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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 380

( ३३२ ) बीजक कबीरदास ।
औ वही ब्रह्म को निराकार अकर्त्ता निर्धर्मिक कहौ हौं कहो तो वह ब्रह्म को
जान्यो कौन ? अरु वाको निर्वस्तु कहौ हौ कि, वह कुछ वस्तु नहीं है? देशकाल
वस्तु परिच्छेदते शून्यहै कहो तो वह धोखई रहिगयो किं, कुछ वस्तु रहिगयो !
सो निहारेही बातमें वह धोखा जान्यो परै है कि, कुछ नहीं है शून्यहै तेहितें
परमपुरुषवर श्रीरामचन्द्रमें लागौ जाते माया ब्रह्मके पार है उनहीके पास
पहुंचैजाइं औ आवागमनते रहित द्वैजाउ ॥ ५ ॥
इति तिरंसठ शब्द समाप्त ।
अथ चौंसठवां शब्द ॥ ६४ ॥
जोलहा वीनेहु हो हरिनामा जाकेसुर नरमुनि धरैं ध्याना।
ताना तनैको अउठा लीन्हे चर्खी चारिहु वेदा
सर खूटी यक राम नरायण पूरण कामहि माना ॥ १ ॥
भवसागर यक कठवत कीन्हों तामें माड़ी सानी
माड़ीको तन माड़ि रहो है माड़ी विरला जाना ।
त्रिभुवन नाथ जो मंजन लागे इयाम मुररिया दीना
चांद सूर्य दुइ गोड़ा कीन्हो मांझ दीप किय ताना ॥ २ ॥
पाई करिकै भरना लीन्हो वे बांधै को रामा
वे ये भरि तिहुं लोकै वांधै कोइ न रहै उवाना ।
तीन लोक एक करिगह कीन्हो दिगमग कीन्हो तानै
आदि पुरुष बैठावन बैठे कविरा ज्योति समाना ॥ ३ ॥
श्रीकबीरजी रामानंदके शिष्यै हैं सो अपनी संप्रदाय बतावैहैं ॥
१ कबीर साहब रामानन्दके कैसे शिष्यहैं सोजाननेके हेतु-कबीरभानुप्रकाश,
कबीर मन्सूर, रामानन्द गुष्ठी और आत्मदासजीकृत कबीर सागर देखना चाहिये ।