कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७२४ ) बघेलवंशवर्णन ।
दंडनीय जहँ एक निसाना । रागरागिणी भेद विधाना ॥
क्रोध जहां क्रोधहिं पर होई । लोभ करै यशकों सब कोई ॥
जहां अधर्महिं को: है त्यागा । निज तियसों ठानब अनुरागा ॥
जहँ गृह चित्र करैं चित चोरी । बंधन जहां पशुनकों जोरी ॥
वचन असत्य कहत रोजगारी । सुताव्याह गावहिं तिय गारी ॥
चलत कुपथं जहां गज माते । कुटिल धनुष जहँदृग दरशाते ॥
सुभटनके अँग जहां कठोरा । कर्कश जहँ झिल्ली गण शोरा ॥
जहां निर्द्धनी यती निहारी । वारि नीचि गति जहां निहारी ॥
दोहा-कंपध्वजामें देखिये, बँधे धौरहर धौल ॥
शोभा सब संसारते, बसी भूप पुर नौल ॥ ८१ ॥
सोरठा-कहुँ गोविंदगढ़ माहिं, कबहूँ रीवाँ नगरमें ॥
श्रीरघुराज सोहाहिं, सब राजनके मुकुट मणि॥१॥
कबित्त घनाक्षरी ।
बंदी जे न ताकत मुसद्दी कामकाजी सबै बैठे दुहूंओर दर्दी दीननको दिलराज॥
कदी दीहवारे औ अमद्दी सरदार आगे बैठे अरिकरनं गरद्दी रणकै गराज ॥
देवनद्दी कैसी किति दिपत्ति विसद्दी जासु युगलेश साहिबी विहद्दी मनो देवराज॥
रद्दी कर दुर्जन अनंदी कर सज्जनको राजै राजगद्दी पर महाराज रघुराज ॥१॥
देन समै जोई जोई याचि राख्यो याचकहै सोई सोई देत सांच लगत न वारहै॥
भूषणअमोल गाँव वसन अमोल म्याना वाजि गज नोल मुद्रा कैयक हजारहै ॥
कहै युगलेश ऐसी रीतिहै हमेशा केरी देखत न देश कोष नेकुर्कै विचारहै ॥
राजनके राज महाराज रघुराज ऐसो आजु तौन दूजो राजा राजत उदारहै॥२॥
पटु सब विद्यन में हटत न काहूसों है निपट निशंक बुद्धि नेकु नैं हलति है ॥
चटपट जानिलेत अटपट बात सब बात कपटीनकी न केंसहू चलतिहै ॥