कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
द्वितीय लम्बक १३१
द्वितीय लम्बक १३१
धीदत्त की भावना को समझकर दैत्य-कन्या ने उससे कहा कि 'तुम इस वापी में खड्ग
को लेकर स्नान करो जिससे ग्राह का भय न रहे' ॥५१॥
दैत्य-कन्या के कथनानुसार उस वापी में गोता लगाते ही श्रीदत्त फिर उसी गंगा-तट पर
जा निकला जहाँ से वह जल में उतरा था ॥५२॥
पाताल से गंगा-तट पर निकला हुआ धीदत्त खड्ग और अंगूठी को देखता हुआ दुःखी
और चकित हो रहा था क्योंकि उस कन्या ने उसे पुनः यहाँ भेजकर ठग लिया ॥५३॥
गंगा-तट पर उन छोड़े हुए अपने मित्रों को ढूँढ़ने के लिए वह अपने घर की ओर चला।
जाते हुए उसने निष्ठुरक नामक मित्र को मार्ग में देखा ॥५४॥
निष्ठुरक उसे देखकर उसके समीप आकर प्रणामपूर्वक उससे अपने मित्रों का समाचार
पूछते हुए उसे एकान्त में ले जाकर बोला—॥५५॥
“तुम्हें उस समय गंगा में डूबा हुआ देखकर तुम्हारे शोक के कारण हम लोग अपने-अपने
गले काटने के लिए उद्यत हुए ॥५६॥
‘बेटो ! ऐसा साहस न करो’—इस प्रकार की आकाशवाणी ने हमारे गले काटने के
प्रयत्न को रोक दिया ॥५७॥
जब तुम्हारे पिता के समीप समाचार कहने के लिए जाते हुए हम लोगों को मार्ग में मिलकर
एक पुरुष ने इस प्रकार कहा—॥५८॥
‘तुम लोगों को नगर में प्रवेश नहीं करना चाहिए। नगर का राजा वल्लभशक्ति इस समय
मर गया है और उसके पुत्र विक्रमशक्ति को मन्त्रियों ने सम्मति करके राजा बना दिया है।
विक्रमशक्ति राज्य पाते ही दूसरे दिन कालनेमि (तुम्हारे पिता) के घर पहुँचा और पूछा कि वह
तुम्हारा बेटा श्रीदत्त कहाँ है ? उत्तर में कालनेमि ने कहा—कि ‘मैं नहीं जानता’ ॥५९ ६०-६१॥
‘इसने अपने लड़के को छिपा दिया’—ऐसा अपराध लगाकर राजा विक्रमशक्ति ने
क्रुद्ध होकर कालनेमि को फाँसी दे दी ॥६२॥
पति की इस परिस्थिति को देखकर उसकी स्त्री (तुम्हारी माता) का हृदय स्वयं फट
गया। सच है क्रूर व्यक्तियों का पाप उनके लिए किये गये अन्यान्य पापों के कारण अत्यन्त
क्रूर हो जाता है ॥६३॥
अब विक्रमशक्ति श्रीदत्त और उसके मित्रों को वध करने के लिए ढूँढ़ रहा है। इसलिए
तुम लोग नगर में न जाकर और कहीं चले जाओ' ॥६४॥
इस प्रकार किसी नागरिक पुरुष के कहने पर शोक-सन्तप्त बाहुशाली आदि
हम पाँचों मित्र परस्पर सम्मति करके अपनी मातृभूमि उज्जयिनी को चल गये। और
तुम्हारे लिए मुझे छिपकर यहाँ रहने का आदेश दे गये। तो चलो उज्जयिनी में मित्रों के समीप
चलें” ॥६५ ६६॥