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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 752

( ७२२ ) बघेलवंशवर्णन ।
दोहा-झूर अन्न केतेन दियो, केतेन दै पकवान ॥
केतेनको पैसा दियो, केतेन मुद्रादान ॥ ७३ ॥
सोरठा-जौलौं रह्यो अकाल, लाखन रुपया खर्च करि ॥
किय दीनन प्रतिपाल, को कृपालु रघुराज सम ॥ १ ॥
कौन गरीबनेवाज, महराज रघुराज सम ॥
छायो सुयश दराज, समुद्रांतलौं अवनि तल ॥ २ ॥
सवैया-तीक्षण जासु प्रताप दिनेशको आतप तेज महीप सरै ॥
तापित है रिपु तासु महेश कलेशित वासु अरण्यकरै ॥
भाषतहैं युगलेश सही यह मानै उरैंमें विशेष नरै ॥
श्रीरघुराज नरेशके देशन शीतको पेस करै पसरै॥१॥
महाराज रघुराज सपूती । है अपूर्व जिनकी करतूती ॥
पितुते अधिकै राज्यबढ़ायो । पितुते अधिकै द्रव्य कमायो ॥
पितुते अधिक कोष किय भारी । भूपति श्रीरघुराज सुखारी ॥
एक अनूपम शहर बसायो । गोविंदगढ़ तेहिं नाम धरायो ॥
रीवांमें जस रहे मकाना । तिनते अधिक तहां निरमाना ॥
ताल विशाल एक बनवायो । विश्वनाथ नृप नाम सुहायो ॥
जाके तीर तीर सरमांहीं । विरचायो बहु मंदिर काहीं ॥
तिनमें रघुपति यदुपति मूरति । पधरायो परिकर युत अति रति ॥
दोहा-प्रति उत्सव जो करतहैं, साधुन सेवा वेश ॥
सीयव्याह उत्सव तहां, करत नरेश हमेश ॥ ७४ ॥
छीतूदास सुसंत यक, सादर तिनहिं बोलाय ॥
करत व्याह उत्सव सुखद, अगहन मास सोहाय॥ ७५ ॥
संत महंतहुँ विप्र अपारा । जुरैं नारि नर कइक हजारा ॥
तिनको विविध भांति सन्मानी । वांछित अशन देत रति ठानी ॥
मांडव रुचिर रचाय उछाह । सीय रामको करत विवाहा ॥
सबको मंडप तर बोलवाई । सादर विदा करत हरषाई ॥