कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
प्रथम लम्बक ३३
प्रथम लम्बक ३३
'यही ठीक है' ऐसा कहकर वे दोनों मूर्ख अमूढ़-मुख दीख पड़े और युवक उस छड़ी एवं पात्र
को लेकर खड़ाऊँ पहनकर आकाश में उड़ गया और वे दोनों मूर्ख बन गये'।।५२।।
खड़ाऊँ के प्रभाव से क्षण भर में ही लम्बी यात्रा करके युवक ने आरम्भिका नाम की
सुन्दर नगरी देखी और आकाश से उतर गया ।।५३।।
उतरकर उसने सोचा—'संध्याके ढलने में अभी देरी है। ब्राह्मण मेरे विषय के समान
विश्रामशाला और साथी हैं, बनिये धन के साथी होते हैं। अतः मैं विप्रके घर पर निवास
करूँ' ।।५४।।
ऐसा सोचते-सोचते राजा ने एक एकान्त, पुरातन और टूट-फूट मकान तथा उसके
भीतर जाकर एक वृद्धा स्त्री को देखा।।५५।।
उसने उस बूढ़ी स्त्री को कुछ धन देकर सन्तुष्ट किया और उस वृद्धा के आदर-सत्कार करने
पर वह उसी मकान में ठहरकर रहने लगा।।५६।।
किसी समय प्रसन्न होकर उस वृद्धा ने कहा—'पुत्र! सब कुछ यहाँ ही मिलता है कि
तुम्हारा अनुभव कहीं कभी भारी नहीं है ।।५७।।
लेकिन उस राज्य के राजा की पाटली नामक कन्या है। उस अन्तःपुर के ऊपर गरुड़ के
समान मूर्त्त रूप रखा गया है ।।५८।।
वृद्धा के वचनों का आदर करते हुए युवक के हृदय में उसी (कन्या के) रूप ने काम का बाण
प्रहार किया ।।५९।।
'उस कन्या को मैं आज ही हरूँगा'—ऐसा निश्चय करके युवक ने उस खड़ाऊँ को पहन
कर आकाश-मार्ग से उसके पास पहुँच गया ।।६० ॥
पर्वत की चोटी के समान ऊँचे मन्दिर की खिड़की में प्रवेश कर उसने एकान्त में सोई हुई
पाटली को देखा ।।६१।।
शय्या पर निश्चेष्ट पड़ी हुई उस स्त्री के प्रभाव से वह रात्रि इस प्रकार सुवासित हो
रही थी, मानो समस्त संसार को जीतकर आकर विश्राम करती हुई कामदेव की रतिमूर्ती
रुचिर हो ।।६२।।
'इसे कैसे जगाऊँ'—यह सोचकर युवक साथ ही रत्न पाकर उसी कन्या के कमर के वस्त्र से
परस्पर से बाँध दी।।६३।।
मयूर हुंकार करती हुई और उत्तरीय वस्त्र में उलझ कर अपनी आँकवाली प्रमदा को
आलिंगन कर उसे जगाता ही, वयंका के जगाने की व्यवस्था है ।।६४।।
इस प्रक्रिया को समझकर कुछ काँपती हुई आँख से युवक ने पाटली का आलिंगन किया
और वह जाग उठी।।६५।।
१ इसी प्रकार की कथा, हरिवंशकालीन कथाके समान और डैंग्लर के फेयरीटेल्स
में आती है। उसमें कुछ परिवर्तन अवश्य किया गया है।