कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७१८ ) बघेलवंशवर्णन ।
शम्भुशतक जगदीशहू शतकै । विरच्योतुमसुनि जेहिं बुधसुछकै ॥
जस तुम भक्त अहौ नारायन । तस ईश्वरीप्रसाद नरायन ॥
जस पूरण सुख तुमते भयऊ । तैसहि उनहूँ ते सुख ठयऊ ॥
नृप पछाहियनमें कछु रूरो । बूँदी नृपति जानते पूरो ॥
तेंहिंके आये भो सुख आधो । तुम सम कोड न कृष्ण अवराधो ॥
अति प्रसन्न करि दण्ड प्रणामा । गमन्यो पुनि भूपति सुखधामा ॥
सकल देव संतन गृह जाई । यथा योग बहु द्रव्य चढ़ाई ॥
रामनगर गो सुरसरि पारा । गो लेवाय सो नृपति उदारा ॥
दोहा-रामराजसिंहकोसतिय, घर दिय पठै ससैन ॥
आपरेल चढ़ि आयकै, मिरजापुरहिसचैन ॥ ५१ ॥
पुनि बग्घी असवार है, सेन्य सहित सुख पाय ॥
रीवांको आवत भयो, लै संपति समुदाय ॥ ५२ ॥
बंधु कसौटाको विदित, वंशपती महराव ॥
महाराज सों यक समय, विनय वचन मुखगाव॥५३॥
नाहक हमें अशुद्ध जग, कहत अहैं सब लोग ॥
विमुख आपते जो भये, यहां बड़ो डर सोग ॥ ५४ ॥
स.-आपहिके हमहूँ करुणानिधि आप जो लीजिये मागहिपानी
तौ अहिती हमरे जे अहैं जे असत्य बतात तिन्हें परै जानी॥
दीजिये भात कृपाकरिकै सुधरै मम लीजिये सत्य या मानी ॥
श्रीरघुराज कह्यो हँसिकै यदुराज सुधारिहैं है सति वानी॥१॥
दोहा-भात देत सुनि नृपतिको, बरजें बहु जन वृंद ॥
महाराज कह मानिहैं, कहिहैं जस गोविंद ॥ ५५ ॥
अस कहि यक कागज लिख्यो, यह अशुद्धहै नाहिं ॥
अशुद्ध अहै यह यक लिख्यो, धरि दीन्ह्यो हरि पाहिं५६
नयन मूँदि जगदीश ढिग, पंडा तुरतहिं जाय ॥
लै आयो कागज सोई, यह अशुद्ध नहिं आय ॥ ५७ ॥