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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 101

१९६ | क्षेमकुतूहलम्
अथ सूरणमोदकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पूर्ववत्स्वेदिताः खण्डाः सौरणा घृतपाचिताः।
खण्डपाकविमिश्राश्च यान्ति मोदकहेतुताम्॥४६॥
बल्यो वर्ण्योऽग्निकृत्सद्यः सौरणो मोदकः स्मृतः।
अत्यर्थं सर्वदा सेव्यश्चर्मकीलयुतैर्नरैः॥४७॥
सूरण मोदक
क. विधि- स्वेदित (उबाले हुए) सूरण कन्द (जिभीकन्द) के खण्डों से छिलका
निकालकर (निस्त्वक्), तप्त घृत में पाक करते हैं, इसके पूर्व कन्द की पिष्टी
(पिट्ठी) सेव बना लेते हैं। इस सामग्री को खण्डपाक (शक्कर की चाशनी) में
भलीप्रकार मिलाकर, मोदक (लड्डू) निर्माण करना चाहिए।
ख. गुण-
१. बल्य (शरीर का बलवर्धक)
२. वर्ण्य (देह का वर्ण प्रसारण)
३. अग्निकृत् (पाचकाग्नि जनन)
४. चर्मकील (अर्श) नाशक
(अर्श के रोगियों का अधिक सेवन इस मोदक विशेष का करना हितकर है।
अथाऽर्द्रकमोदकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अम्लीकापत्रसंमिश्रं क्वाथयेदार्द्रकं जले।
ततः क्षीरे विनिष्क्वाथ्य सुखण्डांस्तस्य कारयेत्॥४८॥
ते च तण्डुलपिष्टेन वेष्टिता घृतपाचिताः।
पक्वखण्डे समालोड्य कर्तव्या त्वेलयाऽन्विताः॥४९॥
आर्द्रकस्यैव संभूतो मोदको रुचिबोधकः।
कण्ठ्योऽग्निजनकः प्रोक्तो विशेषाच्छ्वासकासहा॥५०॥
आर्द्रक मोदक
क. विधि- आर्द्रक (अदरक) को चिंचा पत्र मिले जल में क्वाथ बनाते समय डाल
देते हैं। फिर निकाल कर दुग्ध में पाक करके सुखण्ड (सुन्दर, छोटे टुकड़े)
बनाते हैं, जिनको तण्डल पिष्ट (चावल की पिट्ठी) आलेपित कर, तप्त घृत में
दशमोत्सवः | १९७
पाक करके पक्व खण्ड (चाशनी) में डुबोते हैं, और एला-चूर्ण से सुगन्धित कर
लेते हैं- इस द्रव्य के मोदक बनाते हैं।
ख. गुण-
१. रुचिबोधक (रुचिकर)
२. कण्ठ्य (कण्ठ-गले को हितकर)
३. अग्निजनक (पाचकाग्निवर्धक)
४. श्वासवृद्धि ┐ श्वास एवं कास नाशक
५. कास ┘ विशेषरूपेण
अथ कूष्माण्डमोदकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कूष्माण्डस्य च कर्तव्यः सर्व आर्द्रकवद्विधिः।
स्वेदनं कर्तनं स्वाज्ये भर्जनं खण्डवेष्टनम्॥५१॥
कूष्माण्डजनितश्चायं लड्डूकः पित्तनाशनः।
बलकृद्वातहत्सद्योरुचिकृत्कफकृद्धिमः ॥५२॥
कूष्माण्ड मोदक
क. विधि-कूष्माण्ड (कोहड़ा-कुम्हेड़ा) का मोदक-निर्माणार्थ आर्द्रक विधि का
अनुसरण करना चाहिए। इस हेतु स्वेदन, कर्तन, आज्य, भर्जन तथा खण्ड-
वेष्टन प्रभृति कर्तव्य पूर्ववत् किए जायेगे। इस रीति से कूष्माण्ड-मोदक तैयार हो
जाता है। (चिंचा पत्र उक्त जल मे उबालना, छोटे टुकड़े करना घी मे भूनना तथा
चाशनी। शक्कर मिलाना आदि क्रियाये आर्द्रक मोदक के समान कूष्माण्ड
जनित लड्डूक बनाने के लिए)।
ख. गुण-
१. पित्तनाशक | २. बलकृत् | ३. वातहत्
४. सद्यरुचिकृत् | ५. कफकृत् | ६. शीत
अथ कूष्माण्डादिबीजमोदकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कूष्माण्डबीजैर्निस्त्वग्भिर्भिट्यादिप्रियालजैः ।
खण्डपाकविमिश्रैश्च कुर्यात्तेषां हि मोदकान् ॥५३॥
नालिकेरभवा मज्जा खण्डिता दुग्धपाचिता।
भर्जिता घृतमण्डेन खण्डपाकेन लेपिता॥५४॥