कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( ३१८ ) बीजक कबीरदास ।
हे जीवौ ! तुम बड़े जड़ हौ जैसे पानीमें पाषाणकी रेखा कहे छोटी शरबती
पथरी डारि राखै तो और भभूका आगीकों उठनलगे है । चकमक में ठोंकेते
तैसे जस जस साधुलोग उपदेश करत जाइहैं तस तस साहब को भजन तौ
नहीं करौहौ और काम क्रोध आदिक जे आगी हैं तें तुमको जोर करत जाइ
हैं । अर्थात् जब उपदेश करन लगे है तब अधिक रिस करन लगौहौ, जैसे
पाषाणमें नित हजारन घड़ा जल ढोरै पै पाषाण भीतर सूखै रहै है तैसे
केतऊ ज्ञान उपदेश करै परन्तु हे जीवौ । तुम जड़के जड़ही बने रहौहौ ॥२॥
सेते सेते सेत अंगभो शयन बढ़ी अधिकाई ।
जो सनिपात रोगिअहि मारै सो साधुन सिधि पाई ॥३॥
सेत सेत जो ब्रह्महै तामें लगे लगे तुम भीतर बाहर सफेद द्वैगये अर्थात्
बुढ़ाय गये ऊपरौ के रोमा बुढ़ाय गये । ब्रह्ममें सोवत सोवत तोको आपनों
स्वरूप भूलिगयो तब शयनमें कहे सो वन अधिकाई बढ़ी कहे अधिक सोव-
नलगे अर्थात् समाधिकरनलगे । अपनीआत्माको ज्ञान औ साहबको ज्ञान औ
जगत् भूलिगयो पिशाचवत् मूकवत् जड़वत् उन्मत्तवत् बालवत् तेरीदशाद्वैगई ।
सोई लक्षण सन्निपातमें होइहै सो तोको सन्निपात भयो है । सन्निपातरोंग
याको मारैहै औ उनको आत्माको ज्ञान भूलि जाइहै । ब्रह्म हैबो साधुलोग
सिद्धि पाईहैं कि, हम सिद्धहैं यह मानि ले ही आत्माको ब्रह्म हैबो असिद्धहै
सो आगे कहैं हैं । " सीते सीते पाठहोइ तौ ज्ञान करत करत कि, संसार
ताप हमारो छूटि जाइ शीत अंग द्वैगये । कहे सन्निपातकी अधिकाई तुम्हारे
अङ्गमें बढ़िआई अर्थात् सन्निपात में खबरि देह की भूलि जाइहै । औ रोगी-
यनका मारै है सोई साधुलोग सिद्धिपाई है कि, हमको देहकी खबरि भूलिगई
हम सिद्ध द्वैगये ॥ ३ ॥
अनहद कहत कहत जग विनशे अनहद सृष्टि समानी ॥
निकट पयाना यमपुर धावै बोलहि एकै बानी ॥ ४ ॥
वह जो ब्रह्म है ताकी हद नहीं है ताको अनहद कहत कहत कहे नेति
नेति कहत २ संसार विनशि गयो । अनहद जो ब्रह्म है तामें सृष्टिके सब
शब्द । (३१९)
लोग समाइगये औ सृष्टिमें वह अनहदब्रह्म समाइ गयो सो मानत तों यहहै
कि, सब ब्रह्महीमें समाइहै कहे ब्रह्म ह्वै जाइहै परन्तु निकट पयाना यमपुर-
हीको धाइबो है अर्थात् अपनेको ब्रह्ममानिकै ब्रह्मनहीं होइहै यमपुरही को
चलेजायाँहैं तेऊ एकही वाणी बोलैहैं कि, एक ब्रह्मही है दूसरा नहीं है ।
तामें धुनि यहहै कि, अरे मूढ़ एकतो ब्रह्म है नरकै कौन जायहै ॥ ४ ॥
सतगुरु मिले बहुत सुख लहिया सतगुरु शब्द सुधारै ।
कह कबीर सो सदा सुखारी जो यहि पदहि विचारै ॥५॥
हे जीवौ! तुमको सतगुरु मिलै तौ वे राम नाम रूपी पदमें साहब मुख अर्थ
बताइ देइं । तौनेको जोतुम बिचारौ तौ बहुत सुख पावो श्रीकबीरजी कहैहैं जे
शब्दन्को अनर्थ अर्थ बताइकै गुरुवालोगन बिगारि डारचो है ते शब्द सतगुरु
सुधारैहैं काहेते अनर्थ अर्थ खंडन करिकै वे वेद शास्त्रादिकन के शब्दके तात्प-
र्यार्थ छोड़ाइकै साहब मुख अर्थ बताइदेइहैं । सो जो वा शब्द जो, रामनाम ताकों
जगद् मुख' अर्थ बताइ देइहै सो जो कोई राम नामरूपी पद में साहब मुख
अर्थ बिचार सो सदा सुखी रहैहै ॥ ५ ॥
इति सत्तावनवां शब्द समाप्त ।
अथ अट्ठावनवां शब्द ॥ ५८ ॥
नर हर लागी दव विकार बिन ईंधन मिलै न बुझावन हारा।
मैं जानों तोहींते व्यापै जरत सकल संसारा ॥ १ ॥
पानी माहूँ अगिनिको अंकुर मिल न बुझावन पानी ।
एक न जरै जरै नौ नारी युक्ति न काहू जानी ॥ २ ॥
शहर जरै पहरू सुख सोवै कहै कुशल घर मेरा ।
कुरिया जरै वस्तु नेज उबरे विकल राम रँग तेरा ॥ ३ ॥
कुबिजा पुरुष गले एक लागी पूजि न मनकी साधा ।
करत विचार जन्म गो खीसा ई तन रहल असाधा ॥४॥
( ३२० ) बीजक कबीरदास ।
जानि बूझि जो कपट करतहै तेहि अस मंद न कोई ।
कह कबीर सब तरि रामकी मोते और न कोई ॥ ६ ॥
नर हर लागी दव बिकार बिन ईंधन मिलै न बुझावन हारा ।
मैं जानों तोहीं ते व्यापै जरत सकल संसारा ॥ १ ॥
हे नरहर दवलागी कहे तेरे स्वरूप की हरनवारी मायारूपी दवारि लगी है ।
तैं कैसैहै ? विकार बिन । तौ माया मोको काहेको लगीहै ? तौ विना ईंधन
को बुझावनवारो तोको नहीं मिल्यो, जो तोको समुझाइ देई कि, तैं बिन
विकारको है जो मिलौहै सो नाना उपासना नाना मत रूप ईंधन डानर वारो
मिलाहै । साहबको ज्ञान रूप जल डारै माया रूप दवारि कैसे बुझाइ सो मैं
जानौ हौं या मायारूपी दवारि तोहीते उत्पन्न भै अर्थात् मायादिक तोहीं तें
भये ताहीमें सब संसार जरो जाइहै ॥ १ ॥
पानी माँह अगिनिको अंकुर मिलन बुझावन पानी ।
एक न जरै जरै नौ नारी युक्ति न काहू जानी ॥२॥
सो वह मायारूपी अग्निको अंकुर पानीमें है कहे नाना वेद शास्त्रादिक वाणीमें
हैं ते वेद शास्त्रादिकनके अर्थको बदलिकै साहबको छिपाइक मायारूपी अग्निको
प्रकट कियो औ तोकोऔरै औरैमें लगाइ दियो । अर्थात् वे सब मतनको फल
ब्रह्मह्वै जाइबो बताइ दियो । वह अग्निको बुझावन को वेद शास्त्रादिकन को जो
सांच अर्थहैं जल सो नहीं मिलै है । अथवा जे वेद शास्त्रादिकन के सांच अर्थ
मुनि जन लोग बनाइ गये हैं, बशिष्ठ संहिता, शुक संहिता हनुमत्संहिता, अग-
स्त्यसंहिता, सदाशिवसंहिता, सुन्दरीतंत्रादिक ग्रन्थ औ वेदशिरोपनिषद्
विश्वम्भरोपनिषदादिक सांचे मतके कहनवारेते जल नहीं मिलैहै । सो जब वह
आगि लगी तब अद्वैत करिकै बहुत समुझावैहैं परन्तु एक वह आत्मा नहीं जरै
औ साहबमें जे नवधा भक्तिहैं ते नव नारी हैं ते जरैहैं सोयह युक्ति कोई नहीं
जान्यो कि आत्मा ब्रह्म नहीं होइहै औ साहब को जानै तौ वे नवधा भक्ति
न जरैं ॥ २ ॥
शब्द । ( ३२१ )
शहर जरै पहरू सुख सोवै कहै कुशल घर मेरा ।
कुरिया जरै वस्तु निज उवरै विकल राम रंगतेरा ॥३॥
औ शहर कहै साहबके मिलिबे के जेते ज्ञानहैं जीवात्मा के ते जरै जाइहैं
औ पहरू जो आत्मा सो सुखसों सोवै है कहै साहबके बतावनवारे संतनहीं दुरैहैं
जे आपने बाणीरूप जलसों माया ब्रह्म रूपी आगी बुतावै । सोवतै रहैहै औ
यह कहै है कि, मैं सच्चिदानन्द हों, सो मेरोघर जोहै सच्चिदानन्द सो कुशलहै यह
नहीं जानै है कि, ये सब तो जरिही गये सो मैंहू जरिजाउँगो। एक माया ब्रह्मरूपी
आगिही रहिजायगी । वही आगिमैं तेरी कुरिया जोहै स्वस्वरूप ज्ञानकी सोऊ
जरिजाइगी । अर्थात् जब ब्रह्मास्मि में सुषुप्ति होयगी तब मैं सच्चिदानन्द
रूपहौं यहू ज्ञान न रहिजाइगो । याही ते तैं विकल है सो यह करु जाते तेरी
वस्तुजो है साहब में नवधा भक्ति सो उबरै औरे औरे रंगमें लगिबो तेरो रंग
नहीं है श्रीरामचन्द्रके रंगमें रंग यही तेरो रंग है ॥ ३ ॥
कुबिजा पुरुष गले एक लागी पूजि न मनकी साधा ।
करत विचार जन्मगो खीसा ई तन रहल असाधा ॥ ४ ॥
कुबिजा पुरुष कहै अंगभंग पुरुष जो वह ब्रह्म है नपुंसक ताको एकमानिकै
कि, एक ब्रह्मही है ताकेगले में, हे साहबकी जीवरूपाशक्ति ! तैं लागी सो
जैसे नपुंसक पुरुषकेसंग स्त्रीकी साधनहीं पूजै है तैसे वह ब्रह्म में लगे
तुम्हारी साध नहीं पूजै है कहै वामें आनंद नहीं मिलैहै । वही ब्रह्मको विचार
करत जन्म खीस कहै वृथा जाइ है । तन कहै यह मनुष्य शरीर पाइकै
असाध रहै है कहै साहबके मिलनको सुख नहीं पावै है ॥ ४ ॥
जानि बूझि जो कपट करतहै तेहि अस मंद न कोई ।
कह कबीर सब नारि रामकी मोते और न होई ॥ ५ ॥
सो जानि बूझिकै जे लोग कपट करै हैं कहै वह धोखा ब्रह्ममें लगे हैं तिन
ऐसो मंद कहै मूढ कोई नहीं है । सो कबीरजी कहै हैं कि, जहांभर चित्
शक्ति जीव हैं ते सब श्रीरामचन्द्रकी नारी हैं सो मैं जानौ हौं, याते मोते और
२१
( ३२२ ) बीजक कबीरदास ।
पुरुष साहवै है सो जे परम पुरुष श्रीरामचन्द्र को छोड़ि और पुरुष करैं हैं ते
छिनारि हैं सो जो छिनारि हैं तिनके ऊपर संसार रूपी मार परोई चाहै ।
तामें व्यंग्य यहहै कि, जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रको पति मानैं हैं तेई माया
झझामिते बचै हैं ॥ ५ ॥
इति अठवनवां शब्द समाप्त ।
अथ उनसठवां शब्द ॥ ५९ ॥
माया महा ठगिनि हम जानी ।
तिरगुण फांस लिये कर डोलै बोलै मधुरी वानी ॥ १ ॥
केशवके कमला ह्वै बैठी शिवके भवन भवानी ।
पंडाके मूरति ह्वै बैठी तीरथमें भइ पानी ॥ २ ॥
योगीके योगिनि ह्वै बैठी राजाके घर रानी ।
काहूके हीरा ह्वै बैठी काहूके कौड़ी कानी ॥ ३ ॥
भक्तनके भक्तिनि ह्वै बैठी ब्रह्माके ब्रह्मानी ।
कहै कबीर सुनो हो संतो यह सब अकथ कहानी ॥४॥
माया महा ठगिनि है हम जानी । यह माया माधुरी बानी बोलिकै त्रिगुण
फांसते सब जीवनको बांधिलियो । औ सबके घरमें नानारूप करिकै बैठीहै;
केशवके कमला ह्वैकै बैठी है, औ शिवके भवनभवानी ह्वैकै बैठी है, औ पंडाके
मूरति ह्वै बैठी है, औ तीरथमें पानी ह्वै रही है, औ योगीके घरमें योगिनि ह्वै
बैठी है, औ राजाके रानी ह्वै बैठीहै, औ काहूके हीरा ह्वै बैठी है, औ काहूके
कानी कौड़ी ह्वैकै बैठी है, औ ब्रह्माके ब्रह्मानी ह्वै बैठी है । सो कबीरजी कहै
हैं कि, हे संतो ! सुनो यह सब मायाको चरित्र अकथ कहानी कहाँलौं वर्णन
करौं यह माया सत् असत्ते विलक्षण है कहिबे लायक नहीं है अरु याको
अंतनहीं है ॥ १-४ ॥
इति उनसठवां शब्द समाप्त ।
शब्द । ( ३२३ )
अथ साठवां शब्द ॥ ६० ॥
मायामोहहिमोहितकीन्हा । तातेज्ञानरतनहरिलीन्हा ॥१॥
जीवन ऐसो सपना जैसो जीवन सपन समाना ।
शब्द गुरु उपदेश दियो तैं छांड़्यो परम निधाना ॥ २ ॥
ज्योतिहि देखि पतंग हुलसै पशु नहिं पेखै आगी ।
काम क्रोध नर मुगुध परे हैं कनक कामिनी लागी ॥३॥
सय्यद् शेख किताबें निरखै पंडित शास्त्र विचारै ।
सद्गुरुके उपदेश बिना तुम जानिकै जीवहि मारै ॥ ४ ॥
करौ विचार विकार परिहरौ तरन तारनै सोई ।
कहकवीर भगवंत भजन करु द्वितीया और न कोई॥५॥
मायामोहहिमोहितकीन्हा । तातेज्ञानरतन हरिलीन्हा॥१॥
पूर्व जो वर्णन करिआये सो माया जीवको मोहित करत भई । सांचमें
असांचकी बुद्धि होय है या मोहको लक्षण है । सो यह आत्मा तो शरीरनते
भिन्न सांच है ताको शरीरकी बुद्धि भई कि, शरीर मैं हों, मनादिक मेरे हैं ।
यह असांच बुद्धि भई याहीते मायामें परिगयो। तब याको माया मोहते मोहित
करिकै परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र हैं तिन को ज्ञान रतन जो रहै कि, मैं
उनको अंशहौं, वे बड़े रतन हैं, मैं कनीहौं अल्पज्ञ हौं परन्तु जाति उन
हींकी हौं, वे विभु आनन्द हैं जैसे उनमें मनादिक नहीं हैं तैसे मैं
जो उनको जानौं तो महूँ मनादिक नहीं हैं यह जीवको ज्ञान रत्न माया
हरिलीन्हो ॥ १ ॥
जीवन ऐसो सपना जैसो जीवन सपन समाना ।
शब्द गुरु उपदेश दियो तैं छांड़्यो परम निधाना॥२॥
यह जीवन ऐसो है स्वप्न है यहि शरीरते दूसरे शरीरमें गयो तब यह
शरीर स्वप्न ह्वै गयो औ वह जीव स्वप्न जे संपूर्ण शरीर हैं तिनमें नहीं समान्यो
( ३२४ ) बीजक कबीरदास ।
वहि शरीर ते भिन्न है काहेते मरिबों जीबो शरीरको धर्म है, सो अपने
स्वरूपको नहीं जानै है स्वप्न समान जे शरीर हैं तिनको सांच मानिलियो है ।
गुरु कहे सबते गुरुपरमपुरुष पर जे श्रीरामचन्द्रहैं ते शब्द जो रामनाम ताकों
उपदेश दियो कि, तैं मेरो है सो मेरे पास आउ सो तौने शब्दमें परमनि-
धान कहे तिनके रहिबेको पात्र जो साहब मुख अर्थ है ताको शब्द् छोड़ि
दियो औ संसार मुख अर्थ करिकै संसारी हैगयो ॥ २ ॥
ज्योतिहि देखि पतंग हूलसै पशु नहिं पेखै आगी ।
कामक्रोध नर मुगुध परैहैं कनक कामिनीलागी ॥३॥
जैसे दीपककी ज्योतिको देखिकै पतंग हूलसै कहे ज्योतिमें मिलिबेकौं
जाय है परंतु वहै पशु जो है अज्ञानी पतंग सो नहीं देखै है कि, या आगी
है यामें जरि जै हैं सो वहीं धसिकै जरि जाय है । तैसे काम क्रोधादिकनमें
जीव मुगुध परै हैं या नहीं जानै हैं कि, यामें जरि जायेंगे ॥ ३ ॥
सय्यद शेख किताव नीरखै पंडित शास्त्र विचारै ।
सद्गुरुके उपदेश विना तुम जानिकै जीवहि मारै ॥ ४ ॥
सो हे सय्यद शेखौ ! तुम किताब देखिकै नाना कर्म करौहौ औ हे
पण्डितौ ! तुम नाना शास्त्र पुराण पढ़िकै सुनिकै नाना कर्म करौ हौ । सद्गु-
रुको उपदेश तौ तुम लियो नहीं असतगुरुन के पास जाइ जाइ उन्हीं कों
उपदेश पाइकै जानि जानिकै तुम अपने जीव को मारौहौ] कहे जनन मरण
रूप दुःख देउहौ । साहब के जाननवारे जे हैं तिनके पास नहीं जाउहौ जे
साहबको बताइदेइँ, औ जन्म मरण तुम्हारो छूटि जाइ या मकारते जानिकै
आपनी आत्माको मारौ हौ तामें प्रमाण॥"नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं
गुरुकर्णधारम् । मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान्भवाब्धिं न तरेत्स आत्महा"॥
इति श्रीभागवते ॥ ४ ॥
करो विचार विकार परि हरौ तरन तारने सोई ।
कह कबीर भगवन्त भजन करु द्वितीया और न कोई॥५
शब्द । ( ३२५ )
सो विचार करौ औ सम्पूर्ण जे विकार तिनको परिहरौ कहे छोड़ो । तरण
तारण एक पुरुष पर श्रीरामचन्द्रही हैं । श्री कबीरजी कहै हैं कि, तिन-
हींको भजन करु, उनते और दूसरो तेरो छोड़ावन वारो नहीं है । इहां
तरण तारण दुइ कह्यो, सो तरण जो है मुक्ति ह्वैवेकी इच्छा ताते तारणवारो
कोई नहीं है वोई हैं । वही मुक्तिकी इच्छा करिकै कोई ब्रह्मज्ञान कोई
आत्मज्ञान कोई दहरो पासनादिक नाना उपासना करिकै तरनको चाहै हैं
परन्तु कोई तरै नहीं हैं, जब तरनकी चाह छूटिजाइहै तब मुक्ति होइहै । सो
यह तरनकी इच्छाते एक परम पुरुष श्रीरामचन्द्रही तारिदैहैं । अर्थात
उनहींकी दीन मुक्ति दैजाइहै औरकी दीन मुक्ति नहीं दैजाइहै। जबभर तरनकी
इच्छा होइहै तबभर मुक्ति नहीं होइहै तामें प्रमाण॥ “भुक्तिमुक्तिस्पृहायावत्पिशाची-
हृदिवर्त्तते। तावद्भक्तिसुखस्पर्शःकथमभ्युदयो भवेत्”॥ इति भक्तिरसामृतसिन्धौ ॥
इति साठवां शब्द समाप्त ।
अथ इकसठवां शब्द ॥ ६१ ॥
मरिहौ रे तन कालै करिहौ। प्राण छुटे बाहर लै धरिहौ॥ १॥
काय विमुरचन अनवनि बाटी। कोइ जारै कोइ गाड़ै माटी२
हिंदू लै जारै तुरुक लै गाड़ै। ई परपंच दुनौ घर छाड़ै॥ ३॥
कर्म फांस यम जाल पसारा। ज्यों धीमर मछरी गहि मारा४॥
राम बिना नर हैहौ कैसा । वाट मांझ गोवरौरा जैसा ॥ ५ ॥
कह कबीर पाछे पछितैहौ । या घरसों जब वा घर जैहौ॥६॥
मरिहौरे तन कालै करिहौ । प्राण छुटे बाहर लै धरिहौ॥१॥
काय विगुरचन अनवनि वाटी।कोइ जारै कोइ गाड़े माटी२
हे जीवो ! तुम मरिहौ तौ फिर तन लैहौ तौनेको लैके का करिहौ । का
या तनते कियेौहै का वा तनते करिहौ । जबप्राण छूटैगो तब वाहू शरीरको
( ३२६ ) बीजक कबीरदास ।
लैकैं बाहरै धरोगे ॥ १ ॥ सो या काया जो है: ताकों बिगुरचन कहै छूटैमें
आनि आनि बाटि है काहेते कोई तो या कायाको जारैहै, औ कोई माटीमें
गाड़ैहैं, सो जो गाड़ैहै औ जारै है तिनको अब कहै हैं ॥ २ ॥
हिंदू लै जारै तुरुक लै गाड़ै । ई परपंच दुनौ घर छाड़ै ॥ ३ ॥
कर्म फांस यम जाल पसारा। ज्यों धीमर मछरी गहि मारा ॥४॥
राम बिना नर हैहौ कैसा । वाट मांझ गोबरौरा जैसा ॥ ५ ॥
सो हिंदू जेहैं ते तो जारैहैं औ तुरक नैहैं ते गाड़ैहैं । सो ई दूनौ घरमें जो
परपञ्च है ताको तू छाड़ै ॥ ३ ॥ संसारमें यमराज कर्म फांस रूपी जाल पसा-
रिराख्योहै । जाही शरीरमें जीव जायहै तहँ मारि डारैहैं जैसे धीमर जौने डाव-
रमें मछरी जायहै तौनेही डावरते खैंचिकै मारिडारै है । तब शरीरकी नाना
वाटि होइहै भस्म होयहै कीरा होयहै विष्ठा होय जायहै ॥ ४ ॥ सो हे
जीवो ! बिना साहबके जाने तुम कैसे होउगे बाटमें, जैसे गोबरौरा जोई आवै
जाय सोई कचरि देइहै मरिजायहै ॥ ५ ॥
कह कबीर पाछे पछितैहौ । या घरसों जब वा घर जैहौ ॥६॥
सो कबीरजी कहै हैं कि, जब या घरसों वा घर जाउगे अर्थात् जब यह
शरीर ते दूसरो शरीर धरौगे, गर्भवास होइगो तब पछिताउगे । गर्भवासमें
साहब की सुधि होइहै सो जब गर्भवासको क्लेश होइगो तब कहौगे कि, हें
साहब अबकी बार जो छुड़ावो तौ फिर न ऐसे काम करेंगे । सो गर्भ स्तुति
श्रीमद्भागवतादिकनमें प्रसिद्ध है । तेहिते यह व्यंग है कि, परम पुरुष पर
श्रीरामचन्द्रको जानो ॥ ६ ॥
इति इकसठवां शब्द समाप्त ।
अथ बासठवां शब्द ॥ ६२ ॥
माई मैं दूनों कुल उजियारी ।
बारह खसम नैहरे खायो सोरह खायो ससुरारी ॥ १ ॥
सासु ननाँदि मिलि पटिया वांधल भसुरा परलो गारी ।
शब्द । ( ३२७ )
जारों मांग मैं तासु नारिकी सरिवर रचल हमारी ॥ २ ॥
जना पांच कोखियामें राखौं औ राखौं दुइ चारी ।
पार परोसिनि करों कलेवा संगहि बुधि महतारी ॥ ३ ॥
सहजै बपुरी सेज बिछायो सूतल पाउँ पसारी ।
आउँ न जाउँ मरों ना जीवों साहब मेट्यो गारी ॥ ४ ॥
एक नाम मैं निजके गहिल्यो तौ छूटल संसारी ।
एक नाम मैं बदिकै लेखौ कहै कबीर पुकारी ॥ ५ ॥
माई मैं दूनौ कुल उजियारी ।
बारह खसम नैहरे खायो सोरह खायो ससुरारी ॥ १ ॥
चित् शक्ति कहै है कि, हे माई! कहे हे माया! मैं दूनों कुल उजियार कर-
नहारी हौं कहे मोहींते जीव कुल उजियार हैं।जीवछः प्रकारके है १ मुक्त
२ मुमुक्षु ३विषयी ४बद्ध ५नित्यबद्ध ६नित्यमुक्त।औ ब्रह्म कुल उजियारहै सब ईश्वर
ब्रह्म कुलहीमें हैं याते ब्रह्मकुल कह्यो । मैंहीं अनुभव करौहौं तब ब्रह्म होइहै औ
मैंहीं सब जीवकी चैतन्यता हौं सो बारह खसमको नैहरमें खायो । ते बारह
खसम कौनहैं तिनको कहै हैं-अष्टप्रधान जे हैं काली, कौशिकी, विष्णु, शिव,
ब्रह्मा, सूर्य, गणेश, भैरव, औ नवौं परमपुरुष जिनके ई आठौ प्रधान कहे
मंत्री हैं । इनको महातंत्रमें वर्णन है । औ पांच ब्रह्म आदि मंगलमें
वर्णन करिआये हैं तिन में रफरूप जो है सो मंत्ररूप है औ परा शक्ति है
ताको शक्तिमान में अंर्तभाव है । औ शब्दब्रह्म प्रणवरूप है सो उपास्य देवता
नहीं है, विचार करिबेलायकैहै। तेहिते पांचब्रह्ममें तीनि ब्रह्म उपासना करिवे
लायक हैं सो अष्टप्रधान औ नवौं परमपुरुष औ तीनिब्रह्म मिलाइकै बारह
उपास्य भये तेई खसम भये तिनको शुद्ध समष्टि जो है सोई नैहर है जहांतें
व्यष्टि होइहै । सो जहां समष्टि व्यष्टि भयो है तहां मैं इनको खाइलियो है कहें
पेटमें डारिलियो है मोहिते भिन्ननहीं है औ जब मैं अहंब्रह्म बुद्धि करिकै ब्रह्ममें
( ३३० ) बीजक कबीरदास ।
अथ तिरसठवां शब्द ॥ ६३ ॥
मैं कासों कहौं को सुनै को पतिआय ।
फुलवाके छुवत भँवर मरि जाय ॥ १ ॥
गगन मँडल विच फूल यक फूला ।
तर भो डार उपर भो मूला ॥ २ ॥
जोतिये न वोइये सिचिये न सोइ ।
विन डार बिना पात फूल यक होइ ॥३॥
फुल भल फुलल मालिनि भल गूंथल ।
फुलवा विनाशि गयल भँवर निरासल ॥४ ॥
कह कबीर सुनो संतो भाई ।
पंडित जन फूल रहे लुभाई ॥ ५ ॥
मैंकासों कहौं को सुनै को पतिआय ।
फुलवाके छुवत भँवर मरि जाय ॥ १ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि, मैं जासों कहौं हौं सो तो सुनतई नहीं है औ जो सुन्यौ
तौ शंका कियो ताको समाधान करि दियो असांच निकारिडार्यो सांचेको स्थापित
कियो सो यद्यपि वाको जवाब नहीं चलै है तौ यह कहै है कि, यह जोलहाको
कह्यो वेद शास्त्र को सार अर्थ विचार कैसे होइगो ताते कोई मोको पतिआय
नहीं है येतो सब धोखामें अटके हैं मैं कासों कहौं को सुने । कौन बात कहा
हौं कि, वह धोखा ब्रह्म आकाशको फूल है ताके छुवतमें भँवर जोहै तिहारों
जीवात्मा सो मरि जाय हैं कहे तुम नहीं रहिजाउहौ, वही धोखा ब्रह्मई रहि-
जाइहै वाके आगेकी बात तुमकैसे जानोगे याते तुम परमपुरुष परश्रीरामच-
न्द्रको जानो । वे जब अपनी इंद्री दैँहैंगे तब वह ब्रह्मके ऊपरकी बात जानि
परैगी । जौन हंसशरीर देइहै सो याके नित्य स्वरूपहै सो नित्य स्वरूपत
: ह्वै + गयो.
भवँर has candrabindu on व.
-
``
सो निराश ह्वैगयो ॥ ४ ॥
Wait:निराशhas talavyaश.
ह्वैगयो ॥ ४ ॥. -
``
कह कबीर सुनो संतो भाईपंडित जन फुल रहे लोभाई ५
Wait,भाईपंडित: is there a space?
Look atभाईandपंडित:ईandपंshare or touch? There is almost no space, let's writeभाईपंडित.
फुल रहे लोभाई ५: digit५at the end without danda.
Wait,फुलhas shortु. -
``
श्रीकबीर जी कहैं हैं कि, हे संतो ! भाइउ सुनो वही ब्रह्मफूलमें पंडितजन
Wait:श्रीकबीर: together.
जी कहैं हैं कि,- comma after कि.
हे संतो !- space before exclamation mark.
भाइउ:भाइउ->भाइउ!
सुनो वही ब्रह्मफूलमें पंडितजन:ब्रह्मफूलमेंtogether,पंडितजनtogether.
( ३३२ ) बीजक कबीरदास ।
औ वही ब्रह्म को निराकार अकर्त्ता निर्धर्मिक कहौ हौं कहो तो वह ब्रह्म को
जान्यो कौन ? अरु वाको निर्वस्तु कहौ हौ कि, वह कुछ वस्तु नहीं है? देशकाल
वस्तु परिच्छेदते शून्यहै कहो तो वह धोखई रहिगयो किं, कुछ वस्तु रहिगयो !
सो निहारेही बातमें वह धोखा जान्यो परै है कि, कुछ नहीं है शून्यहै तेहितें
परमपुरुषवर श्रीरामचन्द्रमें लागौ जाते माया ब्रह्मके पार है उनहीके पास
पहुंचैजाइं औ आवागमनते रहित द्वैजाउ ॥ ५ ॥
इति तिरंसठ शब्द समाप्त ।
अथ चौंसठवां शब्द ॥ ६४ ॥
जोलहा वीनेहु हो हरिनामा जाकेसुर नरमुनि धरैं ध्याना।
ताना तनैको अउठा लीन्हे चर्खी चारिहु वेदा
सर खूटी यक राम नरायण पूरण कामहि माना ॥ १ ॥
भवसागर यक कठवत कीन्हों तामें माड़ी सानी
माड़ीको तन माड़ि रहो है माड़ी विरला जाना ।
त्रिभुवन नाथ जो मंजन लागे इयाम मुररिया दीना
चांद सूर्य दुइ गोड़ा कीन्हो मांझ दीप किय ताना ॥ २ ॥
पाई करिकै भरना लीन्हो वे बांधै को रामा
वे ये भरि तिहुं लोकै वांधै कोइ न रहै उवाना ।
तीन लोक एक करिगह कीन्हो दिगमग कीन्हो तानै
आदि पुरुष बैठावन बैठे कविरा ज्योति समाना ॥ ३ ॥
श्रीकबीरजी रामानंदके शिष्यै हैं सो अपनी संप्रदाय बतावैहैं ॥
१ कबीर साहब रामानन्दके कैसे शिष्यहैं सोजाननेके हेतु-कबीरभानुप्रकाश,
कबीर मन्सूर, रामानन्द गुष्ठी और आत्मदासजीकृत कबीर सागर देखना चाहिये ।
विप्रमतीसी, कहरा, बसंत, चांचर, बेलि, बिरहुली एवं हिंडोला प्रकरण
शब्द । ( ३३३ )
जोलहा बीनेहु हो हरि नामा। जाके सुर नर मुनि धरैं ध्याना ।
ताना तनैको अउठा लीन्हे चर्खी चारिहु वेदा
सरखूटी यक राम नरायण पूरण कामहि माना ॥ १ ॥
श्रीकबीरजी कहैहैं कि, जोलहा जो मैं हौं सो हरिके नामको बिनौ हौं । वें
हरि कैसेहैं कि, जिनको सुर नर मुनि ध्यान धरै हैं । कौनी तरहते बिनौहौं सो
उपाय कहौहौं । कोरिनके यहां ताना तनिबेको अउठाने नापिलेइहैं औ इहां
अउठानो शरीरहै ताको साढ़ेतीनिहाथको नापिलियो अथवा अंगुष्ठमात्र लिंगश-
रिरहै सो मनोमय है ताको मैं हरिनाम बिनिबेको धारणकियो है । नहीं तौ मैं
मनके परे रह्यो हौं । औ कोरिनके इहां चर्खीते सूत खैंचिकै केंडा करि लेइहैं,
औ इहां चारो वेद जे हैं तेई चर्खी हैं तिनके तात्पर्यते आत्माको स्वरूप “कि
तैं परमपुरुषपर श्रीरामचन्द्रको है” यहीसूत जीवात्माको निकास्यो । औ कोरि-
नके इहां सर औ खूंटीते तानाको पूरैहैं अरु इहां श्री इहां वैष्णवह्वै गुरुके मंत्र
पावैहै रघुनाथजीको षडक्षर और नारायणको द्वयक्षर औ अष्टाक्षर सो सर खूटी•
राम औ नारायण ये नामहैं । एकनामको सरबनायो एक नामको खूटी बनायो
इनहींको नामलिये हरिनामरूपी कपरा बिनिबे को मैं अधिकारी भयो । यह मैं
मान्यो कि, मैं पूरिदेहौं रामनाम दुइ खूंटी हैं नारायण नामसर है ॥ १ ॥
भव खागर यक कठवत कीन्हो तामें माड़ी सानी ।
माड़ीको तन माड़ि रहोहै माड़ो विरला जाना ।
त्रिभुवन नाथ जो मंजन लागे इयाम मुरारिया दीना ।
चाँद सूर्य दुइ गोड़ाकीन्हो मांझदीप किय ताना ॥ २ ॥
कोरिनके इहां माड़ी सानी जाइहै तब एक कठौतामें धरैं हैं सो इहां भवसा-
गर कठौताहै औ चारों शरीर माड़ी हैं तामें जीव सूतसनो है इहां साधनअव-
स्थामें चारों शरीरमें वह नामको भावनाकरिकै जो जपिबो है मुमुक्षुदशामें
सोई सानिबो है सो नाम उच्चारणकी विधि कोई विरला जानै है सो रामानुजा-
चार्य आपने राममंत्रार्थमें लिख्यो है यह नाम स्मरणको शरीर धारण कियो सों
( ३३४ ) बीजक कबीरदास ।
जब नामस्मरण न कियो सोई शरीर रूपी माड़ी याके माड़ि रह्योहै कहे लपटि
रही है औ कोरिनके जब वाको मांजे हैं तब मांडी सम हैजाइहै औ मैल छूटि
जाइहै। औ इहां त्रिभुवननाथ जो मनहै सो रेचक कुंभक पूरक जे कूचाहैं तिनमें
मांजनलग्यो कहे नामको जपनलग्यो औ जीवको माड़ी जोहै चारो शरीर
तिनको सम कै दियो कहे एक करि दियो औ । कोरिनके मांजत में जब तागा
टूटि जाइहै तौनेको मुरेरिकै जोरि देइहै सो मुररिया कहावैहै इहां नामके स्मरण
में जब बीचपरै है तब कहीं श्याम कहीं गोपाल कहीं कृष्ण इत्यादिक नाम लैके
धागा जोरिदेइहै। औ कोरिनके दुइगोडा कहे दुइ घोरियाके बीचमें ताना तनेंहैं औ
इहां चांद सूर्य जे इड़ा पिंगला तिनके बीचमें दीप जो सुषुम्णा नाड़ी है ताको
ताना कियो। ताना वाको काहेते कह्यो कि, वह साहबके लोकते लै मूलाधारचक्र
लौं रश्मिरूप तनी है जीवही सुषुष्णा नाड़ी है भक्तन को जी उतरै चढ़ै है ॥२॥
पाई करिकै भरना लीन्हो वे बांधै को रामा
वे ये भरितिहुँ लोकै बांधै कोइ न रहे उवाना ।
तीन लोक यक करिगह कीन्हो दिगमग कीन्हो तानै
आदि पुरुष वैठावन बैठे कविरा ज्योति समाना ॥ ३॥
कोरिनके इहां पाई साफ करिबेको कहै हैं औ कमठिनके बीचते
सूत निकासी लेइहै सो भरना कहावै है सो इहां चारो शरीर माड़ी
मांजिकै कहे चारयो शरीर छोड़ायकै जीवको साफ करि कै कहे सूक्ष्म
बिचारते जीव को स्वरूप निकस्यो कि, रामहीको है औरेको नहीं है औ
कोरिनके राक्षकी जो कमठी ताके छिद्र ह्वै सब सूतको निकासीलेई है औ दुइ
सूत बांधिदेइह सो वे कहावैंहैं औ तीनि फेरी करिकै सूतको गांसि देई है सो
तिलोक कहावैहै। औ उबान वह कहावैहै जो बाहर सूत रहिजाइहै सो उबान न
रहिगयो सो इहां दोनों कुंभकमें राम जे दुइबर्ण हैं रकार मकार तिनको बांधि
दियो । बहिरे जब श्वास जाइहै तब जहांते थंभिकै लौटै है सो कुंभक कहावै है
तहां रकार जपै है तब सूर्यके प्रकाशको भावनाकरै है औ जब भीतर श्वास जाइहै
औ थंभिकै लौटै है तहां मकार जपै है तब चन्द्रमाको प्रकाशको भावना करै है
सो जौन साधारण श्वास चलैहै नासिकाते बारह आंगुर भीतर जायहै बारह
आंगुर बाहर जायहै जहां जहांते थंभि थंभिकै लौटै है तहां रकार मकार को
जपिकै वे आंगुरनको घटाइ बूझै दूनों कुंभकनको घटावनलगै इसतरहते वे जो हैं
श्वास ताके बांधतमें जब श्वासके क्रमते घटाइक तहुँलोकै बांधै कहे त्रिकुटीमें
बांधिदेइ अर्थात् एक आंगुर भीतर जानपावै न एक आंगुर बाहर जानपावै औ
एक आंगुर बीचमें राखै सो यहि तरहते जो कोई करै है सोई उबान नहीं रहै है
कहै संकल्प विकल्प मिटि जाइहै जपकरतमें काहेको उबैगो ताको रामनामही
तीनों लोक देख परै है वोत बाहर नहीं देखपरै है। जहां कोरी बीननको बैठै है
सो कारिगह कहावै है जब कपरा बीनि चुके तब तहां तीनि घरी करिकै कपरा
धरि देइहै औ तानाको दिगमग कहे जहां तहां डारिदेइहै इहां तीनि लोकमें
फैली जो जीवकी वृत्ति है ताको जहां अपने स्वरूपमें आत्माकी स्थिति है तहां
कैवल्यमें राख्यो । तीनि आंगुर श्वासा करिकै जो स्मरण करतरह्यो सो मन पव-
नको एक घर कै दियो तब संकल्प विकल्प सब मिटिगयो यह ताना शरीरमें
तन्यो रह्यो ताको दिगमग कियो कहे पृथ्वीको अंश पृथ्वीमें जलको अंश
जलमे तेजको अंश तेजमें वायुको अंश वायुमें आकाशको अंश आकाशमें
मिलाइदियो ये पंच भये औ मनको बुद्धिमें बुद्धिको चित्तमें चित्तको
अहंकारमें अहंकार को जीवात्मामें मिलाइदियो ये पांचभये ये सबताना
दशौ दिशा में फैलाइ दियो तब याको सुधि भूलिगई एक जीवात्माभर रहिगयो
औ जब कपरा तय्यार ह्वैजाइहै तब कोरीके यहां मालिक को पयादा आवै है
तब पयादाके साथ मालिकके यहां कपरा कोरी लैजाइहै औ यहां आदिपुरुष
जे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रहैं ते बैठावन देइ हैं कहे याको हंसस्वरूप देइहैं
सोई पयादाहै ताके साथ ह्वैकै कहे तामें स्थितह्वैकै कबीर जो मैंहों सो वह
जोहै कैवल्यरूप ताते छूटि कै पार्षदरूप पाइकै परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रके
लोकको प्रकाशरूप जोहै ब्रह्म तौने ज्योतिमें समाइकै कहे वाको भेद परम
पुरुष पर श्रीरामचन्द्रके धामकों गयो भाव यह है जैसे कोरी थान मालिक
के नजर कैदेइहै तैसे अपने आत्माको शुद्ध करिकै परम पुरुष पर श्री रामच-
न्द्रको अरपि दीन्ह्यो जाइ ज्योति भेदिकै साहबमें समाइगयो तामें प्रमाण ॥
"तज्ज्योतिर्भेदेनसक्ता रसिका हरिवेदिनः॥" इति॥औ श्रीकबीरहूजीको प्रमाण॥
'जैसे माया मन रमै तैसे राम रमाय । तारामंडल भेदिकै तबै अमरपुर जाय'॥३॥
इति चौंसठवां शब्द समाप्त ।
अथ पैंसठवां शब्द ॥ ६५ ॥
योगिया फिरिगयोनगरमँझारी।जायसमान पांचजहँनारी १
गये देशांतर कोइ न बतावै।योगिया गुफा बहुरि नहीं आवै२
जरि गो कंथ ध्वजागो टूटी।भजिगो दंड खपरगो फूटी॥३॥
कह कबीर यह कलिहै खोटी।जोरह करवा निकलल टोंटी४
योगियाफिरिगयो नगरमँझारी।जाय समानपांचजहँनारी १
जौने ब्रह्मांडमें पांचनारी जे बयारि हैं नाग कूर्म कृकल देवदत्त धनंजय
ई जिनमें समाइहैं ऐसे प्राण अपान व्यान उदान समानते जामें समाइगयेहैं
तौन जोहै नगर ब्रह्मांड ताके मांझते योगिया जो है योगी सो फिरिजाइहै
कहे फिरिफिरि ब्रह्मांडको प्राण चढ़ाइ लैजाइहै ॥ १ ॥
गये देशांतर कोइ नबतावै।योगिया बहुरि गुफानाहिं आवै २
जरिगो कंथ ध्वजागो टूटी।भजिगां दंड खपरगो फूटी॥३॥
जब वह योगी शरीर छोड़्यो तब कोई नहीं बतावै है कि कौन देशांतर
को गयो कौने लोकको गयो काहेते कि कौन्यो लोक को तौ मानतै नहीं है
तेहिते यही शरीर पुनि पावैहै तब वह योगकी सुधि बिसरि जाइहै पुनि
नहीं गुफामें आवैहै कहे पुनि नहीं प्राण चढ़ावत बनै है॥२॥कंथजोहै शरीररूपी
गुदरी सो जरिगयो तब ध्वजा जो है पवन तौनेकी धारा टूटिगई तब मेरुदंड
भंजित द्वैगयो कहे टूटिगयो औ खप्परजो है ब्रह्मांडकी खंपरी सो फूटिगई ॥ ३॥
कह कबीर यह कलिहै खोटी।जोरह करवा निकसलटोंटी४
श्रीकबीरजी कहै हैं कि यह कलि बड़ो खोटोहै अथवा यह कलि जो है
झगड़ा सो बड़ो खोटहै यह कोई नहीं बिचारै है कि जब शरीरही नहीं गयो
तब ब्रह्मांड कहां रहिगयो जहां ब्रह्मांडमें लीनह्वैकै बनो रह्यो सो यह बात
ऐसी है कि, जे ब्रह्मांडमें प्राण चढ़ावैं हैं तिनके जब शरीर छूटिजायहैं तब उनक
गैवगुफा सब मरिजाँयहैं तब गैवगुफा रूपी करवामें जो प्राण चढ़ो रहै है सो
जब दूसर शरीर धर्यो तब नासिका जो है टोटी तहांते वहै पवन निकसैहै
वही वासना लगी रहैहै तेहिते फिरि गुरुसों पूछिकै अभ्यास करनलगे हैं ॥ ४ ॥
इति पैंसठवां शब्द समाप्त ।
अथ छाछठवां शब्द ॥ ६६ ॥
योगिया कि नगरी बसै मतिकोइ। जोरेवसै सो योगिया होइ १
वह योगियाको उलटाज्ञाना। काराचोला नाहीं म्याना२॥
प्रकट सो कंथा गुप्ताधारी । तामें मूल सजीविनि भारी॥३॥
वा योगियाकी युगुति जो बूझै।रामरमै सो त्रिभुवन सूझै ॥४॥
अमृत वेली क्षण क्षण पीवै। कहकबीर सो युग युग जीवै॥५॥
योगिया कि नगरी बसै मति कोइ।जोरे बसै सो योगिया होइ
योगिया जो है योगी ताकी नगरी जो है ब्रह्मांड गैवगुफा तहां कोई न
बसौ अर्थात् हठयोग कोई न करो काहेते कि, जो कोई वह नगरीमें बसै है
अर्थात् हठयोग करै है सो योगियै होइहै कहे फिरि फिरि वही वासना करिकै
योगिया होइहै योग साधै है जन्म मरण नहीं छूटै है ॥ १ ॥
वह योगिया को उलटा ज्ञाना।कारा चोला नाहीं म्याना २
सो वह योगी को उलटा ज्ञान है कहे उलटे पवन चढ़ावै है अर्थात् या
शरीर को वेदांत शास्त्रमें निषेध करै है कि, यही शरीर ते आत्मा भिन्नहै
तौनेही शरीरको योगी प्रधान मानै हैं कि यही शरीर ते मुक्त ह्वैजायेंगे सो
इनको चोला जो है मन जौनेते शरीर पावै है औ मनै गैवगुफामें समाइ
जाइ है नाना प्रकारके जे कुत्सित कर्म हैं तिनते मलीन ह्वै रह्यो है याते
२२
( ३३८ ) बीजक कबीरदास ।
ताको कारकह्यो औ म्याना छोटा को फ़ारसी में कहै हैं सो वह मन छोटा
नहीं है बड़ो है सब संसार अरु चारों शरीर मनमें भराहै ॥ २ ॥
प्रकट सो कंथा गुप्ताधारी । तामें मूल सजीतनि भारी ॥ ३॥
अरु जो बहुत योग करिकै ब्रह्मांडमें प्राण चढ़ाइकैक प्राणको गुप्तकियो है
सो प्रकटै है ते वे योगी कंथाजो है शरीर ताको धारण किये रहे हैं बहुत दिन
जियै हैं ताको हेतु यहहै कि, मूल सजीविनि अमृतहै सो भारी कहे बहुतहै सो
चुवत रहै है जैसे संजीवनी ओषधि महाप्रलय भये नहीं रहि जाइहै सो याको
वह जियावै है सोऊ नहीं रहिजायहै तैसे जो कोई मूड काटि डारचो अथवा
कोई शरीर को खाइलयो तब न वह अमृत रहिजाइ न वे रहिजाइँ ॥ ३ ॥
वा योगिया की युगुति जो बूझै । राम रमै सो त्रिभुवन सूझै४
अमृत वेली क्षण क्षण पीवै । कह कबीर सो युग युग जीवै५
सो ये जो हैं योगी ते युगुति करिकै जिये हैं आखिरमें इनको जन्म मरण
नहीं छूटै सो या जोगियाको हठयोग छोड़िकै जो कोई वा योगी की युगुति बूझै
जे राजयोग करनवारे हैं सो रामरमै तब वाको त्रिभुवनमें रामई सूझिपरे॥४॥
अरु श्री कबीरजी कहै हैं कि, अमृतबेलि जो है रामनाम ताको क्षण क्षण में
पिये कहे श्वास श्वास में राम नाम स्मरण करै है सोई हनुमान बिभीषणा-
दिक के तरह युगयुग जियै है औ जनम मरणते रहित ह्वैजाइहै ॥ ५ ॥
इति छाछठवां शब्द समाप्त ।
अथ सरसठवां शब्द ॥ ६७ ॥
जौपै बीजरूप भगवाना । तौ पंडित का बूझौ आना॥१॥
कहँ मन कहां बुद्धि ओंकारा। रज सत तम गुण तीनि प्रकारा२
विष अमृत फल फलै अनेका।बहुधा वेद कहै तरुवेका ॥३॥
कह कबीर ते मैं का जानो। कोधौं छूटल को अरुझानो॥४॥
जो आगे कहिआये कि जो कोई रामनाम लेइहै सोई जनन मरणते रहित
होइहै सो कहै हैं ॥
शब्द । ( ३३९ )
जोपै बीज रूप भगवाना । तौ पण्डित का बूझौ आना ॥१॥
कहँमन कहां बुद्धि ओंकारा। रज सत तमगुण तीनि प्रकारा२
बीज जो है रामनाम सो भगवान्है जनन मरण छोड़ाइ देबेको तौ हे पंडि-
त तुम आनआन जगत् कारण ब्रह्म ईश्वर प्रकृति पुरुष काल शब्द परमाणु
इत्यादिक काहे खोजत फिरौ हौ यह नामही जगतमुख अर्थ करि जगत्को कार-
णहै ॥ १ ॥ सो रामनामै जो सबको बीज ठहर्यो तो मनको बुद्धिको प्रण-
वको कारण कहां रह्यो एते सत रज तम जे गुण हैं तिनके तीनि २ प्रकार हैकै
जगत् कियो है प्रथम मन बुद्धि ओंकार कहां रहे कोई नहीं रहे भाव यहहै
कि प्रथम साहबको सुरति पायकै रामनाम को जगतमुख अर्थ करिकै जीव सम-
ष्टि ते व्यष्टि हैकै संसारी भयो है तबहीं ये सब भये हैं ॥ २ ॥
विष अमृत फल फूल अनेका । बहुधा वेद कहै तरबेका ३
वोई सतोगुणी रजोगुणी तमोगुणी उपासनाते विष अमृत अनेक फल फलत
भये कहैं नाना दुःख सुख जीव पावत भये कोई वे देवतन की उपासना
करिकै उनके लोक जाइकै सुख पायो औ कोई विषय आदिक करिकै दुःख
पायो येई वे गुणन में फल फलेहैं सो सबंके फल स्तुति बहुधा वेद तरिबे को
लिख्योहै ॥ “शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता। शीतले त्वं जगद्धात्री
शीतलायै नमो नमः” ॥ इत्यादिक सब ॥ ३ ॥
कह कबीरते मैं का जानो । को धौं छूटल को अरुझानो४
सो कबीरजी कहैहैं कि वेद तो फलस्तुतिमें तरिबे को कहैहैं कछू साच
नहीं कहैहैं ये सब जीव अपनी अपनी उपासना में लगे कहैहैं कि हम मुक्तहै
जाइँगे सो सब उपासना सतोगुण रजोगुण तमोगुण ये तीन गुणमयहैं सो मैं
कहाजानौं को बद्धहै को छूटहै तुम्हीं बिचार कैरि लेउ कि हमारी उपासना
मायाके भीतर है कि माया के बहिरे है अर्थात् वेद में यह दिखायो कि सबकों