कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पंचम लम्बक ५६५
पंचम लम्बक ५६५
तीसरी शशिरेखा है और चौथी शशिप्रभा है। हम चारों पिता के घर में बड़ी हुईं। एक
बार मुझसे छोटी वे तीनों बहिनें साथ ही गंगा-स्नान के लिए गईं॥५५-५६॥
वे तीनों यौवन-मद में मस्त होकर जलक्रीड़ा करती हुई उतथ्य नामक ऋषि को पानी
से सींचने लगीं॥५७॥
ऋषि के बार-बार मना करने पर भी जब बह न मानीं तब क्रुद्ध होकर उसने शाप दिया
कि 'तुम तीनों दुष्ट कन्याएँ मर्त्यलोक में उत्पन्न होओ'॥५८॥
इस शाप का समाचार सुनकर हमारे पिता ने ऋषि का अनुनय-विनय करके प्रसन्न
किया तो ऋषि उनके शाप का अन्त पृथक्-पृथक् रूप में किया किन्तु दिव्य ज्ञान से जुड़े हुए पूर्वजन्म
के स्मरण को मानव-जन्म में भी बने रहने का आदेश दिया॥५९-६०॥
तब उन तीनों के अपने-अपने विद्याधर-शरीर को छोड़कर मर्त्यलोक में चले जाने पर
मेरे पिता यह नगरी मुझे देकर वन को चले गये॥६१॥
तदनन्तर यहाँ रहती हुई मुझे स्वप्न में माता पार्वती ने यह आदेश दिया कि 'बेटी तेरा
पति मनुष्य होगा'॥६२॥
इसी कारण विद्याधर आदि के अनेक वीरों को छोड़कर मैं अभी तक कन्या ही रह
गई॥६३॥
इस समय तुम्हारे इस आश्चर्यमय जयमन्त्र ने और तुम्हारे सुन्दर शरीर ने मुझे अपने
वश में कर लिया। फलतः तुम्हारे इन सब आश्चर्यों ने ही मुझे अपने को तुम्हारे लिए अर्पण
करने को बाध्य कर दिया है॥६४॥
इसलिए आगामी चतुर्दशी के दिन तुम्हारे इस प्रसंग को पिता को सूचित करने मैं
ऋषभ नामक पर्वत पर जाऊँगी॥६५॥
वहाँ प्रतिवर्ष उस अवसर पर शिवपूजन के लिए मेला लगता है और सभी दिशाओं से
बड़े बड़े विद्याधर आते हैं॥६६॥
वहीं मेरे पिता भी आते हैं। अतः वहाँ जाकर उनसे आज्ञा लेकर मैं शीघ्र ही आती हूँ
तत्पश्चात् तुम मुझसे विवाह कर लो॥६७॥
तबतक यहाँ ठहरो—ऐसा कहकर उसने विद्याधरों के अनुरूप विविध उपचारों से
शक्तिदेव का स्वागत-सत्कार किया॥६८॥
वहाँ रहकर उन दिव्य भोगों का उपभोग करते हुए उसे ऐसा सुख प्राप्त हुआ जैसे दावाग्नि
से दग्ध (झुलसे हुए) व्यक्ति को अमृत-सरोवर में स्नान करने से होता है॥६९॥