कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 373, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( ३२३ )
अथ साठवां शब्द ॥ ६० ॥
मायामोहहिमोहितकीन्हा । तातेज्ञानरतनहरिलीन्हा ॥१॥
जीवन ऐसो सपना जैसो जीवन सपन समाना ।
शब्द गुरु उपदेश दियो तैं छांड़्यो परम निधाना ॥ २ ॥
ज्योतिहि देखि पतंग हुलसै पशु नहिं पेखै आगी ।
काम क्रोध नर मुगुध परे हैं कनक कामिनी लागी ॥३॥
सय्यद् शेख किताबें निरखै पंडित शास्त्र विचारै ।
सद्गुरुके उपदेश बिना तुम जानिकै जीवहि मारै ॥ ४ ॥
करौ विचार विकार परिहरौ तरन तारनै सोई ।
कहकवीर भगवंत भजन करु द्वितीया और न कोई॥५॥
मायामोहहिमोहितकीन्हा । तातेज्ञानरतन हरिलीन्हा॥१॥
पूर्व जो वर्णन करिआये सो माया जीवको मोहित करत भई । सांचमें
असांचकी बुद्धि होय है या मोहको लक्षण है । सो यह आत्मा तो शरीरनते
भिन्न सांच है ताको शरीरकी बुद्धि भई कि, शरीर मैं हों, मनादिक मेरे हैं ।
यह असांच बुद्धि भई याहीते मायामें परिगयो। तब याको माया मोहते मोहित
करिकै परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र हैं तिन को ज्ञान रतन जो रहै कि, मैं
उनको अंशहौं, वे बड़े रतन हैं, मैं कनीहौं अल्पज्ञ हौं परन्तु जाति उन
हींकी हौं, वे विभु आनन्द हैं जैसे उनमें मनादिक नहीं हैं तैसे मैं
जो उनको जानौं तो महूँ मनादिक नहीं हैं यह जीवको ज्ञान रत्न माया
हरिलीन्हो ॥ १ ॥
जीवन ऐसो सपना जैसो जीवन सपन समाना ।
शब्द गुरु उपदेश दियो तैं छांड़्यो परम निधाना॥२॥
यह जीवन ऐसो है स्वप्न है यहि शरीरते दूसरे शरीरमें गयो तब यह
शरीर स्वप्न ह्वै गयो औ वह जीव स्वप्न जे संपूर्ण शरीर हैं तिनमें नहीं समान्यो