सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

७२ कथासरित्सागर

७२ कथासरित्सागर
साघोरेव तु मण्डूक शवाकाण्डे घटोऽधुना।
अयशस्य विनाशाय सञ्जातोऽय हठादिह ॥१३५॥
रन्ध्रस्वाहो महाज्ञानी मेकोऽपि विदितोऽमुना।
इति जल्पन्ननन्वात्र प्रस्तुतान्नान्ययाज्जनः ॥१३६॥
ततस्तत्रातिमानान मन्वानो हरिधर्मण ।
तुष्टो राजा ददौ ग्रामान् सहेमच्छत्रवाहनान् ॥१३७॥
क्षणाच्च हरिशर्मा स जज्ञे सामन्तसन्निभः।१
इत्थं दैवेन साध्यन्ते सदर्थाः शुभकर्मणाम् ॥१३८॥
तत्सोमदत्त सदृशं दैवेनेबाभिसारिता।
निजायसदृशं राजंस्तव तेजस्वती सुता ॥१३९॥
इति मन्त्रिमुरबाच्छ्रुत्वा तस्मै राजसुताय ताम्।
राजा विक्रमसेनोऽथ ददौ लक्ष्मीमिवात्मजम् ॥१४०॥
ततः श्वशुरसैन्येन गत्वा जित्वा रिपूंश्च स।
सोमदत्तः स्वराज्यस्थस्तस्थौ भार्यासख मुदम् ॥१४१॥
एवं विधेर्भवति सर्वमिदं विशेषा
त्त्वामीदृशीं घटयितुं क इह क्षमेत।
वत्सेश्वरेण सदृशेन धिनैव देव
कुर्यामिह सखि किमत्र कलिङ्गसेने ॥१४२॥
इत्थं कथां रहसि राजसुता निशम्य
सोमप्रभावदनतोऽत्र कलिङ्गसेना।
सप्ताधिनी शिथिलबन्धुभयत्रपा सा
वत्सैशसङ्गमसमुत्कमना बभूव ॥१४३॥
अथास्तमुपमास्यति त्रिभुवनैकदीपे रवौ
प्रभातसमयागमर्षि कथञ्चिदामन्त्र्य ताम्।
सखीमभिमतोद्यमस्थितमतिं खमार्गेण सा
मयासुरसुता ययौ निजगृहाय सोमप्रभा ॥१४४॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे
मदनमञ्चुकालम्बके चतुर्थस्तरङ्गः ।
१ पाश्चात्यकथास्वपीदृश्यः कथा समालोक्यन्ते । श्रीमत्सरचित 'चतुर्माणिपत्स्य
कथा' नाम्नि पुस्तकेऽपीदृशी कथा समायाति । सर्वास मूलं कथासरित्सागर एव ।

'हे मंडूक, भांप-भांपे और विवश तेरे नाश के लिए यह चर्म कारण हुआ' ।।१३५।।
यह सुनकर प्रसंग की ओर अख लगाकर वहाँ उपस्थित पुरुषों ने कहा—'ओह ! यह
तो महान् ज्योतिषी है। इसने मण्डूक को भी जान लिया' ।।१३६।।
तब प्रसन्न राजा ने उसके कथन को प्रतिभा प्रसूत ज्ञान समझकर थान के छत्र हाथी घोड़े
आदि के साथ ग्राम भी भेंट किए ।।१३७।।
क्षण-भर में वह हरिशर्मा सामन्त राजा के समान हो गया। १ दैव अच्छे कर्मवालों के
साथ स्वयं ऐसे ही मिल कर बैठता है ।।१३८।।
इसलिए दैव ने इस कन्या को भीमदत्त के पास उचित ही अभिगमन करा दिया और
अयोग्य व्यक्ति को भी हटा दिया ।।१३९।।
मन्त्री के मुँह से इस प्रकार कथा सुनकर विक्रममत्त ने धरणी के समान अपनी कन्या
राजपुत्र सामदत्त को दे दी ।।१४० ।।
तदनन्तर सामदत्त भी श्वशुर की सेना के बल से शत्रुओं पर चढ़ाई करके और उन्हें जीतकर
अपने राज्य में अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा ।।१४१।।
हे कलिङ्गसेने दैवगति की विशेषता से ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं। अतः ऐसी सुन्दरी
तुझे वत्सेश्वर से मिलाने में दैव के सिवा और कौन समर्थ है। मैं इस विषय में क्या कर
सकती हूँ ।।१४२।।
इस प्रकार, सोमप्रभा के मुख से एकान्त में कथा सुनकर बन्धुओं के भय और लज्जा को
छोड़कर कलिङ्गसेना वत्सराज के समागम के लिए अत्यन्त उत्कण्ठित हो गई ।।१४३।।
तदनन्तर त्रिभुवन के एकमात्र दीपक सूर्य के अस्त हो जाने पर, प्रातःकाल पुन आने की
अवधि प्रदान करके मयासुर की पुत्री सोमप्रभा अभीष्ट-सिद्धि के लिए उद्यत सखी कलिङ्गसेना
से पूछकर आकाश-मार्ग से घर को चली गई ।।१४४।।
चतुर्थ तरङ्ग समाप्त

१ इस कथा से मिलती-जुलती कहानी, ग्रीस की 'परियों की कहानी' में भी है।
बेनफी का कथन है कि योरप में प्रचलित ऐसी कहानियों का मूल स्रोत कथासरित्सागर
ही है।—अनु