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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

तृतीय लम्बक २७१

तृतीय लम्बक २७१
राजा को इस प्रकार सन्तप्त जानकर क्षीर-समुद्र में विश्राम करते हुए सर्वज्ञ भगवान्
विष्णु ने दर्शन के लिए आये नारद मुनि को आदेश दिया ॥८॥
हे देवर्षि ! नन्दन-उद्यान में स्थित राजा पुरूरवा उर्वशी पर मोहित हो गया है और
उर्वशी के विरह को सहन नहीं कर पा रहा है ॥९॥
इसलिए तुम मेरी ओर से इन्द्र के पास जाकर और उसे समझाकर उर्वशी को राजा
के लिए तुरन्त दिलवा दो ॥१०॥
भगवान् हरि से इस प्रकार आज्ञापित नारद ने आकर पुरूरवा को होश में लाकर कहा—
'राजन् ! उठो तुम्हारे लिए मुझे भगवान् विष्णु ने भेजा है। वे अपने निष्कपट भक्तों
के कष्ट की उपेक्षा नहीं करते ॥११ १२॥
इस प्रकार आश्वासित पुरूरवा के साथ नारद मुनि इन्द्र के पास गये और प्रणाम
करते हुए इन्द्र को हरि की आज्ञा सुनाकर, उर्वशी को राजा पुरूरवा के लिए विदा
दिया ॥१३-१४॥
इस प्रकार उर्वशी का दान स्वर्ग को निर्जीव करने और उर्वशी को मानों मृत-संजीवन
औषधि देने के समान था ॥१५॥
स्वर्गीय पत्नी को ग्रहण करके मर्त्यलोकवासियों की आँखों को आश्चर्य में डालते हुए
पुरूरवा उसे लेकर भू-लोक में आ गया ॥१६॥
इस प्रकार कभी नष्ट न होनेवाले पुरूरवा और उर्वशी—दोनों परस्पर आकृष्ट होकर
बँधे हुए-से रहने लगे ॥१७॥
एक बार मायाधर नामक असुरराज के साथ इन्द्र का युद्ध होने पर इन्द्र ने अपनी सहायता
के लिए पुरूरवा को बुलाया और पुरूरवा स्वर्ग को गया ॥१८॥
इस युद्ध में मायाधर के मारे जाने पर इन्द्र के यहाँ उत्सव हुआ जिसमें सभी स्वर्गीय
स्त्रियों ने भाग लिया। उस उत्सव में आचार्य तुम्बुरु के उपस्थित रहते हुए रम्भा नाम की वेश्या
नृत्य कर रही थी उसके नृत्य में कुछ त्रुटि होने पर पुरूरवा ने हँस दिया। उसकी हँसी से
चिढ़कर रम्भा ने कहा—'यह देव-नृत्य है इसे मैं जानती हूँ। हे मनुष्य ! तू इसे क्या
जाने ॥१९ २१॥

जानेऽहमुर्वशीसङ्गातद्यथेति न तुम्बुरुः।
युष्मद्गुरुरपीत्येनामूचाषाथ पुरूरवाः ॥२२॥
तच्छ्रुत्वा तुम्बुरुः कोपात्तस्मै शापमथादिशत्।
उर्वश्या ते वियोगः स्यादाकृष्णाराधनादिति ॥२३॥
श्रुतशापश्च गत्वैव तमुद्दश्य पुरूरवाः।
अकालाशनिपातोप्रं स्ववृत्तान्तं न्यवेदयत् ॥२४॥
ततोऽकस्मान्निपत्यैव निन्ये क्वाप्यपहृत्य सा।
अदृष्टस्तेन भूपेन गन्धर्वैरूर्वशी किल ॥२५॥
अवधाय शापदोषं तं सोऽप्य गत्वा पुरूरवाः।
हरेराराधनं चक्र ततो बदरिकाश्रमम् ॥२६॥
उर्वशी तु वियोमार्त्ता गन्धर्वविषयस्थिता।
आसीन्मृतेव सुप्तेव लिखितेव विचेतना ॥२७॥
आश्चयं यच्च सा प्राज शापान्ताद्यावलम्बिनी।
मुक्ता विरहदीर्घामु चक्रवाकीव रात्रिषु ॥२८॥
पुरूरवाश्च तपसा तेनाच्युतमतोषयत्।
तत्प्रसादेन गन्धर्वा मुमुचुस्तस्य चोर्वशीम् ॥२९॥
शापान्तरुग्मया मुक्तं पुनरप्सरसा तया।
दिब्यान् स राजा बुभुजे भोगा मृतमत्र्त्त्योऽपि ॥३०॥
इत्युक्त्वा विरते राज्ञि श्रुतोर्वश्यनुरागया।
सापि सोडवियोगत्वाद्व्रीडा बासवदत्तया ॥३१॥
तां दृष्ट्वा युक्त्युपालब्धां राजा देवीं विलक्षिताम्।
अथाप्यामयितुं भूपमाह यौगन्धरायणः ॥३२॥
न श्रुता यदि तन्नामन्कथेयं श्रूयतां त्वया।
अस्तीह तिमिरा नाम नगरी मन्दिरं श्रियः ॥३३॥
तस्यां विहितसेनाख्यः ख्यातिमानभवन्नृपः।
तस्य तेजोवतीत्यासीद् भार्या क्षितितलाप्सराः ॥३४॥
तस्याः कण्ठग्रहेऽप्याप्र स राजा स्पर्शलोलुपः।
न सेहे कञ्चुकेनापि क्षिप्रामाच्छुरितं वपुः ॥३५॥
कदाचित्तस्य राज्ञश्च जज्ञे वीर्य्यज्वरामयः।
यदा निवारयामासुस्तया देव्यास्य सङ्गमम् ॥३६॥

राजा ने कहा—'उर्वशी के सम्पर्क से जो कुछ मैं जानता हूँ उसे तुम्हारे गुरु तुम्बुरु भी
नहीं जानते'। यह सुनकर तुम्बुरु ने क्रोध में भरकर राजा को शाप दिया कि जबतक कृष्ण की
आराधना न करोगे तबतक उर्वशी से तुम्हारा वियोग हो जायगा ॥२२-२३॥

शाप को सुनकर राजा पुरूरवा ने अकास में वज्रपात के समान यह शाप उर्वशी को
कह सुनाया ॥२४॥

तदनन्तर अकस्मात् गन्धर्वों ने तुम्बुरु की आज्ञा से आकर गुप्त रूप से उर्वशी का अपहरण
कर लिया ॥२५॥

पुरूरवा ने इसे शाप का फल समझ कर बदरिकाश्रम में जाकर भगवदाराधन प्रारम्भ
किया ॥२६॥

गन्धर्व-लोक में राजा के वियोग से सन्तप्त उर्वशी निर्जीव-सी सोई-सी चित्रलिखित-सी
एवं संज्ञाहीन होकर पड़ रही। वह शाप के अन्त की आशा पर अवलम्बित विरह से लम्बी
रात्रियों में चकवी के समान तड़पती-सी रहती किन्तु प्राणों से विरक्त न हुई ॥२७-२८॥

इधर पुरूरवा ने भगवान् विष्णु को तप से प्रसन्न किया। भगवान् की कृपा से गन्धर्वों
ने उसकी उर्वशी को छोड़ दिया ॥२९॥

शाप के अन्त में पुनः प्राप्त हुई उर्वशी के साथ राजा भूलोक में स्वर्गीय आनन्द का उपभोग
करता था ॥३०॥

इस प्रकार कथा सुनाकर राजा के चुप होने पर उर्वशी की विरह-वेदना की सहन-शक्ति
को जानकर वासवदत्ता मन-ही-मन लज्जित हुई ॥३१॥

राजा के द्वारा युक्तिपूर्वक उपालम्भ दी गई वासवदत्ता को कुछ लज्जित देखकर उसे
आश्वासन देने के लिए यौगन्धरायण ने कहा ॥३२॥

विहितसेन और तेजस्वती की कथा

हे राजन् ! यदि तुमने यह कथा न सुनी हो तो सुनो। भू-लोक में लक्ष्मी के निवास
भवन के समान तिमिश्र नाम की समृद्ध नगरी है ॥३३॥

उसमें विहितसेन नाम का राजा राज्य करता था। उसकी रानी तेजस्वती भूतल की
अप्सरा थी। उसके कण्ठाश्लेष में संलग्न-हृदय वह राजा अपने शरीर पर कुरते का आवरण
भी सहन नहीं करता था ॥३४-३५॥

एक बार राजा को जीर्ण ज्वर हुआ। वैद्यों ने उस रानी के साथ मिलने
से मना कर दिया ॥३६॥

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