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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

षष्ठ लम्बक ७४७

षष्ठ लम्बक ७४७
उस दिन उत्सुकता से व्याकुल राजा उदयन मनोविनोद के लिए महारानी वासवदत्ता
के महल में गया ॥४॥
वहाँ पर मन्त्री यौगन्धरायण द्वारा शिक्षित महारानी ने किसी भी प्रकार का
विकार न प्रकट करते हुए, सदा की भाँति उचित उपचारा से राजा का स्वागत
सत्कार किया ॥५॥
'कलिंगसेना का वृत्तान्त प्रसिद्ध हो जाने पर भी महारानी पूर्व की ही भाँति कैसे प्रकृतिस्थ
है ? - ऐसा सोचते हुए राजा ने जानने के लिए रानी से कहा—'देवि मेरे स्वयंवर के विषय
में तुम्हें कुछ ज्ञात है। जिसलिए कि राजकुमारी कलिङ्गसेना यहाँ आई हुई है ? ॥६-७॥
यह सुनकर मुँह के भाव को तनिक भी विकृत किये बिना रानी बोली—'मुझे ज्ञात है,
यह अत्यन्त प्रसन्नता का विषय है। वह तो हमारे यहाँ साक्षात् लक्ष्मी आई है ॥८॥
उसकी प्राप्ति से उसके पिता महाराज कलिङ्गदत्त के भी वश में आ जाने पर, सारी पृथ्वी
तुम्हारे वश में है। क्या मैं भी धन्य नहीं हूँ कि जिसके पति तुम समान हों जिसे अन्य राजाओं
से चाही जाती हुई राजकन्याएँ स्वयं चाहती हैं' ॥९-११॥
यौगन्धरायण से शिक्षित महारानी द्वारा इस प्रकार कहा गया राजा मन-ही-मन अत्यन्त
प्रसन्न हुआ ॥१२॥
और वहीं वासवदत्ता के साथ भोजन आसव-पान आदि करके सो गया। किन्तु बीच
में ही उठकर सोचने लगा— ॥१३॥
क्या सचमुच महारानी इतनी उदार है कि वह मेरी बात का और सपत्नी (सौन)
कलिङ्गसेना का भी उतना समर्थन करती है। यह बेचारी उस कलिङ्गसेना को कैसे सहन कर सकती
है, जिसने पद्मावती के विवाह पर दैवयोग से प्राणों का ही त्याग नहीं किया ? ॥१४-१५॥
यदि इसका कुछ भी अनिष्ट हुआ तो अनर्थ हो जायगा क्योंकि मेरे पुत्र, श्वशुर, मामे
आदि सब इसी के सहारे हैं ॥१६॥
साथ ही पद्मावती और सारा राज्य इसी के सहारे हैं। अधिक क्या कहूँ। इसलिए,
मैं कलिङ्गसेना से विवाह करूँ तो कैसे ? ॥१७॥
ऐसा सोचकर वत्सराज प्रातःकाल वासवदत्ता के भवन से निकला और उसी दिन
अपराह्न में रानी पद्मावती के महल में गया ॥१८॥

साप्येनमागतं दत्तशिक्षा वासवदत्तया।
तथैवोपाचरत्तृण्वत्पुष्टावोजसतमेव च॥११९॥
ततोऽन्यद्युस्तयोर्देव्योरेक चित्तमवेक्ष्य तत्।
यौगन्धरायणायासीत् सद्यस विमुह्यधूपः॥१२०॥
सोऽपि तं वीक्ष्य राजानं विचारपतितं शनैः।
कारुवेदी जगादेव मन्त्री यौगन्धरायणः॥१२१॥
जानेऽहं नैतदतावदभिप्रायोऽत्र दारुणः।
देवीभ्यां जीवितत्यागदार्ययुक्तं हि चेतसा॥१२२॥
अन्यासक्ते गते भर्त्त्रा स्त्रियो मरणनिश्चिताः।
भवन्त्यदैन्यगम्भीराः साध्व्यः सर्वत्र निःस्पृहाः॥१२३॥
असह्यं हि पुरन्ध्रीणां प्रेम्णो गाढस्य खण्डनम्।
तथा च राजंस्तत्रैतां श्रुतसेनकथां शृणु॥१२४॥
श्रुतसेनभूपतेः कथा
अभूद्दक्षिणभूमी प्राग्गोकर्णाख्ये पुरे नृपः।
श्रुतसेन इति ख्यातः कुम्भभूषानुभाञ्चितः॥१२५॥
तस्य चैकाऽभवच्चिन्ता राज्ञः सम्पूर्णसम्पदः।
आत्मामुरूपां भार्यां यत्स न तावदवाप्तवान्॥१२६॥
एकदा च नृपः कुर्व्वंश्चिन्तां तां तत्क्षपान्तरे।
अग्निधर्म्माभिधानेन जगदे सोऽग्रजन्मना॥१२७॥
आश्चर्य्ये द्वे मया दृष्टे ते राजन्वर्णये शृणु।
तीर्थयात्रागतः पञ्चतीर्थी तामहमाप्तवान्॥१२८॥
यस्यामप्सरसः पञ्च ग्राहत्वमुषिशापतः।
प्राप्ताः सतीश्वरस्तीर्थेमाभागताऽर्जुनम्॥१२९॥
तत्र तीर्थवरे स्नात्वा पञ्चरात्रोपवासिनाम्।
नारायणाचरतादायिनि स्नायिनां नृणाम्॥१३०॥
कर्पूरकथा
यावद् व्रजामि तावच्च लाङ्गलोल्लिखितावनिम्।
गायन्तं कश्चिदद्राक्षं शापित्रं क्षेत्रमध्यगम्॥१३१॥
स पृष्टः शापिरो मार्गं मार्य्यायातेन केनचित्।
प्रमादवेन तद्वाक्यं मामुणोत् गीततत्परः॥१३२॥