सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

६७८ कथासरित्सागर

६७८ कथासरित्सागर

तथेत्युक्तवतीं तां च कीर्तिसेनां तदैव सः।
वसुदत्तपुरं गोपः पुंवेषां नयति स्म ताम् ॥१६०॥
तच्च तत्र यथावस्तु निवेद्यार्त्याय तत्क्षणात्।
प्रतीहाराय कल्याणलक्षणां तां समर्पयत् ॥१६१॥
प्रतीहारोऽपि राजानं विज्ञप्यैव तदाज्ञया।
प्रवेशयामास स तां तस्यान्तःपुरमनिन्दिताम् ॥१६२॥
राजा च सोऽत्र रोगातंस्तां दृष्ट्वैवामृतदृष्टिम।
आश्वस्तो वसुदत्तोऽभूद्वेधेत्यात्मेव हिवाहितम् ॥१६३॥
उवाच चैतां पुंवेषां यदिमामपनेष्यसि।
रुजमेतत्प्रदास्यामि राज्यार्धं ते सुलक्षण ॥१६४॥
जाने जहार पृष्ठात्मे स्वप्ने स्त्री कृष्णकम्बलम्।
सन्निश्चितमिमं रोगं हरिष्यति भवानमम् ॥१६५॥
तच्छ्रुत्वा कीर्तिसेना तं जगादाथ दिनम् गतः।
देव ध्वस्तेऽपनेष्यामि रोगं मा स्मार्षृछिं कृथाः ॥१६६॥
इत्यक्त्वा मूर्ध्नि राज्ञोऽस्य गव्यं घृतमवापयत्।
तेन तस्याययौ निद्रा ययौ सा चातियेदना ॥१६७॥
भिषग्रूपेण देवोऽयं पुण्यैर्नः कोऽप्युपागतः।
इति तत्र च तां सर्वे कीर्तिसेनां ततोऽस्तुवन् ॥१६८॥
महादेवी च तैस्तैस्तामुपचारैरुपचरत्।
नक्तं वेश्म पृथक्चास्याः सवासीकमकल्पयत् ॥१६९॥
अथापरेद्युर्मध्याह्ने मन्त्रिश्वन्तःपुरेषु च।
पश्यत्सु तस्य भूपस्य कीर्तिसेना चकार सा ॥१७०॥
शिरसः कर्णमार्गेण सार्धं शतपदीशतम्।
राक्षस्युदितया पूर्वं युक्त्याभ्यवहृतया तया ॥१७१॥
स्नापयित्वा च घटके सा ताः शतपदीस्ततः।
घृतक्षीराभिषेकेण च नृपं समतर्पयत् ॥१७२॥
क्रमात्तस्मिन्समाश्वस्ते रोगमुक्ते महीपतौ।
घटे तान्राजिमो दृष्ट्वा को न तत्र विसिस्मये ॥१७३॥

कीर्तिसेना न कहा—'ठीक है। तब वह ग्वाला पुरुष-वेषधारिणी कीर्तिसेना को वसुदत्त
पुर में ले गया ॥१६०॥
ग्वाले ने वहाँ जाकर दुःखित द्वारपाल से सब कुछ निवेदन किया और उस शुभलक्षणा को
उसे सौंप दिया ॥१६१॥
द्वारपाल ने भी राजा से निवेदन किया और उसकी आज्ञा से उस सर्वाङ्गसुन्दरी को वह
राजा के पास ले गया ॥१६२॥
रोगाक्रान्त राजा वसुदत्त भी उस अद्भुत वैद्य को देखकर प्रसन्न और विश्वस्त हो
गया ॥१६३॥
'यदि तुम मेरे इस रोग को दूर करोगे तो मैं तुम्हें इस राज्य का आधा भाग दे दूंगा ॥१६४॥
स्वप्न में मैंने देखा है कि एक स्त्री मेरे शरीर पर से काला कम्बल हटा रही है।
इससे समझता हूँ कि तुम निश्चय ही मेरी बीमारी दूर करोगी' ॥१६५॥
यह सुनकर कीर्तिसेना कहने लगी—'राजन् आज तो दिन चला गया। कल प्रातः
तुम्हारा रोग दूर करूँगा अधीर न होना' ॥१६६॥
ऐसा कहकर उसने राजा के सिर पर गाय का घी मलवाया उससे उसे नींद आ गई
और तीव्र वेदना कम हो गई ॥१६७॥
'वैद्य के रूप में यह कोई देवता आया है'—इस प्रकार कहकर सभी राजपुरुष उसकी
प्रशंसा करने लगे ॥१६८॥
महारानी ने भी अनेक प्रकार से उसका स्वागत-सम्मान किया और रात को उस वैद्य
के लिए पृथक गेह का प्रबन्ध कर दिया ॥१६९॥
दूसरे दिन मध्याह्न में मन्त्रियों और राजाओं के सामने ही दासी से सुनी हुई उस
आश्चर्यजनक युक्ति से कीर्तिसेना ने कान के मार्ग से सभी गांडरों या कनखजूरों को बाहर निकाल
दिया और घी-दूध आदि से राजा को हृष्ट-पुष्ट बना दिया ॥१७०-१७२॥
क्रमशः राजा के रोगमुक्त और स्वस्थ होने पर और घड़े में उन जीवों को देखकर किसे
आश्चर्य नहीं हुआ? ॥१७३॥