कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसबकें अधर्म नाश करि सबकों धर्ममें प्रवृत्त करै हैं यह अनुभया भेद रूप-
कालंकार ध्वनित भयो अरु, तोंजग नै रव सोहत चारु. कहै जगमें तिहारो जो
है नै कहै नीति ताको जो रव कहे शोरकि रघुराजसिंह बड़े नीतिमान्हैं सो चारु
कहै सुंदर सोहतहै अरु रुचा तहँ सो वरनै जगतों, तहाँ कहै तौने जगमें सो
नीतिकों रव सबको रुचाहै कहै सबको नीक लगै है अर्थात् नीतिकों बखान
जो कोई करत सुनै है सो तहँ खड़ा रहिजाइहै अरु वरनै गजतो कहै सोऊ
जन गजत कहै गर्जनाको करत अर्थात् बड़ो शोर करत सर्वत्र वर्णन करै हैं
कि रघुराजसिंह बड़े नीतिमान्हैं ॥ ताते आपके नीतिके सुनिबेते सबको उत्कंठा
अतिशयरूप वस्तु व्यंजित भयो इससे जैसी आपकी नीतिहै तैसी आपकीहीं
नीतिहै यह अनन्वयालंकार ध्वनित भयो ताते आपकी राज्यम अनीति नहीं है
यह वस्तु सूचित भयो अरु गर्जत वर्णन करै है ताते इनके बरोबर ऐसों
नीतिवारो पृथ्वीमें कोई नहीं है याते निःशंक ৺ यह हेतु व्यंजित भयो ताते,
रघुराज भजै नहिं लोग गलोहि. कहै या भांतिकें जे तुम रघुराजसिंह हौ तिन-
कों जो कोई लोग गलोहि कहै गलते अरु हियते नहीं भजै हैं कहै नहीं भजन
करै हैं अर्थात् तुम्हारे नामको मुखते उच्चारण करत जाको गल नहीं चलै है
अरु जो तुम्हारे नामको हियमें नहीं धारण करै हैं ॥ नैजैभजरा कहै ताकों
जरा कहै नेक कबहूं जै नहीं भयो, अर्थात् वह सबसो हारिही गयो है अरु
घुरतोकहै घुरिजातहै अर्थात् वह नाश हैजाइहै यह i प्रस्तुत कारि प्रस्तुत
प्रगट प्रस्तुत अंकुर नाम यह प्रमाण करिकै प्रथम प्रस्तुत कहै वर्णनीय जे हैं
आप तिनते दूजे प्रस्तुत जे हैं श्रीरघुनाथजी तिनको वर्णन कवित्तके चारिहूँ
तुकमें विदितई है यह प्रस्तुतांकुर अलंकारतें आपकी श्रीरघुनाथजीकी उपमा
व्यंजित भई ॥ १ ॥
दोहा-जन्मअष्टमी आदिदैं, उत्सव जे भगवान ॥
तिनमें वितरत जननको, मुद्रा पट सहसान ॥ ८६ ॥