कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२२ ) बीजक कबीरदास ।
पुरुष साहवै है सो जे परम पुरुष श्रीरामचन्द्र को छोड़ि और पुरुष करैं हैं ते
छिनारि हैं सो जो छिनारि हैं तिनके ऊपर संसार रूपी मार परोई चाहै ।
तामें व्यंग्य यहहै कि, जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रको पति मानैं हैं तेई माया
झझामिते बचै हैं ॥ ५ ॥
इति अठवनवां शब्द समाप्त ।
अथ उनसठवां शब्द ॥ ५९ ॥
माया महा ठगिनि हम जानी ।
तिरगुण फांस लिये कर डोलै बोलै मधुरी वानी ॥ १ ॥
केशवके कमला ह्वै बैठी शिवके भवन भवानी ।
पंडाके मूरति ह्वै बैठी तीरथमें भइ पानी ॥ २ ॥
योगीके योगिनि ह्वै बैठी राजाके घर रानी ।
काहूके हीरा ह्वै बैठी काहूके कौड़ी कानी ॥ ३ ॥
भक्तनके भक्तिनि ह्वै बैठी ब्रह्माके ब्रह्मानी ।
कहै कबीर सुनो हो संतो यह सब अकथ कहानी ॥४॥
माया महा ठगिनि है हम जानी । यह माया माधुरी बानी बोलिकै त्रिगुण
फांसते सब जीवनको बांधिलियो । औ सबके घरमें नानारूप करिकै बैठीहै;
केशवके कमला ह्वैकै बैठी है, औ शिवके भवनभवानी ह्वैकै बैठी है, औ पंडाके
मूरति ह्वै बैठी है, औ तीरथमें पानी ह्वै रही है, औ योगीके घरमें योगिनि ह्वै
बैठी है, औ राजाके रानी ह्वै बैठीहै, औ काहूके हीरा ह्वै बैठी है, औ काहूके
कानी कौड़ी ह्वैकै बैठी है, औ ब्रह्माके ब्रह्मानी ह्वै बैठी है । सो कबीरजी कहै
हैं कि, हे संतो ! सुनो यह सब मायाको चरित्र अकथ कहानी कहाँलौं वर्णन
करौं यह माया सत् असत्ते विलक्षण है कहिबे लायक नहीं है अरु याको
अंतनहीं है ॥ १-४ ॥
इति उनसठवां शब्द समाप्त ।