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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 378

( ३३० ) बीजक कबीरदास ।
अथ तिरसठवां शब्द ॥ ६३ ॥
मैं कासों कहौं को सुनै को पतिआय ।
फुलवाके छुवत भँवर मरि जाय ॥ १ ॥
गगन मँडल विच फूल यक फूला ।
तर भो डार उपर भो मूला ॥ २ ॥
जोतिये न वोइये सिचिये न सोइ ।
विन डार बिना पात फूल यक होइ ॥३॥
फुल भल फुलल मालिनि भल गूंथल ।
फुलवा विनाशि गयल भँवर निरासल ॥४ ॥
कह कबीर सुनो संतो भाई ।
पंडित जन फूल रहे लुभाई ॥ ५ ॥
मैंकासों कहौं को सुनै को पतिआय ।
फुलवाके छुवत भँवर मरि जाय ॥ १ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि, मैं जासों कहौं हौं सो तो सुनतई नहीं है औ जो सुन्यौ
तौ शंका कियो ताको समाधान करि दियो असांच निकारिडार्यो सांचेको स्थापित
कियो सो यद्यपि वाको जवाब नहीं चलै है तौ यह कहै है कि, यह जोलहाको
कह्यो वेद शास्त्र को सार अर्थ विचार कैसे होइगो ताते कोई मोको पतिआय
नहीं है येतो सब धोखामें अटके हैं मैं कासों कहौं को सुने । कौन बात कहा
हौं कि, वह धोखा ब्रह्म आकाशको फूल है ताके छुवतमें भँवर जोहै तिहारों
जीवात्मा सो मरि जाय हैं कहे तुम नहीं रहिजाउहौ, वही धोखा ब्रह्मई रहि-
जाइहै वाके आगेकी बात तुमकैसे जानोगे याते तुम परमपुरुष परश्रीरामच-
न्द्रको जानो । वे जब अपनी इंद्री दैँहैंगे तब वह ब्रह्मके ऊपरकी बात जानि
परैगी । जौन हंसशरीर देइहै सो याके नित्य स्वरूपहै सो नित्य स्वरूपत