कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
७६२ कथासरित्सागर
७६२ कथासरित्सागर
मार्जाराद्दूरगं हन्यादुलूको नकुलश्च माम्।
तच्छत्रुसङ्कटगतः क्व गच्छामि करोमि किम् ॥११९॥
हन्त ! मार्जारमेवेह श्रयाम्यापद्गतो ह्ययम्।
आत्मत्राणाय मां रक्षोत्पाशच्छेदोपयोगिनम् ॥१२०॥
इत्यालोच्य शनैर्गत्वा मार्जारं मूषकोऽब्रवीत्।
बदे त्वम्ववितुर्श मे तत्ते पाशं छिनद्म्यहम् ॥१२१॥
ऋजूनां जायते स्नेहः सहवासाद्विपुष्वपि।
किं तु मे नास्ति विश्वासस्तव चित्तमजानतः ॥१२२॥
तच्छ्रुत्वोवाच मार्जारो भद्र विश्वस्यतां मया।
अद्य प्रभृति मे मित्रं भवान् प्राणप्रदायकः ॥१२३॥
इति श्रुत्वैव मार्जारातस्योत्सङ्गे स शिश्रिये।
तद्दृष्ट्वा नकुलोलूकौ निराशौ ययतुस्ततः ॥१२४॥
ततो जगाद मार्जारो मूषकं पाशपीडितः।
गतप्राया निशा मित्र ! तत्पाशाच्छिन्धि मे द्रुतम् ॥१२५॥
मूषकोऽपि शनैश्छिन्दल्लुब्धकागमनोन्मुखः।
मुधा कटकटायद्भिर्दशनैरकरोद्चिरम् ॥१२६॥
क्षणान्नात्रौ प्रभातायां लुब्धके निकटमागते।
मार्जारैर्दूर्यमाने द्राक्पाशांश्छिच्छेद मूषकः ॥१२७॥
छिन्नपाशोऽथ मार्जारे रभ्यस्त्रासविद्रुते।
मूषको मृत्युमुक्तः सम्प्लाव्य प्राविशद् बिलम् ॥१२८॥
नावसत् पुनराहूतो मार्जारेण जगाद च।
कालयुक्त्या ह्यरिर्मित्रं जायते न च सर्वदा ॥१२९॥
एवं बहुभ्यः शत्रुभ्यः प्रज्ञयात्माभिरक्षितः।
मूषकेन तिरश्चापि किं पुनर्मानुषेषु यत् ॥१३०॥
एतदुक्तस्तदा राजा मया यत्तन्मया श्रुतम्।
धृत्या कार्यं निजं रक्षेद्वेबीसरक्षणादिति ॥१३१॥
बुद्धिनां च सर्वत्र मुख्यं मित्रं न पीड्यम्।
योगेश्वर तथा चैतामत्रापि त्वं कथां शृणु ॥१३२॥
१ इयं कथा महाभारतस्य शान्त्य पर्वणि पञ्च तन्त्र चोपलभ्यते।
पञ्च स्तबक ७६१
बिलाव से दूर रहने पर तो उल्लू और नवला दोनों ही मुझे मार देंगे। इसलिए इस प्रकार
शत्रुओं के संकट में पड़ा हुआ मैं कहाँ जाऊँ ॥११०॥
अच्छा हो कि विपत्ति में पड़ा हुआ मैं बिलाव की ही शरण में जाऊँ। मुझे जाल काटने
में ज्ञानी जानकर सम्भव है वह अपनी रक्षा के लिए मेरी भी रक्षा करे ॥११२ ॥
ऐसा सोचकर और धीरे-२ उसके पास जाकर चूहा उससे कहने लगा — तुम्हारे बंधन
से मुझे अत्यन्त दुःख है। इसलिए मैं तुम्हारा जाल काटता हूँ ॥१२१॥
सरस व्यक्तियों का साथ रहने के कारण शत्रुओं पर भी प्रेम हो जाता है। किन्तु, तुम्हारे
प्रेम को न जाननेवाले मुझे तुम पर विश्वास नहीं है ॥१२२॥
यह सुनकर बिलाव कहने लगा 'भद्र ! तुम्हें मुझ पर विश्वास करना चाहिए। आज से
मेरे प्राण बचानेवाले तुम मेरे मित्र हुए ॥१२३॥
बिलाव से ऐसा सुनकर चूहा उसकी गोद में जा छिपा। यह देखकर उल्लू और नेवला
दोनों निराश होकर वहाँ से चल गये ॥१२४॥
तब जाल से बँधा हुआ बिलाव चूहे से कहने लगा 'मित्र ! रात बीतती गई है। इसलिए
मेरे बंधनों को शीघ्र काटो ॥१२५॥
बहेलिये के आने की उत्सुकता से प्रतीक्षा करता हुआ चूहा झूठे ही दाँत फटफटाता हुआ
बन्धनों को काटने में विलम्ब करने लगा ॥१२६॥
प्रातःकाल होने और बहेलिये के निकट आ जाने पर और बिलाव के दीनतापूर्वक प्रार्थना
करने पर, चूहे ने तुरन्त जाल के बंधन काट डाले ॥१२७॥
जाल काटने के पश्चात् बहेलिये के भय से बिल्ली के भाग जाने पर मृत्यु से छूटा हुआ चूहा
भी भागकर बिल में घुस गया ॥१२८॥
बिलाव द्वारा फिर विश्वास दिलाकर बुलाने पर भी उसने उसका विश्वास नहीं किया
और कहने लगा— 'समय आने पर ही शत्रु मित्र बनता है सदा नहीं ॥१२९॥
इस प्रकार चूहे ने और भी बहुत-से पशुओं ने अपने शत्रुओं से बुद्धिमानी के साथ आत्म
रक्षा की मनुष्यों की तो बात ही क्या है ॥१३ ० ॥
जो तुमने मुझसे सुना है वही मुझसे कहा गया राजा अपनी बुद्धि से महारानी की रक्षा
करते हुए अपने कार्य की भी रक्षा कर सकता है ॥१३१॥
बुद्धि ही सर्वत्र प्रधान मित्र है पुरुषार्थ नहीं। हे योगेश्वर ! इस कथा को भी सुनो ॥१३२।
१ यह कथा महाभारत के १२वें पर्व में तथा पंचतंत्र में भी मिलती है।—अनु
श्रावस्तीत्यस्ति नगरी तस्यां पूर्वं प्रसेनजित्।
राजाभूत्तत्र चाभ्यागात्कोऽप्यपूर्वो द्विजः पुरि॥१३३॥
सोऽशूद्राश्रमगुप्तेन धनिना गुणवानिति।
ब्राह्मणस्य गृहे तत्र कस्यचित्स्थापितो द्विजः॥१३४॥
तत्रैव तेन शुष्कान्नदक्षिणादिभिरन्वहम्।
आपूर्यत ततोऽन्यैश्च धनेर्वृद्ध्वा वणिग्वरैः॥१३५॥
तेनासौ हेमदीनारसहस्रं कृपणः क्रमात्।
सञ्चित्य गत्वारण्ये तन्निखत्य क्षिप्तवान् भुवि॥१३६॥
एकाकी प्रत्यहं गत्वा तच्च स्थानमवैक्षत।
एकदा हेमशून्यं तत्खातं व्यक्तं च दृष्टवान्॥१३७॥
शून्यं तत्खातकं तस्य पश्यतो हृतचेतसः।
न परं हृदि संक्रान्ता चित्रं दिक्ष्वपि शून्यता॥१३८॥
अथोपागाच्च विलपंस्तं विप्रं यद्गृहे स्थितः।
पृष्टस्तं च स्ववृत्तान्तं तस्मै सर्वं न्यवेदयत्॥१३९॥
गत्वा तीर्थमभुञ्जानः प्राणांस्त्यक्तुमियेय च।
बुबुध्वा च सोऽन्नदातास्य वणिगन्यै सहायिनौ॥१४०॥
स तं जगाद किं ब्रह्मन् ! वित्तहेतोर्मुमूर्षसि।
अकारुणेभवद् वित्तमकस्मादेति याति च॥१४१॥
इत्यायुक्तोऽपि तेनासौ न जहौ मरणग्रहम्।
प्राणेभ्योऽप्यर्थमात्रा हि कृपणस्य गरीयसी॥१४२॥
ततश्च मृत्यवे तीर्थं गच्छतोऽस्य द्विजन्मनः।
स्वयं प्रसेनजिद्राजा तद्बुद्धवान्तिकमाययौ॥१४३॥
पप्रच्छ चैनं किं किञ्चिद्वेत्सि तत्राप्तसंज्ञकम्।
यत्र भूमौ निखातस्ते दीनारा ब्राह्मण! त्वया॥१४४॥
तच्छ्रुत्वा स द्विजोऽवादीदस्ति क्षुद्रोऽत्र पादपः।
अटव्यां देव तन्मूले निखातं तन्मया धनम्॥१४५॥
इत्याकर्ण्याब्रवीद्राजा दास्याम्यन्विष्य तत्तव।
धनं स्वकोषादथवा मा त्याक्षीर्जीवितं द्विज॥१४६॥
इत्युक्त्वा मरणोद्योगात्निवार्य विनिधाय च।
द्विजं तं वणिजो हस्ते स राजाभ्यन्तरं ययौ॥१४७॥