भेदों (प्रकारों) में माष वटिका तथा माष प्रलेह-के गुण-कर्म लगभग एक
समान (जो उपरोक्त हैं) होते हैं॥१५-१६॥
अथ माषपिण्डेण्डरी
माषस्येण्डरिकां कृत्वा खण्डशः सैन्धवान्विताम्।
रन्धयेद्वेसवारेण तैले पक्वा वटीसमाम्॥१७॥
माषपिण्डेण्डरी (माषेण्डरी)
सैंधव लवण युक्त मांस (उड़द) की इण्डरी (विशेष आकार के कारण नामकरण)
को खण्ड (टुकड़ा-टुकड़ा) करके बनाते है- तैल में वटी के पाक करें- मसाला
मिलाकर पकाते हैं। इसको 'भाषस्येण्डरिका' कहा जाता है॥१७॥
अण्डरी शुक्रदा वृष्या रूक्षा विष्टम्भकारिणी।
कफवातहरा प्रोक्ता माषपिष्टभवेण्डरी ॥१८॥
मुद्गपिष्टिकयाऽप्येवं विधाय वटिकां वटीम्।
तप्ततैले वेसवारसंयुक्ते रन्धयेद्वटीम्॥१९॥
माषपिण्टेण्डरी
क. माष की इण्डरी, शुक्रदा, वृष्या, रूक्षा, विष्टकारिणी तथा कफवातहर होती हैं
(उड़द की वटी/वटिका या बरी-बड़ी/ वाड़ा-बारा)।
ख. मुद्ग (मूँग) की पिष्टी (पीठी-पिट्ठी) से वरी या वटिका बनाकर, (उपरोक्त रीति
से), तप्ततैल में बेसरवार (लवण सहित) पाक करते हैं (रन्धयेद्वटीम्)।
अथ मुद्गेण्डरी
बाल्हीकजीरकनवार्द्रकपूर्णगर्भा
बाह्ये जातपचना नवमुद्गपिण्डा।
चूर्णीकृता सुरभिहिङ्गुकृताधिवासा
मन्दानलस्य रुचिदा न भवेत् कस्य॥२०॥


नवमोत्सवः १७५
मुद्गस्य बहुधा भक्ष्याः शीतला लघुपाचकाः।
त्रिदोषशमनाः प्रोक्ता रुच्याः संस्कारयोगतः॥२१॥
मुद्गेण्डरी
क. विधि- नव मुद्ग पिण्ड (मूँग से बने नये पिण्ड) में हिंगु, जीरक तथा नवार्द्रक
को पूरण करके, बाह्यरूप से पाक कर लेते हैं। तथा इसको चूर्ण (उद्घूलन)
द्वारा सुगंधित पदार्थों से सुवासित कर देते हैं।
आफ. यह (इस रीति से) निर्मित द्रव्य किसकी मन्दाग्नि की प्रदीपक नहीं
होता- इसका तात्पर्य है कि यह समस्त व्यक्तियों की पाचकाग्नि की वृद्धि
(दीपन) करने का कार्य करता है, विशेषरूप से जिन्हें मन्दाग्नि हो जाती है
(मन्दानलस्य रुचिदा न महेत्तु कस्य)।
ख. गुण-कर्म- विविध प्रकार के भक्ष्य पदार्थों के पाचन में सहायक एवं लघु,
(सुपाच्य), शीतल, लघु पाचक (पचने में हल्का या सुपाच्य), त्रिदोषशामक
तथा रुचिवर्धक होता है, यह संस्कार योग की गुण रखता है अर्थात् अन्य द्रव्यों
के संयोग से, उनके गुणों का ग्रहण करता है॥२०-२१॥
अथालीकमत्स्येण्डरीनिर्माणम्
नागवल्लीदलं ग्राह्यं वेसवारेण लेपितम्।
माषपिष्टकया लिप्तं संप्रसार्य समावृतम्॥२२॥
स्विन्नमाखण्डितं तैलं भृष्टं हिङ्गुसमन्वित्।
रन्धयेद्वेसवाराम्लैरलीका मत्स्यका इमे॥२३॥
अलीकमत्स्यका रुच्या बल्या वृष्यातिपुष्टिदाः।
वातहृच्छुक्रलाः प्रोक्ताः किञ्चित्पित्तप्रकोपकाः॥२४॥
अलीकमत्स्येण्डरी
क. पान-ताम्बूल (नामवल्लीदल) के पत्र पर वेसवार (मसाले) का आलेपन करते
हैं, फिर माप-पिष्टी (उड़द की पिट्ठी) का मोटा लेप (फैलाकर-लपेटकर) लगाते
हैं, (लिप्तं प्रसार्य समावृतम्), तदनन्तर, इस (पान के पत्ते) को स्विन्न (उबालकर)
करके खण्डित (टुकड़ा-टुकड़ा) कर लेते हैं। तत्पश्चात् उसको तप्त तैल में,
हिंगु का लेप लगाकर (भृष्ट) भूनते हैं, फिर इसमे वेसवार तथा चिंचा चूर्ण
मिश्रित कर पकाते हैं।