क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ क्षेमकुतूहलम्
१. कफघ्न (कफनाशक)
२. लघु (सुपाच्य)
३. दीपन (जाठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला)
४. शीतल (शीत कारक)
५. रूक्ष (रूक्षता कारक)
६. विष्टम्भी (दुर्ज्जर-विवन्धकारक)
७. वातकृत् (वात उत्पन्नकर्त्ता)
८. पुंसखनाशन (पौरुष हेतु हानिकर)
अथ वटकप्रकारनिरूपणम्
माषपिष्टिकया कृत्वा बृंहणाः वटकास्ततः।
अनल्पतैलसंपक्वा मेलिता घोलके रसे॥३२॥
कार वटक
माषपिष्टी (उड़द की पिठ्ठी) के बड़े वटक बनाकर, अल्प तैल में पकाकर,
घोल- दधि से निर्मित- में डाल देते हैं (मेलिताघोलके रसे)॥३२॥
मरिचार्द्रकजीरकसैन्धव
त्वचबाह्लीकनतान्तमिश्रिताः।
तलितास्तिलतैलमध्यगाः
प्रश्रुताः कोरवटा रुचिप्रदाः ॥ ३३॥
मरिच, आर्द्रक, जीरक, सैंधव, त्वक् (दालचीनी) तथा बाह्लीक (हिंगु) मिश्रित
कर, तैल में तलित (तला हुआ) तथा घोलक (दधि निर्मित) में डाला हुआ, माषपिष्टी
से निर्मित वटक-कोरवटक (बड़े) तैयार हो जाते हैं।
इनका सेवन करने से भोजन में रुचि वर्धन होता है॥३३॥
अथ भीमवटकनिर्माणम्
हिङ्गुजीराम्रचूर्णैस्त्वचमरिचयुतैराद्रैर्कैः पूर्णगर्भः
स्निग्धस्तब्धस्वरूपः परिमलबहुलः कोमलः कुङ्कुमाभः।
भग्नौ दन्तान्तराले मुरुमुरुलरवोल्लापको व्यक्तशब्दः
सो धन्यानां मुखेषु प्रविशति वटको भीमयोगेनसिद्धः॥३४॥
नवमोत्सवः १७९
बल्यो वातहरः कोरो वटो विष्टम्भिपिक्तकृत्।
आह्लादजननः प्रोक्तो दाहकारी तृषाकरः॥३५॥
भीम वटक
क. विधि- हिंगु, जीरक, आम्रचूर्ण (शुष्क आम का चूर्ण), त्वक (दारुसिता),
मरिच, आर्द्रक- इन द्रव्यों से पूरित (पूर्णगर्भ), स्निग्ध-एवं स्तब्ध रूप युक्त,
अधिक सुगन्धित, मृदु (कोमल) तथा कुंकुम सदृश (केशर के रंग वाला),
दन्तान्तराले भग्न होकर मुरु-मुरु शब्द करनेवाला (मुरुमुरुलरवोल्लापको व्यक्तशब्दः)
भीम (कर्पूर) योग से निर्मित वटक (बड़ा) मुख में प्रवेश करता है (सीधन्यानां
मुखेषु प्रविशति)- उनके जो भाग्यशाली भोक्ता (खाने वाले) है।
ख. गुण-कर्म-कोरोवटक भीम वटक के गुण इस प्रकार हैं-
१. वल्य (बलदायक) २. वातहर (वातनाशक)
३. विष्टम्भि (दुर्ज्जर मलावरोधक) ४. पित्तकृत् (पित्तजनक)
५. आह्लाद जनन (प्रसन्नतादायक) ६. दाहकारी (जलन उत्पन्न करनेवाला)
७. तृषाकर (प्यास की वृद्धिकारक)
अथ घोलवटकनिर्माणम्
आभैरवं प्रचुरसैन्धवशृङ्गवेर-
बाह्लीकजीररिरचैर्मिलितोऽल्पभागैः।
संस्थापितः सुरभिणो मथितस्य मध्ये
कस्येति घोलवटको रुचिसंप्रदोऽस्तम् ॥ ३६ ॥
घोलवटक
सैन्धव (अधिक/प्रचुर), अर्द्रक (अल्पमात्रा), हिंगु, जीरक तथा मरिच- समस्त
द्रव्यों का चूर्ण मिश्रित आदि सुगन्धित दधि (मथित जलरहित) के बीच (मथितस् मध्ये)
रखें (संस्थापित) यह 'घोलवटक' होता है। इस प्रकार का 'घोलवटक' किसकी रुचि
की वृद्धि नहीं करेगा (कस्येति रुचि संप्रदोऽस्तम्) अर्थात् घोलवटक भोक्ता समस्त
व्यक्तियों की रुचिवर्द्धन करता है॥३६॥
माष्यस्य वटको हृद्यो बल्यः शुक्रकरो गुरुः।
विष्टम्भी घोलसंयुक्तोऽविदाही पवनापहः॥३७॥