कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७२० ) बघेलवंशवर्णन ।
कवित्त ।
महादेवजीके सम देव नर दानवमें भयो न त्रिलोकी माहिं राम भक्ति धारीहै ॥
सीय बेष कीन्ही सती ताहि त्यागि दीन्ह्यो जौन दक्षकी सुता जो रही प्राणनते प्यारीहै
अब कलिकालतो कराल या कलुषमयो तामें वैसोहोय नहिं परत निहारी है ॥
महाराज विश्वनाथ तनै रघुराज वैसो भयो युगलेश कछु कहत उचारी है॥१॥
छीतूदास भगत पधारे एक समै रीवां कातिकते फागुनलों रहे सुख छायकै ॥
फगुवाके रोज रैन निकसे बजार मग राम सिय लषणको गजभै चढ़ायकै ॥
दीनबंधु धाम ढिग एक बनियाको घर रह्यो तासु सुत लै खीलौनादी चलायकै॥
चौंकि उठ्यो गज झूल जरी डोलि उठे द्रुत कोउ जन जाय कह्यो नृपको सुनायकै २
दोहा-भोर होत तेहिं बणिकको, भूपति लियो लुटाय ॥
द्वै हजारको बसनतेहिं, लीन्ह्यो तुरत मँगाय ॥ ६३ ॥
आधे आधे सो दियो, मोहन दशरथ काहिं ॥
दीनबंधु सो सुनि कियो, वणिक सहाय तहाँहिं ॥ ६४ ॥
वणिक पुत्र भगिजातभो, छीतूदासहि पास ॥
आय भक्त महराज ढिग, शासन दिय सहुलास ॥६५॥
क्षमि आगस यहि वणिकको, दीजै लूटि देवाय ॥
कुटी सिधारव कालिह हम, सुनि बोल्यो नरराय ॥६६॥
वह भगवत भागवतको, कियो महा अपराध ॥
याको देन न कहिय प्रभु, और न होई बाध ॥६७॥
यहि अपराधी वणिकको, कीन्ह्यो जौन सहाय ॥
उंचिता दंड सोउ पायहै, यह प्रभु देहि सुनाय ॥६८॥
पुनि जिन कुटी भक्त पगु धारे । महाराज उर अति मुद धारे ॥
परममित्र मंत्री यशवारा । रह्यो जौन प्राणनको प्यारा ॥
मुख्य देवान कह्यो जेहिं काहीं । लाट खिलत दीन्ह्यो मुदमाहीं ॥
ताहूको गुणि वणिक सहाई । कामकाजते दियो छोड़ांई ॥
रहे जे कामकाजी तेहि संगा । तिनहूँ छोड़ाय दियो सउमंगा ॥
दाक्षण देउरा नगर ललामा । तँहँ जेहिं थान अहै सरेंनामों ॥