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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 745

बघेलवंशवर्णन । (७१७)
होत भयो पुनि सविधि विवाहा । पूरि रह्यो काशी उदसाहा ॥
तहँ गजपति नरेशकी रानी । रूप भूप रघुराज लोभानी ॥
दोहा-कहत भई निजनाहसों, सो उरभरी उछाह ॥
महाराज रघुराजको, कस नहिं कियो विवाह॥ ४७ ॥
सो कह जब तुमसों कह्यो, तब तुम मान्यो नाहिं ॥
अब न सोच संबंध जेहिं, पूरब होत तहाँहिं ॥ ४८ ॥
चारि रोज तहँ रही बराता । कीन्ह्यो सो सत्कार अघाता ॥
पुनि सादर जब कियो बिदाई । मुद्रा दिय द्वै लाख मँगाई ॥
हय गय भूषण वसन जमाती । बड़े मोलके दिय बहु भांती ॥
पुनि सरदारन और वकीलन । मुद्रा दिय पठाय धरि पीलन ॥
नृप रघुराज फोरि सुख छाई । रुपया मोहर अमित मँगाई ॥
सौंदर रामराजसिंह काहीं । तुला चढ़ाय गंग तट माहीं ॥
सब विप्रनको दियो देवाई । जय जय ध्वनि काशी महँ छाई ॥
राम निरंजन संत महान । बसे बनारस विदित जहाना ॥
दोहा-सकल शास्त्रमें निपुण अरु, कामादिकते हीन ॥
राम निरंजन सो न अब, कतहूं संत प्रबीन ॥ ४९ ॥
महाराज रघुराज उदारा । तिनके दरश हेतु पगु धारा ॥
भूपहि आवत जानि दुवारा । चलि सेवक अस वचन उचारा ॥
नाथ दरशहित बहु नृप आवैं । दरशि दूरिते सपदि सिधावैं ॥
सो आपहु दर्शन करि आवैं । बैठन कहैं बैठि तो जावैं ॥
सुनि बोल्यो रघुराज नरेशा । बैठब तबहिं जो होइ निदेशा ॥
अस कहि प्रभु ढिग चलि सुखधामा । वार वार किय दंड प्रणामा ॥
दै अशीश बहु बैठन कहेऊ । बैठि यामलों नृप सुख लहेऊ ॥
कह प्रभु नृप विशुनाथ समाना । रामभक्त नहिं भयो जहाना ॥
दोहा-सब विद्यानिमें निपुण तिमि, दानी विदित महान ॥
तासु तनयतैसहि तुम्हहूँ, सम अबहूँ ना आन ॥२५०॥