कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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सो विचार करौ औ सम्पूर्ण जे विकार तिनको परिहरौ कहे छोड़ो । तरण
तारण एक पुरुष पर श्रीरामचन्द्रही हैं । श्री कबीरजी कहै हैं कि, तिन-
हींको भजन करु, उनते और दूसरो तेरो छोड़ावन वारो नहीं है । इहां
तरण तारण दुइ कह्यो, सो तरण जो है मुक्ति ह्वैवेकी इच्छा ताते तारणवारो
कोई नहीं है वोई हैं । वही मुक्तिकी इच्छा करिकै कोई ब्रह्मज्ञान कोई
आत्मज्ञान कोई दहरो पासनादिक नाना उपासना करिकै तरनको चाहै हैं
परन्तु कोई तरै नहीं हैं, जब तरनकी चाह छूटिजाइहै तब मुक्ति होइहै । सो
यह तरनकी इच्छाते एक परम पुरुष श्रीरामचन्द्रही तारिदैहैं । अर्थात
उनहींकी दीन मुक्ति दैजाइहै औरकी दीन मुक्ति नहीं दैजाइहै। जबभर तरनकी
इच्छा होइहै तबभर मुक्ति नहीं होइहै तामें प्रमाण॥ “भुक्तिमुक्तिस्पृहायावत्पिशाची-
हृदिवर्त्तते। तावद्भक्तिसुखस्पर्शःकथमभ्युदयो भवेत्”॥ इति भक्तिरसामृतसिन्धौ ॥
इति साठवां शब्द समाप्त ।
अथ इकसठवां शब्द ॥ ६१ ॥
मरिहौ रे तन कालै करिहौ। प्राण छुटे बाहर लै धरिहौ॥ १॥
काय विमुरचन अनवनि बाटी। कोइ जारै कोइ गाड़ै माटी२
हिंदू लै जारै तुरुक लै गाड़ै। ई परपंच दुनौ घर छाड़ै॥ ३॥
कर्म फांस यम जाल पसारा। ज्यों धीमर मछरी गहि मारा४॥
राम बिना नर हैहौ कैसा । वाट मांझ गोवरौरा जैसा ॥ ५ ॥
कह कबीर पाछे पछितैहौ । या घरसों जब वा घर जैहौ॥६॥
मरिहौरे तन कालै करिहौ । प्राण छुटे बाहर लै धरिहौ॥१॥
काय विगुरचन अनवनि वाटी।कोइ जारै कोइ गाड़े माटी२
हे जीवो ! तुम मरिहौ तौ फिर तन लैहौ तौनेको लैके का करिहौ । का
या तनते कियेौहै का वा तनते करिहौ । जबप्राण छूटैगो तब वाहू शरीरको