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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

बघेलवंशवर्णन । ( ७११ )
सुवरण वृष्टि पै न कीनी कोऊ आजु तक जैसे करे वारि वृष्टि भादौं मेघ खासी है॥
भूप विश्वनाथको अनूप तनय रघुराज जैसी जातरूप वृष्टि कीनी पुरी काशी है १
घर घर वाट वाट गंगाजूके घाट घाट हाट हाट भाटहीं सों भाषैं जन राशी है॥
पंडित अखंडित की कीनीसभा मंडित ना ऐसी कोऊ भूपति उदंडित विकाशी है॥
कहैं युगलेश रहि गयो ना कलेशलेश याचक अशेषको विदेश देश वासी है ॥
हम तुला भासी महाराज रघुराज यशी खासी कीर्ति अतुला प्रकाशी पुरी काशी है२
भूपर घनेरे एक एकते बडेरे भूप भये हैं अनूप पै न ऐसी कोऊ कीनी है ॥
जैसी करी महाराज विश्वनाथ तनय यह महाराज रघुराज मोद उर भीनी है ॥
काशीपुरी असी गंग संगम निकट तट चढ़िकै हिरण्य तुला पुण्यकै अक्षीनी है॥
कहे युगलेश देश देशके नरेशनकी जाईवो महेशपुरी राह रोकि दीनीहै ॥ ३ ॥
केते भूमिपाल भये भारी राज्यवारे भूमि केतको दिवान बड़े दानी सत्यसिन्धुहैं ॥
आय आय काशीपुरी लाय लाय द्रव्य भूरी दै कै विप्र वृन्दनको पोष्यो पंगु अंधुहै॥
पैन ऐसो भयो जोन हेम रौप्य तुला चढ़ि दान अतुलाकै छावै सुयश सुगन्धुहै ॥
राजा रघुराज राजै की तो या जमाने मध्य की देवान ताको श्रीदिवान दीनबंधुहै४॥
कुंडलिया-सुवरण वृष्टि करी उतै, काशी नृप रघुराज ॥
तेहि प्रभाव तिहिं देशघन बरसे वारिदराज ॥
बरसे वारिदराज सकलमें भयो सुभिक्षै ॥
रह्यो न लेश कलेशवेश मिटिगो दुर्भिक्ष ॥
भिक्षै माँगत रहे रंक जे घर घर कुवरन ॥
तेऊ पाय अनाज भूरि द्वैगे तनु सुवरन ॥ १ ॥
दोहा-महाराज रघुराजको, दृढ़ विश्वास य :
तेहि प्रभाव सुखसाज सज,सुकर दराजहु काज ॥१८४॥
कवित्त ।
जोधपुर महाराज राज्यहै दराज जाहि राज काज ऐशही में बीत दिनरैन है ॥
साहिबी सुरेशसी धनेश ऐसी मौज समै तेजमें दिनेश वेश विलसति शैनहै॥
मैनकीसी मूरति मनोहर तखतसिंह बखत बुलन्द निरखत करै चनहै ॥
जाके उर ऐने युगलेशकहूं लेस भैन देखे बनै नैन वैन कहत बनैनहै ॥ १ ॥

( ७१२ ) बघेलवंशवर्णन ।
दोहा-राना नृप कछवाह अरु, हाडा भूप विहाय ॥
जेती लसत पछाहमें, भूपन की ममुदाय ॥ १९ ॥
तिनके भेजि कटारजो, करत आपनो व्याह ॥
ऐसो प्रथित पछाहँमें, जोधपुरी नरनाह ॥ २२० ॥
पुरुषनते संबंध गुणि, तख्तसिंह नरनाह ॥
रींवा करन विवाह को, कीन्ह्यो परम उछाह ॥ २२१ ॥
रानिन सुतन समेत भुवाला । निजपुरते किय गमन उताळा ॥
जेठो कुँवँर तासु रह जोई । चतुरङ्गिणी फौजले सोई ॥
आवत भयो आगरे जबहीं । मिल्यो नृपति जयपुरको तबहीं ॥
ताकी तासु मित्रता भारी । तासों ऐसी गिरा उच्चारी ॥
जेहिं कन्याको तिलक चढ़ौ तुव । सो ह्वैगई कालके वश ध्रुव ॥
जो रघुराजसुता अब अहई । सो तुव भयऊ नृप घर रहई ॥
तासों तुव नहिं उचित विवाहा । रीवां जान न करहु उछाह ॥
हमरे सँग जयपुर पगु धारो । सुनि सो कह यह भलो उचारो ॥
दोहा-ह्वै सवार बग्धी तुरत, जयपुरको नरनाह ॥
ताको संग चढ़ाय कै, लैगो जयपुरकाह ॥ २२ ॥
महाराज रघुराजकी, जेठि सुता वश काल ॥
होत भई तबइतहिते, सुमति दिवान उताल ॥ २३ ॥
लिख्यो जोधपुरकों यह पाती । जहाँ अजवेशर है विख्याती ॥
जासु तिलक जेठेको चढ़ेऊ । सो नृपकी दुहिता जिय कढ़ेऊ ॥
ताते यह नृपसुता जो अहई । तासु व्याह जेठेको चहई ॥
तामें पक्काइत कारिलीन्यो । तब तुम इतै पयानहिं कीन्ह्यो ॥
यह पाती कहि कवि अजवेशा । सों पक्काइन करि लियेवेशा ॥
नृप दिवान कहँ पत्र पठायो । हम यह पक्काइत कारि भायो ॥
सों आगरे सुरति विसरायो । जेठ कुँवरको नहिं लै आयो ॥
तख्तसिंह नृप रेल चढ़ाई । सबको तीरथपति नहवाई ॥

बघेलवंशवर्णन । ( ७१३ )
दोहा-सबको करिदीन्ह्यो बिदा, ते ह्वै रेल सवार ॥
रानी सुत सब सैन्यगे, निजपुरको बिनवार ॥ २४ ॥
छरे संग सरदारलै, युग रानी सुत दोय ॥
तखतसिंह आवतभये, रींवाको मुदमोय ॥ २४ ॥
नृप रघुराज मोद उर छाई । शिविर करायो ले अगुवाई ॥
सुदिवसमें त्रय भयो विवाहा । छायो घर घर परमउछाहा ॥
जो पितृव्यकी सुता सयानी । तख्तसिंह व्याह्यो सुखमानी ॥
तख्तसिंह ल्याय सुत दोई । तिनमें जेठ कुँवर रह जोई ॥
ताको सुता अपनी व्याही । महाराज रघुराज उछाहि ॥
तेहिते लहरे कुँवरहिं काही । सुता विमातृ भगिनि कहँ व्याही ॥
दायज देन जु रह्यो करारा । पंचलक्ष दिय द्रव्य उदारा ॥
हय गज भूषण वसन अमोले । दियो तिन्हें रघुराज अतोले ॥
दोहा-मेवा सकल मँगायकै, अरु मिठाइ बहु भांति ॥
कैयो दिन सादर दियो, ऊंच नीच सब जाति ॥ २६ ॥
चारि रोज़को नेम जग, रखि मास लों बरात ॥
पूरी साज सबै जनन, पूरी सुख सरसात ॥ २७ ॥
रत्न जटिल सुवरण कटक, अरु बहु मोती माल ॥
निज सरदारनको दियो, छायो सुयश विशाल ॥ २८ ॥
कवित्त ।
एक समै बांधवेश महाराज रघुराज छरे सरदारन औ संगलै देवानहै ॥
रेलमें सवार कलकत्ताको पयान कीनो हरिहर क्षेत्र आदि तीरथ महान है ॥
परेमग तहाँकै नहान दै द्विजान दान तीजे रोज जब कलकत्ता नगीचान है ॥
हूनपति आज्ञा पाय हून मुख्य आगू आय लै गयो लेवाय डेरा देतभो मकान है॥ १॥
दोहा-डेरा आयो लाट पुनि, देखि भूपको रूप ॥
रूप न अस कोहु भूपको, भूपर गन्यो अनूप ॥ २९ ॥
मुद्रा सहस रसोई काहीँ । शिविर जाय पठयो सुखमाहीं ॥
दूजे दिन पुनि नृपति उदारा । सादर लाट शिविर पगुधारा ॥

( ७१४ ) बघेलवंशवर्णन ।
सो आगुलै उच्च जो कुरसी । बैठायो तामें अति हुलसी ॥
विविधभांति कीन्ह्यो सत्कारा । सो कहँलों कवि करै उचारा ॥
बड़कीमतिकी उभय दुनाली । देत भयो शत्रुनको शाली ॥
फेरिलाट असि गिरा उचारी । ईजा लही आप मग भारी ॥
यहि पुर होत कलैते कामा । याते कलकत्तहि नामा ॥
द्वै चारिक चलि ठौर विशेषी । लेहिं आपहू आंखिन देखी ॥
दोहा-पांचलाख मुद्रा नितहिं, बनत कलैते ख्यात ॥
तूल सूत बिनिबो वसन, होत कलैते व्रात ॥ २३० ॥
शहर फनूस बरै बुतै, निशि कलते यक साथ॥
इत्यादिक बहु औरऊ, निरखि नंद विश्वनाथ ॥ ३१ ॥
कह्यो लाट साहेब सों जाई । यहि पुर कला अपूर्व लखाई ॥
तकन तोपखानै पुंनि भूपा । गये लखे युग तोप अनूपा ॥
रहैं अठारै पंनी केरी । तिनहि सराहतभो नृप ढेरी ॥
सो यक मनुज लाटसों कहेऊ । लाट खुशी ह्वै हुकुमहि दयऊ ॥
महाराज ऐसी युगतोपा । तुम्हहिं देतहैं हम भरि चोपा ॥
अहँ माग सो लेव मँगाई । दिये देत हम अहँ रजाई ॥
द्वैशत फेरि तिलंगन काहीँ । पथरकला दीन्ह्यो सुखमाहीँ ॥
पुनि कह तुव दिवान सरदारा । वीर बड़े अरु सुघर अपारा ॥
दोहा-बहुत रोज आये भये, अहै रुजी यह देश ॥
याते अब निज पुरीको, कीजै गमन नरेश ॥ ३२ ॥
लाट वचन तब भूप सुनि, ह्वै द्रुत रेल सवार ॥
मग नृप बहु सन्मान लहि, आयो पुरी मँझार ॥ ३३ ॥
दंडहु भरको हुकुम नहिं, तहँ असि लै सब ठाम ॥
इनके जन बागैं वचैं, और कसूरी नाम ॥ ३४ ॥
अरज कियो जो लाट सों, सो सब पूरण कीन ॥
कह्यो आपना राज्यमें, करो जो चहो प्रवीन ॥ ३५॥

चारि अश्व बघ्घीनिमें, चढ़त लाट नहिं कोय ॥
चढ़ै जो कोऊ धोखेहूं, देइ दंड ध्रुव सोइ ॥ ३६ ॥
सो पठयो महराज पै, गुणि सो निजहिं समान ॥
चढ़ि भूपति रघुराज तब, गुन्यो कृपा भगवान ॥ ३७ ॥
मान्यो यह रघुराज नृप, सब यदुराज प्रभाव ॥
और येक आगे चरित, वरणों भरि चित चाव ॥ ३८ ॥
विजयनगर है नामजेहिं, ईजानगर विख्यात ॥
तहँको गजपतिसिंहहै, भूपति मति अवदात ॥ ३९ ॥
सादर सहित कुटुंब सो, बस्यो बनारस आय ॥
ताके भै यक कन्यका, रति सम सुंदर काय ॥ २४० ॥
तेहि व्याहन हित सो उत्साहन । भेज्यो जन पछाह नरनाहन ॥
ते सब दूरिदेश बहु मानी । अपनो जाब अगम मन जानी ॥
ताते ते न कबूलहि कीने । मुद्रा लाखनहूंके दीने ॥
तब सो ईजानगर भुवाला । मनमें कीन्ह्यो शोच विशाला ॥
पुनिकीन्ह्यो अस मनहिं विचारा । रीवां को है बड़ो भुवाला ॥
तेहिते जो ममसुता विवाहू । होय तो होवै महाउछाहू ॥
एक समय रघुराज उदारा । भेंट करन जयपुरहिं भुवारा ॥
मिरजापुरको कियो पयाना । तहँ नृप ईजानगर सजाना ॥
दोहा-मुलाकात करि नजरदै, बहु विधि कीन्ह्यो सेव ॥
पुनि जब तकमा लेनको, गयो काशि नरदेव ॥ ४१ ॥
तबहूं बहुविधि सेव करि, सुता व्याहकें हेत ॥
विनयकियो बहुभाँति सों, सो नृप बड़ो सचेत॥ ४२॥
नाथ कह्यो वकील करिद़ीजै । ज्वाब स्वाल तेहि मुख नृप कीजै ॥
सुनि प्रसन्न गजपति नृप भयऊ । सादरनिजवकील करि दयऊ ॥
भयो जवाब स्वाल युगवरषा । पैंरिनयको टीको कछुनरषा ॥
पूँछयो प्रभु तेहि नृपकी आदी । भाषतभे वकील अहलादी ॥

( ७१६ ) बघेलवंशवर्णन ।

राना विदित उदयपुर केरे । तिन भाई करि लेहिं निवेरे ॥
सुनत उदयपुर खत लिखवायो । रानाजी लिखि तरत पठायो ॥
ईजानगर भूप जों रहई । सो हमरो भाई सति अहई ॥
सुनि खत बांधवेश महाराजा । कह वकील सों वयन दराजा ॥
दोहा-लै आवहु द्रुत तिलक इत, लै आये ते जाय ॥
टिके रहे बहु मासलों, तिलक न चढ़त जनाय॥ ४३ ॥
रामराजसिंहको तिलक, चढ़नको कहै वकील ॥
भूप कहैं नहिं बनत उन, कहैं ज्योतिषी ढील ॥ ४४ ॥
कतहूँ न तुव संबंध तेहिं, तुव संबंधी माहिं ॥
याते इत सब जन कहैं, व्याह योग उत नाहिं ॥४५ ॥
अति मतिवंत भूप रघुराजू । गुन्यो वृथा सब करत अकाजू ॥
पांचलाख मुद्रा यह देई । तिलक माहिं अति आनंद भेई ॥
उभय लाख द्वारे महँ दे हैं । उभय लाख संग सुता पैठे हैं ॥
हय गय भूषण वसन अमोला । और उपरते देइ अतोला ॥
दोषहु यामें कछु न जनाई । रानाको प्रसिद्धहै भाई ॥
यह करि ठीक मनहिं मतिवाना । कलकत्ता जब कियो पयाना ॥
तहँ किय लाट अग्रेते ठीको । रामराजसिंह परिणय नीको ॥
दाइज लेन रही जो चाहा । ताहूको करि दियो निवाहा ॥
दोहा-रीवामें द्रुत आय प्रभु, कह पितृव्य सुत पाहिं ॥
साहेब ढिग सिद्धांत भो, तिहरो व्याह तहाँहिं ॥४६॥
कहत रहे जे होवे नाहीं । तेउ चुपभये न कछु बतराहीं ॥
नृपं वकील ते कहि घर शाहू । पांच लाख धरवाय उछाहू ॥
रामराजसिंहको लै संगे । साजि बरात चल्यों सडमंगे ॥
काशीको जब गये निराई । डेरा दिय सो लै अगुवाई ॥
तहँईसो पुनि तिलक चढ़ायो । हय गय भूषण वसन मँगायो ॥
मुद्रा सहस पचास मँगाई । गजपति सिंह दियो सुख छाई ॥

बघेलवंशवर्णन । (७१७)
होत भयो पुनि सविधि विवाहा । पूरि रह्यो काशी उदसाहा ॥
तहँ गजपति नरेशकी रानी । रूप भूप रघुराज लोभानी ॥
दोहा-कहत भई निजनाहसों, सो उरभरी उछाह ॥
महाराज रघुराजको, कस नहिं कियो विवाह॥ ४७ ॥
सो कह जब तुमसों कह्यो, तब तुम मान्यो नाहिं ॥
अब न सोच संबंध जेहिं, पूरब होत तहाँहिं ॥ ४८ ॥
चारि रोज तहँ रही बराता । कीन्ह्यो सो सत्कार अघाता ॥
पुनि सादर जब कियो बिदाई । मुद्रा दिय द्वै लाख मँगाई ॥
हय गय भूषण वसन जमाती । बड़े मोलके दिय बहु भांती ॥
पुनि सरदारन और वकीलन । मुद्रा दिय पठाय धरि पीलन ॥
नृप रघुराज फोरि सुख छाई । रुपया मोहर अमित मँगाई ॥
सौंदर रामराजसिंह काहीं । तुला चढ़ाय गंग तट माहीं ॥
सब विप्रनको दियो देवाई । जय जय ध्वनि काशी महँ छाई ॥
राम निरंजन संत महान । बसे बनारस विदित जहाना ॥
दोहा-सकल शास्त्रमें निपुण अरु, कामादिकते हीन ॥
राम निरंजन सो न अब, कतहूं संत प्रबीन ॥ ४९ ॥
महाराज रघुराज उदारा । तिनके दरश हेतु पगु धारा ॥
भूपहि आवत जानि दुवारा । चलि सेवक अस वचन उचारा ॥
नाथ दरशहित बहु नृप आवैं । दरशि दूरिते सपदि सिधावैं ॥
सो आपहु दर्शन करि आवैं । बैठन कहैं बैठि तो जावैं ॥
सुनि बोल्यो रघुराज नरेशा । बैठब तबहिं जो होइ निदेशा ॥
अस कहि प्रभु ढिग चलि सुखधामा । वार वार किय दंड प्रणामा ॥
दै अशीश बहु बैठन कहेऊ । बैठि यामलों नृप सुख लहेऊ ॥
कह प्रभु नृप विशुनाथ समाना । रामभक्त नहिं भयो जहाना ॥
दोहा-सब विद्यानिमें निपुण तिमि, दानी विदित महान ॥
तासु तनयतैसहि तुम्हहूँ, सम अबहूँ ना आन ॥२५०॥

( ७१८ ) बघेलवंशवर्णन ।
शम्भुशतक जगदीशहू शतकै । विरच्योतुमसुनि जेहिं बुधसुछकै ॥
जस तुम भक्त अहौ नारायन । तस ईश्वरीप्रसाद नरायन ॥
जस पूरण सुख तुमते भयऊ । तैसहि उनहूँ ते सुख ठयऊ ॥
नृप पछाहियनमें कछु रूरो । बूँदी नृपति जानते पूरो ॥
तेंहिंके आये भो सुख आधो । तुम सम कोड न कृष्ण अवराधो ॥
अति प्रसन्न करि दण्ड प्रणामा । गमन्यो पुनि भूपति सुखधामा ॥
सकल देव संतन गृह जाई । यथा योग बहु द्रव्य चढ़ाई ॥
रामनगर गो सुरसरि पारा । गो लेवाय सो नृपति उदारा ॥
दोहा-रामराजसिंहकोसतिय, घर दिय पठै ससैन ॥
आपरेल चढ़ि आयकै, मिरजापुरहिसचैन ॥ ५१ ॥
पुनि बग्घी असवार है, सेन्य सहित सुख पाय ॥
रीवांको आवत भयो, लै संपति समुदाय ॥ ५२ ॥
बंधु कसौटाको विदित, वंशपती महराव ॥
महाराज सों यक समय, विनय वचन मुखगाव॥५३॥
नाहक हमें अशुद्ध जग, कहत अहैं सब लोग ॥
विमुख आपते जो भये, यहां बड़ो डर सोग ॥ ५४ ॥
स.-आपहिके हमहूँ करुणानिधि आप जो लीजिये मागहिपानी
तौ अहिती हमरे जे अहैं जे असत्य बतात तिन्हें परै जानी॥
दीजिये भात कृपाकरिकै सुधरै मम लीजिये सत्य या मानी ॥
श्रीरघुराज कह्यो हँसिकै यदुराज सुधारिहैं है सति वानी॥१॥
दोहा-भात देत सुनि नृपतिको, बरजें बहु जन वृंद ॥
महाराज कह मानिहैं, कहिहैं जस गोविंद ॥ ५५ ॥
अस कहि यक कागज लिख्यो, यह अशुद्धहै नाहिं ॥
अशुद्ध अहै यह यक लिख्यो, धरि दीन्ह्यो हरि पाहिं५६
नयन मूँदि जगदीश ढिग, पंडा तुरतहिं जाय ॥
लै आयो कागज सोई, यह अशुद्ध नहिं आय ॥ ५७ ॥

बघेलवंशवर्णन । ( ७१९ )
नृप जगदीश निदेश लहि, शुद्ध मानि विख्यात॥
वंशपतीको करिलियो, भाताहिंमें अवदात ॥ ५८ ॥
पंडा तुलसीरामको, अग्निहोत्र करवाय ॥
कियो अग्निहोत्री विदित, रह्यो सुयश जग छाय॥ ५९॥
दशहजार मुद्रा अउर, दो हजारको ग्राम ॥
दै गोविंदगढ़ वास दिय, दै शुभ धाम अराम ॥२६०॥
छप्पय-श्रीरघुराज सुवाजपेयि किय रह यश छाई ॥
याचक सोइ सोइ वस्तु लही जोई मुख गाई ॥
विप्र जे याज्ञिक रहे लहे ते द्रव्य हजारन ॥
भूषण वसन अमोल हेत असवारी वारन ॥
कवि वंश कहैं युगलेश चलि, देशान देश नरेश मधि ॥
ह्वै विन कलेश मुख गाय यश, भये धनेश सुरेश सधि १
कुंडलिया-सबनरनाहनते अधिक, बादशाह कियमान॥
महाराज रघुराजसों, कौन सुजान जहान ॥
कौन सुजान जहान, सुकवि करि सकै बखानै॥
जो वख्श्यो वसु वसन, जननकहँ बे परमानै ॥
मानै निज लखि तजे भूप कलकत्ते महँ तब ॥
युगलदास यह कृपा जानिलीजै सँतिके सब ॥ १ ॥
कवित्त घनाक्षरी ।
वाजिन सवार राज राजिन कराय तहां निज असवारी साथ शाह सोधवायो है ॥
लाट कोठि कुरसी में बांधवेशको बैठाय निज असवारीको जलूस दर्शायो है ॥
देखि सब भूप लेखि निजते अधिक मान शरमाय शीशते बिशेषिहीं नवायोहै ॥
सांच यदुराज कृपा जानै रघुराज परजौन सब राजनते अधिक बनायो है ॥१॥
दोहा-लाख लाय मुद्रा नज़र, देनचहे नरनाह ॥
तिनको लियो न मानि तृण,शाह सहित उत्साह॥६१॥
मुद्रा सहस पचासकी, दियो अँगूठी नाथ ॥
लै सराहि रघुराजको, पहिरिलियो निज हाथ ॥ ६२ ॥

( ७१८ ) बघेलवंशवर्णन ।
शम्भुशतक जगदीशहू शतकै । विरच्योतुष्टपुनि जेहिं बुधसुछकै ॥
जस तुम भक्त अहौ नारायण । तस ईश्वरीप्रसाद नरायण ॥
जस पूरण सुख तुमते भयऊ । तैसहि उनहूँ ते सुख ठयऊ ॥
नृप पछाहियनमें कछु रूरो । बूँदी नृपति जानते पूरो ॥
तेंहिंके आये भो सुख आधो । तुम सम कोउ न कृष्ण अवराधो ॥
अति प्रसन्न करि दण्ड प्रणामा । गमन्यो पुनि भूपति सुखधामा ॥
सकल देव संतन गृह जाई । यथा योग बहु द्रव्य चढ़ाई ॥
रामनगर गो सुरसरि पारा । गो लेवाय सो नृपति उदारा ॥
दोहा-रामराजसिंहकोसतिय, घर दिय पठै ससैन ॥
आपरेल चढ़ि आयकै, मिरजापुरहिसचैन ॥ ५१ ॥
पुनि बग्घी असवार है, सैन्य सहित सुख पाय ॥
रीवांको आवत भयो, लै संपति समुदाय ॥ ५२ ॥
बंधु कसौटाको विदित, वंशपती महराव ॥
महाराज सों यक समय, विनय वचन मुखगाव ॥ ५३ ॥
नाहक हमें अशुद्ध जग, कहत अहैं सब लोग ॥
विमुख आपते जो भये, यहां बड़ो डर सोग ॥ ५४ ॥
स.-आपहिके हमहैं करुणानिधि आप जो लीजिये मागहिपानी
तौ अंहिती हमरे जे अहैं जे असत्य बतात तिन्हें परै जानी॥
दीजिये भात कृपाकारिकै सुधरै मम लीजिये सत्य या मानी ॥
श्रीरघुराज कह्यो हँसिकै यदुराज सुधारिहैं है सति वानी॥१॥
दोहा-भात देत सुनि नृपतिको, बरजे बहु जन वृंद ॥
महाराज कह मानिहैं, कहिहैं जस गोविंद ॥ ५५ ॥
अस कहि यक कागज लिख्यो, यह अशुद्धहै नाहिं ॥
अशुद्ध अहै यह यक लिख्यो, धरि दीन्ह्यो हरि पाहिं५६
नयन मूँदि जगदीश ढिग, पंडा तुरतहिं जाय ॥
लै आयो कागज सोई, यह अशुद्ध नहिं आय ॥ ५७ ॥

बघेलवंशवर्णन । ( ७१९ )
नृप जगदीश निदेश लहि, शुद्ध मानि विख्यात॥
वंशपतीको करिलियो, भातहिमें अवदात ॥ ५८ ॥
पंडा तुलसीरामको, अग्निहोत्र करवाय ॥
कियो अग्निहोत्री विदित, रह्यो सुयश जग छाय॥ ५९॥
दशहजार मुद्रा अउर, दो हजारको ग्राम ॥
दै गोविंदगढ़ वास दिय, दै शुभ धाम अराम ॥२६०॥
छप्पय-श्रीरघुराज सुवाजपेयि किय रह यश छाई ॥
याचक सोइ सोइ वस्तु लही जोई मुख गाई ॥
विप्र जे याज्ञिक रहे लहे ते द्रव्य हजारन ॥
भूषण बसन अमोल हेत असवारी वारन ॥
कवि वंश कहै युगलेश चलि, देशान देश नरेश मधि ॥
ह्वै विन कलेश मुख गाय यश, भये धनेश सुरेश सधि १
कुंडलिया-सबनरनाहनते अधिक, बादशाह कियमान॥
महाराज रघुराजसों, कौन सुजान जहान ॥
कौन सुजान जहान, सुकवि करि सकै बखानै॥
जो बखश्यो वसु वसन, जननकहँ बे परमानै ॥
मानै निज लखि तजे भूप कलकत्ते महँ तब ॥
युगलदास यह कृपा जानिलीजै सँतिके सब ॥ १ ॥
कवित्तघनाक्षरी ।
वाजिन सवार राज राजिन कराय तहां निज असवारी साथ शाह सोधवायो है ॥
लाट कोठि कुरसीमें बांधवेशको बैठाय निज असवारीको जलूस दर्शायो है ॥
देखि सब भूप लेखि निजते अधिक मान शरमाय शीशते बिशेषिहीं नवायोहै ॥
सांच यदुराज कृपा जानै रघुराज परजौन सब राजनते अधिक बनायो है ॥१॥
दोहा-लाख लाय मुद्रा नज़र, देनचहे नरनाह ॥
तिनको लियो न मानि तृण, शाह सहित उत्साह॥६१॥
मुद्रा सहस पचासकी, दियो अँगूठी नाथ ॥
लै सराहि रघुराजको, पहिरिलियो निज हाथ ॥ ६२ ॥

( ७२० ) बघेलवंशवर्णन ।
कवित्त ।
महादेवजीके सम देव नर दानवमें भयो न त्रिलोकी माहिं राम भक्ति धारीहै ॥
सीय बेष कीन्ही सती ताहि त्यागि दीन्ह्यो जौन दक्षकी सुता जो रही प्राणनते प्यारीहै
अब कलिकालतो कराल या कलुषमयो तामें वैसोहोय नहिं परत निहारी है ॥
महाराज विश्वनाथ तनै रघुराज वैसो भयो युगलेश कछु कहत उचारी है॥१॥
छीतूदास भगत पधारे एक समै रीवां कातिकते फागुनलों रहे सुख छायकै ॥
फगुवाके रोज रैन निकसे बजार मग राम सिय लषणको गजभै चढ़ायकै ॥
दीनबंधु धाम ढिग एक बनियाको घर रह्यो तासु सुत लै खीलौनादी चलायकै॥
चौंकि उठ्यो गज झूल जरी डोलि उठे द्रुत कोउ जन जाय कह्यो नृपको सुनायकै २
दोहा-भोर होत तेहिं बणिकको, भूपति लियो लुटाय ॥
द्वै हजारको बसनतेहिं, लीन्ह्यो तुरत मँगाय ॥ ६३ ॥
आधे आधे सो दियो, मोहन दशरथ काहिं ॥
दीनबंधु सो सुनि कियो, वणिक सहाय तहाँहिं ॥ ६४ ॥
वणिक पुत्र भगिजातभो, छीतूदासहि पास ॥
आय भक्त महराज ढिग, शासन दिय सहुलास ॥६५॥
क्षमि आगस यहि वणिकको, दीजै लूटि देवाय ॥
कुटी सिधारव कालिह हम, सुनि बोल्यो नरराय ॥६६॥
वह भगवत भागवतको, कियो महा अपराध ॥
याको देन न कहिय प्रभु, और न होई बाध ॥६७॥
यहि अपराधी वणिकको, कीन्ह्यो जौन सहाय ॥
उंचिता दंड सोउ पायहै, यह प्रभु देहि सुनाय ॥६८॥
पुनि जिन कुटी भक्त पगु धारे । महाराज उर अति मुद धारे ॥
परममित्र मंत्री यशवारा । रह्यो जौन प्राणनको प्यारा ॥
मुख्य देवान कह्यो जेहिं काहीं । लाट खिलत दीन्ह्यो मुदमाहीं ॥
ताहूको गुणि वणिक सहाई । कामकाजते दियो छोड़ांई ॥
रहे जे कामकाजी तेहि संगा । तिनहूँ छोड़ाय दियो सउमंगा ॥
दाक्षण देउरा नगर ललामा । तँहँ जेहिं थान अहै सरेंनामों ॥

बघेलवंशवर्णन । (७२१)
लालशिवबकशसिंह तेहि नामा । धीर वीर अतिहीं मतिधामा ॥
तासु अनुज भगवतसिंह तैसे । वचन जासु अंगद पग कैसे ॥
तेहिं शिवबकश सिंह सुत रूरो । लालरणदवनसिंह गुण पूरो ॥
कैयक अनुज तासुके जानो । तिनमें दिरगजसिंह सुजानो ॥
लालरणदवनसिंह पर मीती । कॅरि रघुराज मीत गुणि नीती ॥
सकल बघेलखंड जों राजी । कियें मुखतार परम है राजी ॥
दोहा-माधवगढ़ ढिग पार सरि, कछिया टोला गावँ ॥
नावँ जासु दिलराजसिंह, मालिकहै तेहिं ठावँ ॥ ६९॥
अमरसिंह कल्याणसिंह, तासु सुवन गुणग्राम ॥
महाराज परसन्न है, तिनहूंको दिय काम ॥ २७०॥
बांकेधौंवा सिंहको, कोष काम करिदीन ॥
देशी परदेशी बहुत, काम दियों सुखभीन ॥७१॥
तिन सबको मुखतारके, भूपति किय आधीन ॥
ते सब अबलों करतहैं, काम लोभते हीन ॥७२॥
छंद-यक काल अकाल कराल पर्यो ॥
विन अन्न दुखी बहु जीव मर्यो ॥
माहिमें कँगला सहसान जुरे ॥
सरि औसर राहन रोज फिरे ॥ १ ॥
बहु पर्गन बांधवदेश ठये ॥
विन अन्न दुखी सब जीव भये ॥
रघुराज गरीबनेवाज महा ॥
दिय अन्न तिन्हें मुदमें उमहा ॥ २ ॥
अंगरेजहु जौन निदेश कियो ॥
रुपया तेहिं पंचसहस्र दियो ॥
जोहिं औरेहु देशानके कँगला ॥
विन अन्न न शोक लहैं अचला ॥ ३ ॥
४६

( ७२२ ) बघेलवंशवर्णन ।
दोहा-झूर अन्न केतेन दियो, केतेन दै पकवान ॥
केतेनको पैसा दियो, केतेन मुद्रादान ॥ ७३ ॥
सोरठा-जौलौं रह्यो अकाल, लाखन रुपया खर्च करि ॥
किय दीनन प्रतिपाल, को कृपालु रघुराज सम ॥ १ ॥
कौन गरीबनेवाज, महराज रघुराज सम ॥
छायो सुयश दराज, समुद्रांतलौं अवनि तल ॥ २ ॥
सवैया-तीक्षण जासु प्रताप दिनेशको आतप तेज महीप सरै ॥
तापित है रिपु तासु महेश कलेशित वासु अरण्यकरै ॥
भाषतहैं युगलेश सही यह मानै उरैंमें विशेष नरै ॥
श्रीरघुराज नरेशके देशन शीतको पेस करै पसरै॥१॥
महाराज रघुराज सपूती । है अपूर्व जिनकी करतूती ॥
पितुते अधिकै राज्यबढ़ायो । पितुते अधिकै द्रव्य कमायो ॥
पितुते अधिक कोष किय भारी । भूपति श्रीरघुराज सुखारी ॥
एक अनूपम शहर बसायो । गोविंदगढ़ तेहिं नाम धरायो ॥
रीवांमें जस रहे मकाना । तिनते अधिक तहां निरमाना ॥
ताल विशाल एक बनवायो । विश्वनाथ नृप नाम सुहायो ॥
जाके तीर तीर सरमांहीं । विरचायो बहु मंदिर काहीं ॥
तिनमें रघुपति यदुपति मूरति । पधरायो परिकर युत अति रति ॥
दोहा-प्रति उत्सव जो करतहैं, साधुन सेवा वेश ॥
सीयव्याह उत्सव तहां, करत नरेश हमेश ॥ ७४ ॥
छीतूदास सुसंत यक, सादर तिनहिं बोलाय ॥
करत व्याह उत्सव सुखद, अगहन मास सोहाय॥ ७५ ॥
संत महंतहुँ विप्र अपारा । जुरैं नारि नर कइक हजारा ॥
तिनको विविध भांति सन्मानी । वांछित अशन देत रति ठानी ॥
मांडव रुचिर रचाय उछाह । सीय रामको करत विवाहा ॥
सबको मंडप तर बोलवाई । सादर विदा करत हरषाई ॥

बघेलवंशवर्णन । ( ७२३ )
मुद्रा अमित दुशालन जोरी । कोहुंको देत हाथ युग जोरी ॥
कोहूको पट और बनाता । मुद्रन सहित देत हरषाता ॥
कोहुको लोइया और रजाई । देत रुपैयन युत सुखदाई ॥
रुपिया और उपरना रासी । कोहुको भूपति देत हुलासी ॥
दोहा–देत रुपैया सबनको, बचै न कोउ नर नारि ॥
सुख छावत गावत सुयश,जात अयन पग धारि॥ ७६ ॥
भरत लषण रिपुदवन युत, सीय रामको फेरि ॥
भूषण वसन अमोल दै, विदा करत छवि हेरि ॥
छीटूदास सुसंतको, साधुन सेवा हेत ॥
द्वादशसै मुद्रा वसन, अमित मोद युत देत ॥ ७७ ॥
जनकपुरी मम सोपुरी,समय सो जनक प्रमोद ॥
जनक सरिस नृप जनकहैं,चलि चलि मग चहुँ कोद ७८
स०–औधपुरी मुद औध किधौं, किधौं वृंदावनै दिपै मंदिर भारी
जानकीरामकी झांकी कहूँ कहूँ राधिका माधवकी मनहारी ॥
झालरी शंख बजै चहुँ ओर बसैं जहँ संत अनंत सुखारी ॥
भूप रच्यो है गोविंदगढ़ सो अनूपम मैं निज नैन निहारी॥ १ ॥
दोहा–छन छन छन घन ध्यान मन, तनक न तन धन भान ॥
धन धन धन जन ज्ञान पन, कन कन वनकनसान ७९॥
| छ | छ | छ | घ | ध्या | म | त | क | त | ध | भा |
| न | न | न | न | न | न | न | न | न | न | न |
| ध | ध | ध | ज | ग्या | प | क | क | व | क | सा |
सोरठा–जेहिं गोविंद गढ़माहिं, दुखहीको दुखदेखिये ॥
डर परलोक सदाहिं, जहँ सब लोगन को अहै ॥२४०॥

( ७२४ ) बघेलवंशवर्णन ।
दंडनीय जहँ एक निसाना । रागरागिणी भेद विधाना ॥
क्रोध जहां क्रोधहिं पर होई । लोभ करै यशकों सब कोई ॥
जहां अधर्महिं को: है त्यागा । निज तियसों ठानब अनुरागा ॥
जहँ गृह चित्र करैं चित चोरी । बंधन जहां पशुनकों जोरी ॥
वचन असत्य कहत रोजगारी । सुताव्याह गावहिं तिय गारी ॥
चलत कुपथं जहां गज माते । कुटिल धनुष जहँदृग दरशाते ॥
सुभटनके अँग जहां कठोरा । कर्कश जहँ झिल्ली गण शोरा ॥
जहां निर्द्धनी यती निहारी । वारि नीचि गति जहां निहारी ॥
दोहा-कंपध्वजामें देखिये, बँधे धौरहर धौल ॥
शोभा सब संसारते, बसी भूप पुर नौल ॥ ८१ ॥
सोरठा-कहुँ गोविंदगढ़ माहिं, कबहूँ रीवाँ नगरमें ॥
श्रीरघुराज सोहाहिं, सब राजनके मुकुट मणि॥१॥
कबित्त घनाक्षरी ।
बंदी जे न ताकत मुसद्दी कामकाजी सबै बैठे दुहूंओर दर्दी दीननको दिलराज॥
कदी दीहवारे औ अमद्दी सरदार आगे बैठे अरिकरनं गरद्दी रणकै गराज ॥
देवनद्दी कैसी किति दिपत्ति विसद्दी जासु युगलेश साहिबी विहद्दी मनो देवराज॥
रद्दी कर दुर्जन अनंदी कर सज्जनको राजै राजगद्दी पर महाराज रघुराज ॥१॥
देन समै जोई जोई याचि राख्यो याचकहै सोई सोई देत सांच लगत न वारहै॥
भूषणअमोल गाँव वसन अमोल म्याना वाजि गज नोल मुद्रा कैयक हजारहै ॥
कहै युगलेश ऐसी रीतिहै हमेशा केरी देखत न देश कोष नेकुर्कै विचारहै ॥
राजनके राज महाराज रघुराज ऐसो आजु तौन दूजो राजा राजत उदारहै॥२॥
पटु सब विद्यन में हटत न काहूसों है निपट निशंक बुद्धि नेकु नैं हलति है ॥
चटपट जानिलेत अटपट बात सब बात कपटीनकी न केंसहू चलतिहै ॥

बघेलवंशवर्णन। (७२५)
महाराज रघुराज निकट पाखंडी कोटि कुटिलऊ सटपटै थिति उसलति है ॥
कवि नटखटनकी कूर बहुकटठनकी चुगुल चवाइनकी दाल ना गलतिहै ॥ ३ ॥
सुमति गणेश लसै साहिबीमें त्यों सुरेश धनमें धनेश शत्रु नाशनमहेशहैं ॥
तेजमें दिनेश मुदजनन प्रजेश प्रजापालनमें वेश सम राजत रमेशहैं ॥
गावत नरेश दीह निजहिं निवेश सभा सुयश विशेष जासु छाजै देश देशहै ॥
भन युगलेश रघुराजसे सुमतधारी सुत बांधवेश औ परेससेवा पेसहै ॥ ४ ॥
करयुग जोरि कमलापतिसों कमलाजी कहै युगलेश बार बार कहैं वैन कल ॥
रावरो भगत विश्वनाथ तनै रघुराज जन्यो तन्यो जासु यश चारु स्वच्छभल ॥
असित पदारथ ते सित हैगये हैं सबै परत पिछानि नाहिं जाय जहांजौने थल ॥
वसिये निरंतर की ताहि ऐके अंतरकी उदधिको अंतर न छोड़िजैये छोनी तल ५
भागवत पढ़यो भागवत को विश्वास मान्यो जननि सुभद्रा श्रीसुभद्रारूप जानिये॥
रामभक्त परमअनन्य महा भागवत विश्वनाथसिंह जासु जनक बखानिये ॥
भागवतदास नाम तिनहीं सों पायो भयो भागवत रूप कंठ भागवत गानिये ॥
भागवत सेवी रघुराजसिंह भागवत जाकें उर भौंन भगवंत भौन मानिये ॥ ६॥
सवैया-याचक वृंद मलिंदनको गण पाय सुपास अनंदित हीमें॥
आय मनोरथ पूरणकै यश गान करें चहुँ ओर महीमें॥
भाषतहैं कवि देशानि जाय नरेशनके दरवारनहीमें ॥
दान करीके कपोलनमें कीहरी रघुराजके हाथनहींमें७
दोहा-महाराज रानी सबै, गौरी सम महिमाथ ॥
लसैं पतिव्रत धर्मरत, तजैं न कबहूं साथ ॥ ८२ ॥
महाराज रघुराजके, अमित चरित्र अनूप ॥
युगलदास वरण्यो कछुक, निजमतिके अनुरूप ॥ ८३॥
जामें सुचित चरित सब, ऐसो अष्टक वेश ॥
विरचतहै युगलेश यह, सुखप्रद सुकवि विशेष ॥८४॥

( ७२६ ) बघेलवंशवर्णन ।
अष्टक नृप रघुराज कृत, युगलदास मुदकंद ॥
सार्थ गतागत चंद्र ऋषि, सिंहवलोकन छंद ॥८५॥
अथगतागत सवैया ।
तों यश शीश मही सरसाय यसारस हीम शशी सजतो ॥
तोमह तेज भसो विरमाहि हिमा रवि सो भजते हमतो ॥
तो जग नैरव सोहत चारु रुचा तहँ सों वरणै गजतो ॥
तों रघुराज भजै नहिं लोग गलोहिनजै भज राघुरतो ॥१॥
अर्थ-हेरघुराजसिंह तिहारो श्रीवृंदावन अरु श्रीजगन्नाथपुरीमें सुवर्णतुलादानादि
महादानरूप जो यह यशहै शीश मही कहे महीके शीशमें अथवा सब राजनके
यश ते शीश कहे शिरा मँही कहे पृथ्वीमें सरसाय कहे अधिकायकै सारस
हीम शशी सजतो. कहे सारस जो है कमल अरु हिम जोहै पाला अरु शशी
जो है चंद्रमा ताकों सजतो कहे अपनी शोभाते साजैहै कहै शोभित करै है यह
प्रतीपालंकारते सारस अरु हिम अरु शशीकी शोभा सब ऋतुमें सब कालमें
एकरस नहीं रहै है कमल झरिजाय है हिम गलिजाइहै शशी क्षीण हैजाइहै अरु
संकलंकहै अरु तिहारो यश सब कालमें एक रस रहै है अरु निःकलंकहै
याते उन सबनते अधिकहै यह व्यतरेकालंकार व्यंजित भयो, अरु तोमह
तेज भसो विरमाहि. कहे तिहारो जो महातेजहै सो वीर जे हैं बड़े २ राजा
तिनमें भसो कहे भासितहै ताते तिहारे तेजते तेऊ शंकित रहै हैं कि हमारी
राज्यं न लैले यह सूचितभयों अथवा विरमाहि कहे सब जगमें तिहारो तेज
विशेषकै रमैहै ताते तुम्हारे तेज करिकै सब राजा निस्तेज ह्वैगये यह ध्वनित
भयों यांहीते, हिमा रविसों भजतें हमतो. कहे आपने हियमें हम तो तुम्हारें
तेज को रवि सों कहै सूर्यसे भजै हैं कहे भजन करै हैं अर्थात् वर्णन करै हैं
यह उपमालंकारते सूर्य कमलनको आनंद देइहैं अरु तम नाश करै हैं अरु
सबको सुधर्ममें प्रवृत्त करै हैं ॥ अरु आपको तेज सज्जनके हृदयकमलको
आनंद देइहैं औ सब राजनके वीरताकें मदको, अज्ञानको नाश करै हैं अरु

सबकें अधर्म नाश करि सबकों धर्ममें प्रवृत्त करै हैं यह अनुभया भेद रूप-
कालंकार ध्वनित भयो अरु, तोंजग नै रव सोहत चारु. कहै जगमें तिहारो जो
है नै कहै नीति ताको जो रव कहे शोरकि रघुराजसिंह बड़े नीतिमान्हैं सो चारु
कहै सुंदर सोहतहै अरु रुचा तहँ सो वरनै जगतों, तहाँ कहै तौने जगमें सो
नीतिकों रव सबको रुचाहै कहै सबको नीक लगै है अर्थात् नीतिकों बखान
जो कोई करत सुनै है सो तहँ खड़ा रहिजाइहै अरु वरनै गजतो कहै सोऊ
जन गजत कहै गर्जनाको करत अर्थात् बड़ो शोर करत सर्वत्र वर्णन करै हैं
कि रघुराजसिंह बड़े नीतिमान्हैं ॥ ताते आपके नीतिके सुनिबेते सबको उत्कंठा
अतिशयरूप वस्तु व्यंजित भयो इससे जैसी आपकी नीतिहै तैसी आपकीहीं
नीतिहै यह अनन्वयालंकार ध्वनित भयो ताते आपकी राज्यम अनीति नहीं है
यह वस्तु सूचित भयो अरु गर्जत वर्णन करै है ताते इनके बरोबर ऐसों
नीतिवारो पृथ्वीमें कोई नहीं है याते निःशंक ৺ यह हेतु व्यंजित भयो ताते,
रघुराज भजै नहिं लोग गलोहि. कहै या भांतिकें जे तुम रघुराजसिंह हौ तिन-
कों जो कोई लोग गलोहि कहै गलते अरु हियते नहीं भजै हैं कहै नहीं भजन
करै हैं अर्थात् तुम्हारे नामको मुखते उच्चारण करत जाको गल नहीं चलै है
अरु जो तुम्हारे नामको हियमें नहीं धारण करै हैं ॥ नैजैभजरा कहै ताकों
जरा कहै नेक कबहूं जै नहीं भयो, अर्थात् वह सबसो हारिही गयो है अरु
घुरतोकहै घुरिजातहै अर्थात् वह नाश हैजाइहै यह i प्रस्तुत कारि प्रस्तुत
प्रगट प्रस्तुत अंकुर नाम यह प्रमाण करिकै प्रथम प्रस्तुत कहै वर्णनीय जे हैं
आप तिनते दूजे प्रस्तुत जे हैं श्रीरघुनाथजी तिनको वर्णन कवित्तके चारिहूँ
तुकमें विदितई है यह प्रस्तुतांकुर अलंकारतें आपकी श्रीरघुनाथजीकी उपमा
व्यंजित भई ॥ १ ॥
दोहा-जन्मअष्टमी आदिदैं, उत्सव जे भगवान ॥
तिनमें वितरत जननको, मुद्रा पट सहसान ॥ ८६ ॥

विराजत" space "वासव" space "वासव" space "सो" space "निगुणी" space "गुणी" space "पारस ॥"
Yes, "पारस ॥" has space before ॥.

Line 22 (L22):
पार सबै करतो जु भवै भवै सो रघुराज भजो कर साहस॥५॥
Let's check:
"पार" space "सबै" space "करतो" space "जु" space "भवै" space "भवै" space "सो" space "रघुराज" space "भजो" space "कर" space "साहस॥५॥"
Notice: "साहस॥५॥" - no spaces around dandas and ५: "साहस॥५॥".

Line 23 (L23):
सोहत भावसों क्रीट शिरै दिये दीपत जासु शिषत्तु विमोहत॥
Wait, let's examine:
Word 1: "सोहत"
Word 2: "भावसों"
Word 3: "क्रीट" (or "किरीट"? It is clearly "क्रीट": क + ्र + ी + ट = क्रीट!)
Word 4: "शिरै" (or "शिर"? It has an ai-matra: "शिरै"!)
Word 5: "दिये"
Word 6: "दीपत"
Word 7: "जासु"
Word 8: "शिषत्तु"