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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

द्वितीय लम्बक २२९

द्वितीय लम्बक २२९
राजा ने आगे जाकर उसका स्वागत किया और उसके आ जाने पर आनन्द से खिले
हुए लोचनोंवाली वासवदत्ता दूसरे आनन्द के समान भाई से मिली। भागी हुई वासवदत्ता
को भाई के साथ लज्जा का अनुभव न करना पडे मानो इसीलिए उसकी आँखें प्रेमाश्रुओं से
डबडबा आईं। पिता के सन्देश-वचनों से प्रोत्साहित वासवदत्ता ने अपने भाई से मिलकर अपने
को कृतकृत्य समझा॥२३—२५॥

दूसरे दिन दोनों का विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ। गोपालक सारे दिन विवाह-महोत्सव
के प्रबन्ध में व्यस्त रहा। रतिरुपी लता से नवीन निकले हुए पल्लव के समान कोमल वासवदत्ता
के हाथ को वत्सेश्वर ने ग्रहण किया। उदयन का स्पर्श होने पर वासवदत्ता उस स्पर्श के गम्भीर
आनन्द में निमग्न हो गई। उसके सारे शरीर में कम्प और पसीना होने लगा। उस समय
ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो कामदेव ने सम्मोहन करनेवाले वायव्य और वारुण अस्त्रों की
निरन्तर वर्षा से उसे बेध डाला हो (वायव्यास्त्र के प्रभाव से कम्प और वारुणास्त्र के प्रभाव से
स्वेद बह रहा था।) ॥२६—२९॥

अग्नि की प्रदक्षिणा करते समय धुएं से कुछ लाल हुई आँखों में मानो मदिरा के मधुर
नशे ने सूत्रपात कर दिया हो ऐसा प्रतीत हो रहा था॥३०॥

इस अवसर पर गोपालक द्वारा दिये गये रत्नों तथा अन्य मित्र-राजाओं के बहुमूल्य
उपहारों से वत्सराज राजराज कुबेर-सा लग रहा था॥३१॥

विवाहित वे दोनों वर और वधू पहले तो दर्शकों की आँखों में प्रविष्ट हुए, पश्चात् अपने
शयनागार में॥३२॥

तदनन्तर अपने विवाह-महोत्सव में राजा ने गोपालक और पुलिन्दक को भेंट देकर
पट्टबन्ध आदि से सम्मानित किया॥३३॥

राजाओं तथा प्रतिष्ठित नागरिकों के सम्मान का कार्य यौगन्धरायण और रुमण्वान् को
सौंपा गया था॥३४॥

इस अवसर पर यौगन्धरायण ने रुमण्वान् से कहा कि 'राजा ने हमलोगों को बड़े ही
कठिन कार्य पर नियुक्त किया है, क्योंकि सभी लोगों के चित्तों को प्रसन्न करना दुस्तर है॥३५॥

अप्रसन्न बालक भी मन में क्रोध और क्षोभ उत्पन्न कर देता है। इस सम्बन्ध में बाल-
विनष्टक की कथा कहता हूँ सुनो॥३६॥