कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
द्वितीय लम्बक १८५
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द्वितीय लम्बक १८५
तदनन्तर अन्य पुरुषों के साथ समागम को छोड़कर एकमात्र उसी के साथ प्रेम करनेवाली
रूपणिका के साथ वह भी उसी घर में आनन्दपूर्वक रहने लगा। कन्या की यह रीति देखकर
नगर की समस्त वेश्याओं की शिक्षिका मकरदंष्ट्रा न अत्यन्त दुःखी होकर एकबार एकान्त में
अपनी कन्या रूपणिका से कहा—'बेटी तुम इस दरिद्र से क्या प्रेम कर रही हो। अच्छे व्यक्ति
मुर्दे को भी छू लेते हैं, पर वेश्या निर्धन को भी नहीं छू सकती। कहाँ सच्चा प्रेम और कहाँ
वेश्या-वृत्ति क्या तुम वेश्याओं के इस सिद्धान्त को भी भूल गई। बेटी ! स्नेह करनेवाली वेश्या
सन्ध्या के समान अधिक देर तक नहीं चमक सकती। वेश्या को तो केवल धन के लिए
अभिनेत्री के समान प्रेम दिखलाना चाहिए। इसलिए तुम इस दरिद्र ब्राह्मण को छोड़ो अपना
विनाश न करो। माता के उपदेश को सुनकर रूपणिका क्रोध से बोली—'माता ! तुम ऐसा न
कहो। यह मुझे प्राणों से भी अधिक प्यारा है धन तो मेरे पास बहुत है अधिक धन लेकर
मैं क्या करूँगी। इसलिए हे माता ! तुम फिर मुझे ऐसा कभी न कहना ॥१९०-१९६॥
यह सुनकर रूपणिका की माता मकरदंष्ट्रा मन-ही-मन जल गई और लोहजंघ को घर
से निकालने का षड्यन्त्र सोचने लगी ॥१९७॥
कुछ समय के अनन्तर कुट्टनी ने राह म जाते हुए किसी धनहीन राजपुत्र को देखा जो शस्त्र
धारी सिपाहियों से घिरा हुआ जा रहा था ॥१९८॥
उसे देखकर कुट्टनी दौड़कर उसके पास आ गई और एकान्त म ले जाकर कहने लगी—
'मेरे घर पर एक दरिद्र कामी व्यक्ति ने अधिकार जमा रखा है इसलिए तुम मेरे घर पर आओ
और ऐसा उपाय करो कि वह मेरे घर से निकल जाय। इस काय के पुरस्कार-स्वरूप तुम मेरी
पुत्री का उपभोग करो ॥१९९-१ ॥
राजपुत्र ने कुट्टनी की बात स्वीकार कर ली और उसने रूपणिका के गृह में प्रवेश किया
उसी समय रूपणिका किसी देवमन्दिर म दर्शन के लिए चली गई थी ॥१ १॥
लोहजंघ भी दैवयोग से उस समय कहीं बाहर गया हुआ था। फलतः लोहजंघ आकर
निःशंक भाव से सदा के अनुसार वेश्या के घर म घुसा ॥१ २॥
उसके घर म घुसते ही राजपुत्र के सिपाहियों ने उसे दौड़ाकर लात-घूसों से खूब
मारा ॥१ ३॥
मार खाकर मरे हुए लोहजंघ को पकड़कर सिपाहियों ने किसी गंदे गड्ढे (संडास) में
फेंक दिया। लोहजंघ फिर उससे किसी प्रकार निकल भागा ॥१ ४॥
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