कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
तृतीय लम्बक ११७
तृतीय लम्बक ११७
सफलता की दूती के समान आई हुई कशाओं और नदियों को सुखाकर१ मार्गों को
सुखद और सुगम बनाती हुई शरद् ऋतु ने राजा को उत्साह प्रदान किया ॥६४॥
विविध प्रकार के शब्द करती हुई सेनाओं से भूतल को भरता हुआ और अकाल में ही
वर्षा-काल का भ्रम करता हुआ वह राजा विजय के लिए अग्रसर हुआ ॥६५॥
उसकी सेना के महान् कलकल शब्द की प्रतिध्वनियों से मानों दिशाएँ परस्पर उसके
आगमन की सूचनाएँ देने लगी ॥६६॥
सोने के साजों से सजे हुए, अतएव सूर्य की किरणों से चमकते हुए उसकी सेना के घोड़े
ऐसे मालूम होते थे मानों नीराजन-विधि से प्रसन्न अग्नि का अनुगमन कर रहे हैं ॥६७॥
दोनों कानों के समीप झूलते हुए सफेद चामरों से शोभित और मस्तक पर लगे हुए सिन्दूर
के कारण लाल मद-जल बहाते हुए उसके हाथी मार्ग में चलते हुए ऐसे भले मालूम होते थे मानों
राजा के भय से डरे हुए पर्वतों ने शरत्कालीन श्वेत मेघ-खण्डों से मण्डित एवं धातु-रसों के झरने
बहाते हुए अपने पुत्र सेना की सहायता के लिए भेजे हों ॥६८ ६९॥
यह राजा अपने सामने फैलते हुए दूसरे के तेज को सहन नहीं कर सकता। इसीलिए
मानों सेना से उड़ी हुई धूल ने सूर्य के तेज को ढाँप दिया ॥७० ॥
राजा के पीछे-पीछे उसकी दोनों महारानियाँ इस प्रकार चल रही थीं मानों राजा की
नीति और गुणों से आकृष्ट होकर कीर्ति और विजय-लक्ष्मी चल रही हों ॥७१॥
वायु से इधर-उधर उड़ाये जाते हुए सेना की ध्वजाओं के हत्थे मानों शत्रुओं को चेतावनी
दे रहे थे कि या तो नम्र होकर अधीनता करो या भाग जाओ ॥७२॥
वह राजा खिले हुए श्वेत-कमलों से शोभित जल-स्थल के भू-भागों को शेषनाग के उठे
हुए फनों के समान देखता हुआ जा रहा था ॥७३॥
इसी बीच यौगन्धरायण से प्रेषित गुप्तचर, कापालिक का वेश बनाकर, वाराणसी नगरी
में पहुँचे ॥७४॥
उनमें एक मूढ़ भविष्य का हाल जाननेवाला क्षगी (ज्योतिषी) बन गया और दूसरे सब
उसके शिष्य बन गये ॥७५॥
वे उसके शिष्य नगर में इधर-उधर घूमते हुए अपने गुरु के सम्बन्ध में यह प्रचार करते थे
कि यह हमारा आचार्य निष्काङ्क्ष और केवल भिक्षा लेकर ही रहता है ॥७६॥
वह ज्ञानी गुरु पूछनेवालों को जो भविष्य में होनेवाली अग्निदाह आदि की बातें बताता था
उसके शिष्य उन बातों को गुप्त रूप से स्वयं प्रचारित करके उसका यश बढ़ाते थे। इस प्रकार वह
मिथ्या सिद्ध काशी नगरी में प्रसिद्ध सिद्ध बन गया। इस प्रकार उस सिद्ध ने एक छोटे-से
चमत्कार से राजा के अत्यन्त प्यारे एक राजपुत्र को अपना उपासक बना लिया ॥७७-७८॥
१ देखिए रघु सर्ग ४ श्लो २४-
सरितः कुर्वती गाधाः पथश्चाश्यान कर्दमान्।
यात्रायै चोदयामास तं शक्तेः प्रथमं शरत्॥