कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबघेलवंशवर्णन । ( ७२३ )
मुद्रा अमित दुशालन जोरी । कोहुंको देत हाथ युग जोरी ॥
कोहूको पट और बनाता । मुद्रन सहित देत हरषाता ॥
कोहुको लोइया और रजाई । देत रुपैयन युत सुखदाई ॥
रुपिया और उपरना रासी । कोहुको भूपति देत हुलासी ॥
दोहा–देत रुपैया सबनको, बचै न कोउ नर नारि ॥
सुख छावत गावत सुयश,जात अयन पग धारि॥ ७६ ॥
भरत लषण रिपुदवन युत, सीय रामको फेरि ॥
भूषण वसन अमोल दै, विदा करत छवि हेरि ॥
छीटूदास सुसंतको, साधुन सेवा हेत ॥
द्वादशसै मुद्रा वसन, अमित मोद युत देत ॥ ७७ ॥
जनकपुरी मम सोपुरी,समय सो जनक प्रमोद ॥
जनक सरिस नृप जनकहैं,चलि चलि मग चहुँ कोद ७८
स०–औधपुरी मुद औध किधौं, किधौं वृंदावनै दिपै मंदिर भारी
जानकीरामकी झांकी कहूँ कहूँ राधिका माधवकी मनहारी ॥
झालरी शंख बजै चहुँ ओर बसैं जहँ संत अनंत सुखारी ॥
भूप रच्यो है गोविंदगढ़ सो अनूपम मैं निज नैन निहारी॥ १ ॥
दोहा–छन छन छन घन ध्यान मन, तनक न तन धन भान ॥
धन धन धन जन ज्ञान पन, कन कन वनकनसान ७९॥
| छ | छ | छ | घ | ध्या | म | त | क | त | ध | भा |
| न | न | न | न | न | न | न | न | न | न | न |
| ध | ध | ध | ज | ग्या | प | क | क | व | क | सा |
सोरठा–जेहिं गोविंद गढ़माहिं, दुखहीको दुखदेखिये ॥
डर परलोक सदाहिं, जहँ सब लोगन को अहै ॥२४०॥