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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

७६ कथासरित्सागर

७६ कथासरित्सागर
साम्यन्ती च सतं सा तं स्वप्ने दृष्टं प्रियं विना।
पृच्छन्त्यै चित्रलेखायै सख्यै सर्वं शशंस तत् ॥१५॥
सापि नामाद्यभिज्ञानं न किञ्चित्तस्य जानती।
योगेश्वरी चित्रलेखा तामुपामेवमब्रवीत् ॥१६॥
सखि देवीवरस्यायं प्रभावोऽत्र किमुच्यते।
किं त्वभिज्ञानशून्यस्ते सोऽन्वेष्टव्यः प्रियः कथम् ॥१७॥
परिजानासि चेत् ते ससुरासुरमानुषम्।
जगल्लिखामि तन्मध्ये तं मे दर्शय येन सः ॥१८॥
आनीयते मयेत्युक्ता सा तथेत्युदिते तया।
चित्रलेखा क्रमाद् विश्वममिखद् वर्णवर्तिभिः ॥१९॥
तत्रोषा सोऽयमित्यस्या दृष्टाङ्गुल्या सकम्पया।
द्वारवत्यां यदुकुलादनिरुद्धमदर्शयत् ॥२०॥
चित्रलेखा ततोऽब्रवीत् सखि धन्यासि यत्त्वया।
भर्त्तामिरुद्धः प्राप्तोऽयं पौत्रो भगवतो हरेः ॥२१॥
योजनानां सहस्रेषु षष्टौ वसति स स्थितः।
तच्छ्रुत्वा साधिकौत्सुक्यवशात्तामब्रवीदुषा ॥२२॥
माद्य चेत्सखि तस्याङ्कं ध्ये श्रीखण्डशीतलम्।
तदत्युद्दामकामाग्निनिर्वग्धां विद्धि मां मृताम् ॥२३॥
श्रुत्वैतच्चित्रलेखा सा तामाश्वास्य प्रियां सखीम्।
तदैवोत्पत्य मनसा ययौ द्वारवतीं पुरीम् ॥२४॥
ददर्श च पृथूत्तुङ्गेर्मन्दिरैरब्धिमध्यगाम्।
कुर्वतीं तं पुनः क्षिप्तमन्याभिश्चिस्तरभ्रमम् ॥२५॥
तस्यां सुप्तं निशि प्राप्य सानिरुद्धं विबोध्य च।
उपानुरागं च तस्मै शशंस स्वप्नदर्शनात्१ ॥२६॥
आदाय चाततद्रूपस्वप्नवृत्तान्तमेव तम्।
सोक्तं सिद्धिप्रभावेण क्षणेनेवाययौ ततः ॥२७॥
एत्य चावेक्षमाणायास्तस्याः सख्याः सबाष्पंगः।
प्रावेशयदुपायास्तं गुप्तमन्तःपुरं प्रियम् ॥२८॥

१ स्वप्नान्तमेवालिख्यं तमानयत् चित्रलेखेति पाठान्तरै।

षष्ठ खण्ड ७०७
स्वप्न में देखे हुए पति को न पाकर व्याकुल हुई। इसीलिए पूछती हुई सखी से
चित्रलेखा से और, सब समाचार कह दिया ॥१५॥
योगेश्वरी चित्रकला भी उसके नाम-धाम आदि का परिचय न जानती हुई उषा को इस
प्रकार कहने लगी ॥१६॥
'हे सखि यह देवी पार्वती के वर का प्रभाव है। इसमें क्या कहा जा सकता है। किन्तु
परिचय से रहित वह तेरा प्रियतम कैसे खोजा जा सकता है? ॥१७॥
'यदि तू उस नहीं पहचानती है, तो मैं संसार के सुन्दर देवनामों असुरों और मनुष्यों के
चित्र बनाती हूँ उनमें तू मुझे उसे पहचान कर दिखा ॥१८॥
'मैं उसे चाहती हूँ। ऐसा कहने पर चित्रलेखा ने भ्रमरा रंग की कूँचिया से सभी सुन्दर
व्यक्तियों के चित्र लिखे ॥१९॥
तब उषा ने काँपती हुई अँगूली से द्वारकापुरी के यदुवंशीय अनिरुद्ध को पहचान
कर दिखाया ॥२०॥
यह देखकर चित्रलेखा बोली—'सखि तू धन्य है, जो तूने भगवान् कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध
को अपना पति प्राप्त किया॥२१॥
वह यहाँ से साठ हजार योजन (२४ कोस) की दूरी पर है। यह सुनकर अधिक
उत्कण्ठा के वश होकर उषा बोली॥२२॥
'सखि यदि आज मैं उनकी चन्दन के समान शीतल गोद में न बैठी तो अति प्रचंड कामाग्नि
से मुझे दग्ध समझो। अर्थात् मर जाऊँगी' ॥२३॥
यह सुनकर चित्रलेखा सखी उषा को धैर्य देकर आकाश में उड़कर द्वारवती नगरी में
पहुँची ॥२४॥
उसने समुद्र के मध्य ऊँचे ऊँचे भवनों से शोभित द्वारकापुरी को देखा जो पर्वत-शिखरों
के समान ऊँचे भवनों से समुद्र-मन्थन करने के लिए पुनः समुद्र में फेंके हुए मन्दराचल के शिखर
का भ्रम उत्पन्न कर रही थी॥२५॥
उस चित्रकला ने वहाँ रात में शयन करते हुए अनिरुद्ध को जगाकर उसके प्रति स्वप्न
देखने से उत्पन्न हुए गाढ़े अनुराग का परिचय दिया ॥२६॥
उसी प्रकार के स्वप्न देखने से उद्विग्न अनिरुद्ध को लेकर वह योगेश्वरी चित्रलेखा
सिद्धि के प्रभाव से क्षण भर में बाण-नगरी में आ गई॥२७॥
वहाँ लाकर अनिरुद्ध को उसका रूप निहारती हुई उषा के भवन में युक्ति द्वारा पहुँचा
दिया॥२८॥
१ भागवत के अनुसार चित्रलेखा नींद अनिरुद्ध को योगबल से उड़ा ले गई थी।