कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
कबीरजीकी कथा । (२५)
दोहा- सादर ल्याइ कबीर को, करि उत्सव हर्षाइ ॥
शिष्य भये परिवारयुत, भवभय दियो मिटाइ ॥ १७ ॥
भक्तमालकी यह कथा, किय संक्षेप बखान ॥
अब कबीर इतिहासको, विस्तर सुनहु सुजान ॥ १८ ॥
देश गहोरा युत परिवारा । भयो शिष्य विरसिंह भुवारा ॥
कछुक काल लगि नृप ढिग माहीं । वस्यो कबीर सुमिरि हरि काहीं ॥
येक समय विरसिंह नरेशै । दियो बोलाई कबीर निदेशै ॥
देहैं तोहिं कछू हम ज्ञाना । ताते कर अस भूप विधाना ॥
यक ब्राह्मणी रचै यक धोती । वरष दिवसमहँ अतिहि उदोती ॥
लेइ पाणिमहँ तोरि कणसू । सूत भूमि परशै नहिं तासू ॥
सो धोती लै आवहु राजा । तब ह्वै हौ तुरंत कृतकाजा ॥
सुनि विरसिंह तुरंत सुखारी । गो ब्राह्मणीसमीप सिधारी ॥
धोती माग्यो तब द्विज नारी । सुनु महीप सो गिरा उचारी ॥
धोती वर्ष प्रयंत बनाऊं । जगन्नाथको जाय चढ़ाऊं ॥
लेहु महीश शीश बरु मोरा । धोती लेब उचित नहिं तोरा ॥
राजा फिरि कबीर ढिग आयो । सकल ब्राह्मणी वचन सुनायो ॥
दोहा- कह कबीर जगन्नाथकौ, धोती देइ चढ़ाइ ॥
प्रतीहार करि साथ नृप, तियको दियो पठाइ ॥ १९ ॥
जाय ब्राह्मणी वसन चढ़ायो । प्रभु ढिग ते तुरंत फिरि आयो ॥
कियो ब्राह्मणी धरन तहांहीं । स्वप्ने कह्यो नाथ तेहिं काहीं ॥
मांग्यो हम बांधवगढ़ काहीं । काहे दियो मोहिं लै नाहीं ॥
जाय कबीरै देइ चढ़ाई । तब जैहै पूरण फल पाई ॥
द्विज तिय फिरि बांधवगढ़ आई । दियो कबीरहि वसन चढ़ाई ॥
वसन पहिरि जब बैठि कबीरा । तब आयो विरसिंह प्रबीरा ॥
महितै यक कर ऊँच निहारा । तब कीन्हो अस वचन उचारा ॥
जो हरिको हरि लोकहु काहीं । दीजै म्वहिं देखाइ सुखमाहीं ॥
तौ प्रतीति मोरे परि जाई । ये तो सत्य कबीरै आई ॥
( २६ ) कबीरजीकी कथा ।
तब राजहि कबीर बैठायों । ध्यानावस्थित ताहि करायों ॥
योग मार्ग ते तेहि लै गयऊ । हरि हरि लोक देखावत भयऊ ॥
तब बिरसिंह भूप विश्वासे । लहन विज्ञानहि हिये हुलासे ॥
दोहा-श्रीकबीरजी तहँ कियो, सुभग ज्ञान उपदेश ॥
मिटे सकल संसारके, ताके काय कलेश ॥ २० ॥
कह कबीर लै चलहु शिकारा । भूप कियो तेहिं नाग सवारा ॥
गजके ऊपर हाथ सवाऊ । बैठ कबीर लखे सब काऊ ॥
बांधवगढ़के पूरुब ओरा । सदल तृषित भो नृप तेहि ठोरा ॥
कह्यो कबीरै गुरु भगवाना । जल बिन जात सबैके प्राना ॥
तब कबीर परभाव दिखायो । तुरत सकल तरु सफल बनायो ॥
प्रगटी वापी निर्मल नीरा । तहँ अंतर्हित भयो कबीरा ॥
अब बघेल वंशावलि जोई । श्रीकबीर विरचित है सोई ॥
अरु आगम निदेशहू ग्रंथा । तामें है बघेल सतपंथा ॥
उक्ति कबीरहि की लै नीकी । वर्णों मोरि उक्ति नहिं ठीकी ॥
यदपि वंश महिमा निजवरणत । उपजति लाज तदपि अतिसुखरत ॥
तेहि अनुसर वर्णों कर जोरी । श्रोता दियो मोहिं नहिं खोरी ॥
करि दरशन जगदीश कबीरा । उत्तर दिशा चल्यो मतिधीरा ॥
दोहा-बांधवदुर्ग बघेलको, ताढिग जबहिं कबीर ॥
आए तब नृप रामसिंह, आनँद युत मतिधीर ॥ २१ ॥
लै आगे ल्याए तुरत, बांधवदुर्ग लेवाइ ॥
अति सत्कार कियो तहाँ, मानि रूप यदुराइ ॥ २२ ॥
पुनि कबीर स्थानमें, भूपति गये अकेल ॥
तब कबीर नृपसों कह्यो, मोहिं गुरु कियो बघेल ॥ २३ ॥
तेरे पूरबके पुरुष, कियो गुरु जस मोहिं ॥
मैं लै आयो हंस ह्वै, सकल सुनाऊं तोहिं ॥ २४ ॥
वाराणसी जन्म मैं लीन्हों । जगन्नाथ दरशन मन दीन्हो ॥
तहँ समुद्रको करि मर्यादा । गमन्यो गुजरातै अविषादा ॥
तहँ को भूप पुत्र ते हीना । विनती कियो मोहिं अति दीना ॥
मैं वरदान दियो नृप काहीं । द्वै सुत हैंहें तुव तिय माहीं ॥
मोर अंश ते जो एक होई । वदन बाघ देखी सब कोई ॥
तब सुलंक नृप आनँद पायो । द्वै सुत निज तिय महँ जनमायो ॥
व्याघ्रदेव भो जेठ व्याघ्रमुख । अनुज तासु भो सुंदर हरदुख ॥
व्याघ्रवदन लखि पंडित आये । जानि अशुभ वनमहँ फिकवाये ॥
तब कबीर धरि पंडित वेशा । जाइ भूपको दियो निदेशा ॥
ल्याबहु व्याघ्रवदन सुत काहीं । ताते चलिहै वंश सदाहीं ॥
भूप सुलंकदेव बिन शंका । ल्यायो तुरत सुतहि अकलंका ॥
व्याघ्रदेव तेहि नाम सुहंसा । तिनते चल्यो बघेलहि वंसा ॥
दोहा-तब कबीर अस वर दियो, जगमें सहित प्रसंश ॥
अचल राज बांधौ रही, चली बयालिस वंश ॥ २५ ॥
व्याघ्रदेवके सुत नहिं रहेऊ । सो कबीरसों निज दुख कहेऊ ॥
तब कबीर किय मनमहँ ध्याना । कियो तुरत गिरिनार पयाना ॥
चंद्र विजय नृप रह्यो तहाँहीं । रानी इंदुमती रति छाहीं ॥
तेहि पूरब कबीर उपदेशा । दंपति किय हरिपुरहि प्रवेशा ॥
सो कबीर हरिलोक सिधारी । दंपति काहिं योग मति धारी ॥
ल्यायो द्रुत गुजरातहि देशा । कीन्हो व्याघ्रदेव सुतवेशा ॥
दियो नाम जैसिद्ध प्रसिद्धा । पूरित बुद्ध ऋद्वि अरु सिद्धा ॥
युवा बैस जैसिद्धहि आई । निशिमहँ चिंता भई महाई ॥
केहि विधि नाम चलै चहुँओरा । क्षत्रीधर्म विजय बरजोरा ॥
व्याघ्रदेवसों कह्यो प्रभाता । सो कह पितामहै कहु बाता ॥
तबै सुलंक देव ढिग जाई । निज मनकी शंका सब गाई ॥
सो सादर शासन तेहि दीन्हों । लै कछु सैन्य पयानो कीन्हों ॥
दोहा-गढा देशमहँ सो वस्यौ, भूप नर्मदा तीर ॥
कर्णदेव ताके भयो, तासु सरिस रणधीर ॥ २६ ॥
( २८ ) कबीरजीकी कथा ।
गंगापार हाँडिया खेरा । बैसनको तहँ रहै बसेरा ॥
तहँ कीन्हो विवाह सुत केरा । डार्यो चित्रकूट पुनि डेरा ॥
बीती तहँ बहुत दिन राती । व्याघ्रदेवके भयो पनाती ॥
बहुत काल जब बीतत भयऊ । तब जयसिंह छोंडि तनु दयऊ ॥
कर्ण देव तब भयो नरेशा । तासु पुत्र केशरी सुवेशा ॥
भयो केशरीसिंह जुमाना । तब कालिंजर कियो पयाना ॥
कालिंजर भूपति चंदेला । तासों कियो केशरी मेला ॥
लै चंदेल चतुरंग महाना । कीन्हो देश गहोरा थाना ॥
बहुत काल लगि वसे गहोरा । चल्यो केशरी उत्तर ओरा ॥
रह नवाब राजा तहँ भारी । कीन्हौं अमल केशरी सारी ॥
सुनि नवाब दल ले चढि आयो । सुनि केशरी निसान बजायो ॥
माच्यौ तहँ महा संत्रामा । विजय लह्यो केशरी ललामा ॥
दोहा-पुनि नवाब तहँ आइक, कियो केसरी मेल ॥
अर्ध राज्य देबे लग्यो, सो न लयो गुणिखेल ॥ २७ ॥
पुनि नवाब केशरी बघेला । गोरखपुर पर कीन्हों हेला ॥
तब नवाब अति प्रीति देखायो । गोरखपुर महँ तेहि बैठायो ॥
कहत भयो रक्षहु अब मोही । मह दल कोश लाज है तोही ॥
गोरखपुर वस केशरि भूपा । प्रगटायो यक पुत्र अनूपा ॥
इत नृप कर्ण देव मतिधीरा । चित्रकूटमहँ तज्यो शरीरा ॥
पुत्र केशरी को जो भयऊ । तेहिमल्हार नाम अस भयऊ ॥
सुत मलारके शारंग देवा । शारँगके भीमल हरि सेवा ॥
भीमल देव प्रचंड प्रतापी । अतिसुंदर हरि नामहि जापी ॥
भीमलदेव पुत्र जो भयऊ । ब्रह्मदेव तेहिं नामहि ठयऊ ॥
सो मगहरमहँ कीन्हो थाना । तहाँ वसत बहुकाल बिताना ॥
ब्रह्मदेव लै कटक महाई । मिले गहरवाननसों आई ॥
पुनि सिरनेतनदेश सिधारा । कीन्हो व्याह उछाह अपारा ॥
कबीरजीकी कथा । (२९)
दोहा-तहँ कोउ भूपति बंधु इक, कीन्हे रहै विरोध ॥
ताहिपकारि ल्यायो सदल, करि चहुँ दिशि अवरोध२८
ब्रह्मदेवके भो सिध देवा । नरहरि देव तासु सुत भवा ॥
नरहरिके भइ भेदसुधन्या । व्याहीसो शिरनेतन कन्या ॥
नरहरि वस्यो कछुक दिनकाशी । भेदचल्यो लै दल अरि नाशी ॥
भयो शालिवाहन सुभेद सुत । विरसिंहदेव तासु सुत नृप नुत ॥
भो विरसिंह महान भुवाला । वस्यो प्रयाग आइ तेहि काला ॥
लियो अमल सब देशन काहीं । लाख सवार रहैं सँगमाहीं ॥
वीरभानु सुत भो पुनि ताके । राजाराम भये तुम जाके ॥
जबै प्रयाग देश चहुँओरा । अमल्यो विरसिंह निजभुज जोरा॥
तबै प्रजा किय जाय पुकारा । दिल्ली शाह हिंमाऊद्वारा ॥
आयो कोउ कबीर बघेला । लाख सवार चलै बगमेला ॥
अमल कियो सो मुलुक तुम्हारा । सो सुनि शाह तुरंतसिधारा ॥
चित्रकूट आयो जब शाहा । चलन लग्यो विरसिंह नरनाहा ॥
दोहा-वीरभानु तब आयकै, वारम कियो बुझाइ ॥
तुम न जाहु म्लेच्छहि मिलै, ऐहै सो इतधाय ॥ २९ ॥
तब पुत्रहि विरसिंह बुझाई । चल्यो तुरंत निशान बजाई ॥
चित्रकूट विरसिंह सिधारा । सुनत शाह आगू पगधारा ॥
दोउदल भये बरोबर जबहीं । सादर शाह बोलायो तबहीं ॥
जब भूपति गो शाह समीपा । बिहँसि शाह कह सुनहु महीपा ॥
कवन हेतु परजन दुखदीन्हे । काहे मुलुक हमारो लीन्हे ॥
तब विरसिंह बोल्यो मुसकाई । कोहूसों किय नहीं लराई ॥
जे हमहीं मारें तेहि मारे । अमल्यो तिनके देश अपारे ॥
कह्यो शाह कहँ सुवन तुम्हारा । वीरभानु कहँ भूप हँकारा ॥
वीरभानु तब वाजि उड़ाई । परचोशाह हौदामहँ जाई ॥
शाह उतर हाथीते आयो । वीरभानु गोदहि बैठायो ॥
( ३० ) कबीरजीकी कथा ।
बैठों तख्त माँह जब शाहा । वीरभानु कहँ बहुत सराहा ॥
पुनि विरसिंहहि कह दिल्लिशा । अब हम तुमको देत अशीशा ॥
दोहा-बारहिं राजा करि स्ववश, करहु राज्य चहुँओर ।
बांधवगढ़ निज वसनको, लीजै नृपशिरमोर ॥ ३० ॥
असकहि लिखित दियो दिल्लिशा । चल्यो तबै विरसिंह महीशा ॥
दिल्लीपति प्रयाग लै आयो । करि मेहमानी भवन पठायों ॥
लै दल पुनि विरसिंह भुवारा । दक्षिण चल्यो सहित परिवारा ॥
आयो तमस नदीके तीरा । तब लाडिल परिहार सुवीरा ॥
नरो शैल महँ दुर्ग बनाई । वसत रहै सो बली महाई ॥
सो मारग महँ कियो लड़ाई । तासु नरो गढ़ लियो छँड़ाई ॥
नरो जीति विरसिंह भुवाला । बाँधा नगर रह्यो तेहि काला ॥
तहाँ कछुक दिन कियो निवासा । पुनि गवनतमो दक्षिण आसा ॥
रहे रतवपुर करचुलि राजा । तुव पितुकेर कियो तहँ काजा ॥
सोदायज महँ बाँधव दीन्ह्यो । तहँ विरसिंह वास चलि कीन्ह्यो ॥
वीरभानुको दै पुनि राजू । आय प्रयाग बस्यो कृतकाजू ॥
कह्यो तोरि वंशावलि ऐसी । जानी रही मोरि यह जैसी ॥
दोहा-सुनि अपनी वंशावली, बहुरि कह्यो शिरनाइ ॥
अब भविष्य यहि वंशकी, दीजै कथा सुनाइ ॥ ३१ ॥
बांधव दुर्ग बसीकी नाहीं । राज्य चली यहि भाँति सदाहीं ॥
आगे कैसो ह्वैहै बंशा । यह सिगरो अब करहु प्रशंसा ॥
तब कबीर बोले मुसुकाई । राजाराम सुनहु चित लाई ॥
तुम्हरे दशयें वंशहि माहीं । लैहौ तुमही जन्म तहाँहीं ॥
सुत समेत बांधवगढ ऐहौ । बीजक ग्रंथ मोर तहँ पैहौ ॥
ताको अर्थ समर्थन करिहौ । संत समाजनको सुखभारिहौ ॥
वीरभद्र तुम्हरो सुत होई । करिहै राज्य सदा सुख मोई ॥
संवत अष्टादश नवषटमें । ऐहौ बांधव गढ़ अटपटमें ॥
तबते ताहि विशेष बसैहौ । अपनो विमल महलरचवैहौ ॥
कबीरजीकी कथा । (३१)
और भविष्य कबीर जी गायो । वर्णत तेहि मैं पार न पायो ॥
यक कबीर आगम निर्देशा । मम शासित वर्णत युगलेशा ॥
तामें सकल अहँ विस्तारा । जानिलेहु सब संत उदारा ॥
दोहा-और कबीर कथा अमित, वरणि लहौं किमिपार ॥
संक्षेपैते इत लिख्यो, कीन्ह्यो नहिं विस्तार ॥ ३२ ॥
यथा बघेलवंशकी गाथा । वर्ण्यौ भूत भविष्यहु नाथा ॥
तैसेहि अबलौं प्रगट देखाती । पलहू बढ़ै न पल घटि जाती ॥
मगहर गे यक समय कबीरा । लीला कीन्ही तजन शरीरा ॥
अतिशय पुष्प तुरंत मँगाई । तामें निजतन दियो दुरोई ॥
सबके देखत तज्यो शरीरा । हिंदू यमनहुकी भै भीरा ॥
हिंदू यमन शिष्य रहे दोउ । आपूस में भाषे सब कोउ ॥
यमन कह्यो माटी हम दैहैं । हिंदू कहैं अनलमें लैहैं ॥
तब दोउ जाय पुष्पकहँ टारयो । नाहिं कबीर शरीर निहारयो ॥
आधे आधे लै दोउ सुमना । दीह्यो हिंदू गाड़्यो यमना ॥
भये कबीर प्रगट मथुरामें । विचरन लगे सकल वसुधामें ॥
यहि विधि अहँ अनेकनगाथा । सति कबीर है वपु जगनाथा ॥
यह लीला करि सकल कबीरा । आयो बांधव पुनि मतिधीरा ॥
दोहा-अबलौं गुहा कबीरकी, बांधवडुर्ग मँझार ॥
जगन्नाथको पंथ सो, पावत नहिं कोउ पार ॥ ३३ ॥
इति श्रीभक्तमालान्तर्गत श्रीकबीरजीकी कथा स्वामी युगलानन्द कबीरपंथी
भारतपथिकद्वारा संशोधित समाप्ता ।
( ३२ ) शेष दोनोंशब्द ।
शब्द एकसौ चौदह ॥ ११४ ॥
सार शब्द से बांचि हो मानहु एतवारा हो।
आदि पुरुष एक बृक्ष है निरंजन डारा हो ॥
त्रिदेवा शाखा भये पत्ती संसारा हो।
ब्रह्मा वेद सही किये शिव योग पसारा हो ॥
विष्णु माया उतपति किया उरला व्यवहारा हो।
तीन लोक दशहूं दिशा यम रोकिन द्वारा हो ॥
कीर है सब जीयरा लिय विषका चारा हो।
ज्योति स्वरूपी हाकिमा जिन अमल पसारा हो॥
कर्मकी बंसी लायके पकरचो जग सारा हो।
अमल मिटाऊं तासुका पठऊं भव पारा हो ॥
कह कबीर निर्भय करौं परखो टकसारा हो।
शब्द एक सौ पन्द्रह ॥ ११५ ॥
सन्तौ ऐसी भूल जगमाहीं जाते जिव मिथ्या में जाहीं ॥
पहिले भूले ब्रह्म अखण्डित झाईं आपुहि मानी।
झाईं मानत इच्छा कीन्हा इच्छाते अभिमानी ॥
अभिमानी करता ह्वै बैठे नाना पंथ चलाया।
वही भूल में सब जग भूले भूलक मर्म नहिं पाया ॥
लख चौरासी भूल ते कहिये भूलहि जग विटमाया।
जो है सनातन सो भूला अब सोइ भूलहि खाय ॥
भूल मिटै गुरु मिलै पारखी परख देइ लखाई।
कहहि कबीर भूल की औषध परख सब की भाई ॥११५॥
इति ।
श्रीकबीरजीकी कथा । ( ३३ )
( श्रीनाभाजीके भक्तमालसे टीकासहित )
॥ मूल ॥ कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रमषटदरशनी ॥ भक्तिविमुखजोधर्म
सोअधर्मकरिगायो । योगयज्ञव्रतदानभजनविनतुच्छदिखायो ॥ हिंदूतुरकप्रमानर-
मैनी सबदीसाषी । पक्षपात नहिं वचनसबहिंकेहितकीभाषी ॥ आरूढ़दशाहैजगतपर
मुखदेखीनाहिंनभनी । कबीरकानिराखीनहींवर्णाश्रमषटदरशनी ॥ ६० ॥
टीका ॥ अतिहीँगँभीरमतिसरसकवीरहियोलियोभक्तिभावजातिपाँतिसबटारिये॥
भई नभवाणीदेहतिलक रवानीकरौ करौगुरुरामानंद गरेमालधारिये । देखेनहींमुखमे
रोज़ानिकैम्लेच्छमोको जातन्हानगंगाकहीमगतनडारिये । रजनीकेशेषमयआवेश-
सोंचलतआपपरै पगरानीकहेंमंत्रसोंविचारिये ॥ २६५ ॥ कीनीवहीबातमालाति-
ळकबनाइगातमानिउतपातमातशोर कियोभार
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द+े=देउरौर+े=रेमकर
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मूल रमैनी प्रारम्भ ।
( अक्षर खण्डकी रमैनी )
प्रथमशब्दहैशून्याकार ॥ परा^१अव्यक्त सोकह्रै बिचार॥अंतः
करणउदयजबहोय ॥ पश्यंति^२अर्धमात्रासोय ॥ स्वर^३सोकंठ
मँध्यमा^४जान ॥ चौंतिस^५अक्षरमुखस्थान ॥ अनवनिबानि^६तेहि-
केमांहि ॥ विनजानेनरभटका^७खांहि ॥ बानी अक्षर स्वर संमु-
दाय ॥ अर्ध^८पश्यंतिजातनशाय ॥ शून्याकारसोप्रथमारहै ॥
अक्षरब्रह्मसनातनकह्रै ॥ निर्वृति^९ ॥ प्रवृति^१०हैशब्दाकार ॥ प्रण-
व^११जानेइहेबिवार ॥ साक्षी ॥ अँकुलाहट^१२केशब्दजो, भई
चारसोभेष ॥ बहुबानीबहुरूपकै पृथकपृथकसबदेश ॥ १ ॥
रमैनी॥अनवनिबानीचारप्रकार ॥ १ काल २ संधि ३ झांई ४
औ सार॥ हेतुशब्दबूझियेजोय ॥ जानिय येंथारथ^१३ द्वारा^१५सोय॥
भ्रमिक^१४झांईसंधिकऔकाल ॥ सारशब्दकाटेभ्रमजाल ॥ द्वारों
चारअर्थपरमान ॥ पद^१६ारथ व्यंग^१७ाथपहिचान भौार्थ^१८ १९
ध्वन्यार्थचार ॥ द्वाराशब्दकोइलखेविचार ॥ पैरा^२० पराइति
मुखसोजान ॥ मोरे सोरहकला निदान ॥ साक्षी ॥ विन-
जानेसोरहकला, शब्दीशब्द कौआयै^२१ ॥ शब्द सुधारप-
१ इसका स्थान नाभी ॥ २ इसका स्थान हृदय ॥ ३ सोलह स्वर अ
आ इत्यादि ॥ ४ इसका स्थान कंठ ॥ ५ व्यंजन ॥ ६ नाना प्रकारकी ॥
७ इकट्ठा ॥ ८ पश्यंति होय फिर परा अवस्था को प्राप्त होता है ॥ ९ लय॥
१० उत्पत्ति ॥ ११ ओंकार ॥ १२ उबिआहट ॥ १३ सच्चा ॥ १४
भरमाने ॥ १५ मार्ग, रस्ता ॥ १६ पद, अर्थ, शब्दका जो अर्थ, शब्दार्थ॥
१७ व्यंग, अर्थ, व्यंग भाव से जो कहा जावे ॥ १८ मतलब आशय
वाला जो अर्थ १९ ध्वनिमात्र ॥ २० परा और अपरा दो विद्या कोई शब्द
परा विद्या को वर्णन करता है कोई अपरा को ॥ २१ भटकता है ॥
( ३६ ) रमैनी ।
हिचानियै, कौनकहावौआय ॥२॥ रमैनी ॥ अक्षरवेदपुराणब
खान ॥ धरमकरमतीरथअनुमान ॥ अक्षरपूजासेवाजाप॥और
महातमजेतेथाप॥यहीकहावतअक्षरकाल॥जाएगडीउरह्योके
भालै ॥ ओंहं सोहं आतमराम ॥ मायामंत्रादिकसब काम ॥
येसबअक्षर संधि कहै ॥ जेहिमानिनिशिवासर जिव रहै ॥ नि-
रगुणअलखअकहनिर्वाण ॥ मनबुधि इन्द्रिय जायनजान ॥
विधिनिषेधजहं ब्वैैंनितादोय ॥ कहैंकबीरपदझांईसोय ॥
साक्षी ॥ प्रथमेझांई झांकते, पैठासंधिककाल ॥ पुनिझांईकी
झांईरही, गुरुबिन सकेकोढाल ॥ ३ ॥ रमैनी ॥ प्रथमही
संभैवशब्द अमान ॥ शब्द्दीशब्दकियोअनुमान ॥ मानमहा
तममानभुलान ॥ मानत मानत बावनठान ॥ फेरा फिरतभ-
यो भ्रमजाल ॥ देहादिकजगभयें विशाल ॥ देहभईतेदेहिक-
होय ॥ जगतभईतेकती कोय ॥ कती कौंरणकर्महिलाग ॥
घरघर लोगकियो अनुराग ॥ २७छौ दरशनवर्णश्रमचार ॥ २९नौ
छौ भए पाखंडबेकार ॥ कोई ३१त्यागी ३२अनुरागी कोय ॥ विधि-
निषेधमाबधियादोय ॥ कल्पेउग्रंथपुराणअनेक ॥ भरभिरहें
सबबिनाबिवेक ॥ साक्षी ॥ भरभिरहासब शब्दमें, सबदी-
शब्दनजान ॥ गुरुकृपानिजपरखैबल, परखोधोखाज्ञान ॥ ४ ॥
२२ तीर ॥ २३ जगत को निषेधकर और ब्रह्मका प्रतिपादन करना यह
है स्त्री जिसका ॥ २४ होताभया ॥ २५ शब्दका मालिक शब्द कहने वाला ॥
२६ हेतु॥२७ १योगी२ जंगम३ सेवड़ा ४ सन्यासी५दर्भेश ६ छठांकहिये ब्राह्म
ण छ घर छ है भेश ॥ २८ ब्राह्मण १ क्षत्री २ वैश्य ३ शूद्र ४ वर्ण और
ब्रह्मचर्य्य १ गृहस्थ २ बाणप्रस्थ ३ सन्यास ४ आश्रम ॥ २९-३०=
छ्यानवेपाखण्ड ३१ विरक्त ॥ ३२ गृहस्थ ॥
रमैनी ॥ धोखाप्रथमपरखियेभाई ॥ नामजातिकुलकर्मबड़ाई
क्षिति<sup>३३</sup>जल पावक<sup>३४</sup> मरुत<sup>३५</sup>अकाश ॥ तामहपंच<sup>३६</sup> विषयपरकाश॥
तत्व पांचमेंश्वासासार ॥ प्राणअपानसमान उदान<sup>३७</sup> ॥ और-
व्यानबावनसंचार ॥ निजनिज थल<sup>३८</sup>निज कारजकार ॥ इंग-
ला पिंगलाऔ सुखमनी ॥ इकइस सहस्र छौसत सोगनी ॥
निगम<sup>३९</sup> अंगम<sup>४०</sup> सो सदा बतावै ॥ श्वासासारसरोदा गावै ॥
साक्षी ॥ धोखा <sup>४१</sup>अँधेरी पायकै, याविधिभयाशरीर ॥
कल्पेउकारताएक पुनि, बढ़ीकर्मकी <sup>४२</sup>पीर ॥ ५ ॥ रमैनी ॥
योग्य जप तपध्यानअलेख ॥ तीरथ फिरतधरेबहुभेख ॥
योगी जंगमसिद्धउदास ॥ घरको त्यागि फिरेबनबास ॥ <sup>४३</sup>कैन्द
<sup>४४</sup>मूल <sup>४५</sup>फल करतअहार ॥ कोइकोइ जटाधरे शिरभार ॥ मन-
मलीन मुखलायेधूर ॥ आगे पीछेअग्रिऔ <sup>४६</sup>सूर ॥ नग्रहोयनर
<sup>४७</sup>खोरि नफिरे ॥ पीतरपाथरमेंशिरधरे ॥ साक्षी ॥ कालशब्द-
केसोरते, <sup>४८</sup>होरपरीसंसार ॥ देखा देखीभागिया, कोईनकरे
विचार ॥ ६ ॥ रमैनी ॥ जब <sup>४९</sup>पुँनिआयलखी यह <sup>५०</sup>बाँनि ॥
तबपुनिचित्तमाकियो अनुमनि ॥ महीं ब्रह्म कर्त्ताजगकेर ॥
॥ ३४ अग्नि ३३ पृथ्वी ३५ वायु ॥ ३६ शब्द आकाश का विषय स्पर्श
वायुका ॥ रूप अग्नि का रसजलका गंध पृथ्वीका ३७ उदान ॥ ३८ स्थान॥
३९ शास्त्र ॥ ४० वेद ॥ ४१ अविद्या अज्ञानता ॥ ४२ दुख ॥ ४३ जो
पृथ्वी के नीचे होता है जैसे आलू शकरकंद केसउर फर इत्यादि ॥ ४४ जो
मूल से होता है अर्थात् काठ फोड कर जो निकलता है जैसे कट हल; गूलर
ईत्यादि ॥ ४५ जो फूल से पैदा है जैसे आंब ( केरी ) अमरूद(जामफळ)
इत्यादि ॥ ४६ सूर्य्य ॥ ४७ बेशर्म ॥ ४८ शोर हल्ला ॥ ४९ फिर ॥
शब्द ॥ ५० ॥
- the letter has a loop/tail:परखेउ धोखा-! Yes, it's definitely परखेउ. Wait, let's look at परखेउ: प र ख े उ. Yes, उ`.
भेवनिज, गुरुकी दयाउवार ॥८॥ रमैनी ॥ पहिले एकशब्द-
समुदाय ॥ बावनरूपधरेछितराय ॥ इच्छा नारिधरेतेहिभेश॥
तातेब्रह्मा विष्णुमहेश ॥ चारिउ उरपुरबावनजागे ॥ पंच अठ-
रह कंठहिलागे ॥ तालू पंचशुन्यसोआय ॥ दसरसनाके पूत-
कहाय॥पांचअधर अधरहीमारहै॥शुन्नेकंठसमोधेवहै॥ ओठकें-
ठेलेप्रगटे ठौर ॥ बोलनलागे औरकेऔर ॥ साक्षी ॥ एक-
शब्द समुदायजो, जामेचार प्रकार ॥ कालशब्द सें-
५१ पांचतत्व ॥ देखो रमैनी ३ । १० इत्यादि ॥ ५३ कहां ॥ ५४ भेद ॥
५५ शोक दुख, ॥ ५६ कहने में जो नहीं आवे ॥ ५७ कला अंश रहित ॥
५८ इच्छा रहित ५९ बाद
६ ॥ ७२ बाणी ॥` (wait, ६९६)
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७३ फंस गया ॥ ७४ कठिन ॥ ७५ शब्द ॥ ७६ पांचतत्व ७७ कीचड़
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पंक, कांदो ॥ ७८ निराकार ॥
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रमैनी । ( ३९ )
घिशब्द, झांईऔपुनि सार ॥ ९ ॥ रमैनी ॥ पांचैं ^६३ तीनि ^६४
^६५ नौ ^६६ छौ ^६७ औचार ॥ और ^६८ अठारह करेपुकार ॥ कर्मधर्मतीरथ-
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घिशब्द, झांईऔपुनि सार ॥ ९ ॥ रमैनी ॥ पांचैं ^६३ तीनि ^६४
^६५ नौ ^६६ छौ ^६७ औचार ॥ और ^६८ अठारह करेपुकार ॥ कर्मधर्मतीरथ-
केभाव ॥ ईसवकालशब्दकेदाव ॥ सोहंआत्माब्रह्मलखाव ॥
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( ४० ) रमैनी ।
भरमबढ़ीशिरकेशबढावै ॥ तकेगगन कोइ बांह उठावै ॥ दैता
री करनाशाग है ॥ भरमिकगुरू बतावै लहै ॥ भरम बढ़ी अरु
घूमन लागे ॥ बिनु गुरु पारख कहु को जागे ॥ साक्षी ॥
कहैं कबीर पुकारके, गहहुशरणतजिमान ॥ परखावे गुरभर-
मको, बानि खानिसहिदान ॥ ११ ॥ रमैनी भरमजीव परमा
तममाया॥भरमदेहऔ भरम र्निकाया ॥ अनहदनाद औ ज्यो
ति प्रकास ॥ आदिअन्तलौभरमहि भास ॥ इत उत करे भरम
निर्रमान ॥भरम मान औभरमअमान॥कोहं जगतकहांसे भया॥
ईसबभरम अतीनिरमया ॥ प्रंलय चारि भ्रमपुण्य औ पाप ॥
मन्त्रजापपूजाभ्रमथाप ॥ साक्षी ॥ बाट बाट सब भर्म है,
माया रचीबनाय ॥ भेद बिना भरमें सकल,गुरु बिन कहांल-
खाय ॥ १२ ( बापपूत दोउ भरमहै, मायारची बनाय ॥ भेद
बिनाभरमे सकल, गुरु बिनकहाँलखाय ) ॥ साक्षी ॥
बापपूत दोऊ भरम, औधकोश नवपांच ॥ बिन गुरु भरम
नछूटे, कैसे आवैसांच ॥ १३॥ रमैनी ॥ कैलमा बाँग निर्माज
गुजारे॥भरमभई अल्लाहपुकारै ॥ अजबभरम एकभईतमासा॥
लाँ मुकाम बेचूँननिबासा ॥ वेनैमूनवहसब केपारा॥ आँखि-
रताको करे दिर्दारा ॥ रगड़ैनाक मँसजिदअचेत ॥ निंदे बुँत
७९ स्थित ॥ ८० नित्य प्रलय १ नैमित्तिक प्रलय २ महाप्रलय ३ आत्यं
तिक प्रलय ४ ॥ ८१ अधामात्रौ ॥ मुसलमानो का गुरु मन्त्र ला एला इलि-
ल्लाह मुहम्मदुर्रसू लिल्लाह ॥ ८३ अजान जो निमाज पढ़ने के थोड़ीही पहले
निमाज के समय सूचन करने को कलमा श० पुकारते हैं ॥ ८४ जो खुदा
के प्रार्थना पांच समय दिन और रात्री पढ़ते हैं पश्चिम मुह होंकर ॥ ८५
स्थान रहित ॥ ८६ निराकार ॥ ८७ अद्वितीय ॥ ८८ क्यामतके दिन,सृष्टि
के अंत में जब खुदा सबका न्याय करेगा ॥ ८९ दर्शन ॥ ९० मुसलमानों
के नेमाज पढ़ने की जगह ॥ ९१प्रतिमापूजक ॥
रमैनी । ( ४१ )
परसततोहिहेत ॥ बौवन तीसंबरन निरमान ॥ हिन्दू तुरुक
दाऊभरमान ॥ साक्षी ॥ भरमिरहेसब भरममहं, हिंदू-
तुरुकबखांन ॥ कहहिंकबीरपुकारिकै, बितुगुरूकोपहिचान
॥ १४ ॥ रमैनी ॥ भरमत भरमतसबै भरमाने ॥ रामसनेही
बिरलेजाने ॥ तिरदेवा सबखोजतहारे ॥ सुरनरमुनिनहिपा-
वतपारे ॥ थकितभयातबकहावेअन्ता ॥ विरहैंनिनारिरही
बितु कैन्ता ॥ कोटिनतरक करें मनमाहीं ॥ दिलकी दुबिधा
कतहूँनजाही ॥ कोई नख शिखजटा बढ़ावै ॥ अरमिभरमि-
सबजहँतहँधावैं ॥ बाटनसूझै भईअँधेरी ॥ होयरहीबानी कीं
चेरी ॥ नाना पन्थ बरनिनहिंजाई ॥ ( जातिकर्म गुन नाम
बड़ाई ) जाति वरणकुलनामवड़ाई ॥ रैन दिवसवे ठाँठेरहहीं
वृक्ष पहारकाहेंनहितरहीं ॥ साक्षी ॥ खेसमनचीन्हे बावरी,
परपूरुषलौलीन ॥ कहंहिकबीर पुकारके परीनबानीचीन
॥ १५ ॥ रमैनी ॥ कैनरसकी मतवालीनारि ॥ कुँटनीसेखो-
जे लैंगवारि ॥ कुटनीआंखिन कौंजरदियऊ । लागिवैंतावन
ऊपरपीयऊ ॥ काजरलेकेहूवैगईअंधी ॥ समुझनपरीबाँतेंकी
१०४ संधी ॥ बाजेकुटनीमोरे १०५ मँटकी ॥ ई सब छिनरोतामहँअ-
टकी ॥ विरहिनिहोय के देहसुखावै ॥ कोई शिरमह केशब-
ढ़ावै ॥ मानि मानि सब कीन्ह सिंगारा ॥ बिनपियपरसैंस-
बैंअंगारा ॥ साक्षी ॥ अटकीनारिछिनारि सब, हर-
दम कुटनीद्वार ॥ खसम न चीन्हेबावरी, घरघरफिरतखु-
९२ संस्कृत वर्णमाला के ५२ अक्षर ॥ ९३ मुसलमानीवर्णमाला के
३० अक्षर ॥ ९४ मुसलमान ॥ ९५ वियोगिन ॥ ९६ पिया मालिक ॥
९७ खड़े ॥ ९८ मालिक ॥ ९९ बाणी ॥ १०० गुरुआ लोग ॥
१०१ आशना, जार ॥ १०२ झूठा उपदेश ॥ १०३ उपदेश करने
लगी ॥ १०४ मिलावट ॥ १०५ इशारा ॥
( ४२ ) रमैनी ।
वार ॥ १६ ॥ रमैनी ॥ नवदरवाजाभरमविलास ॥ भरमहि-
वावनबहेवतास ॥ ^१०६कैंनउजबावनभूतसमान ॥ कहं लगिगनों
सो प्रथमउडान ॥ माया ब्रह्मजीवअनुमान ॥ मानतही मालि-
क बौरान ॥ अकबकभूतवके परचंड ॥ व्यापि रहा सकलों
ब्रह्मांड ॥ ई भर्म भूत की अकथकहानी ॥ ^१०७गोत्योजीवजहांन-
हिंपानी ॥ तनकतनकपरदौरे बौरा ॥ जहांजायेतहंपावेन-
ठौरा ॥ साक्षी ॥ योगी रोगीभक्तबाबरा, ज्ञानीफिरे
^१०८निखटू ॥ संसारीको ^१०९चैन नहींहै, ज्योंसरांयकाटटू ॥ १७
रमैनी ॥ इतैंउंतदौरैसबसंसार ॥ छुटेनभरमकिआउपचार ॥
जरैजीवकोबहुरिजरावै ॥ काटे ऊपर लोनलगावै ॥ योगी
ऐसी हालबनाई ॥ ^१११उलटी वत्ती नाक चलाई ॥ कोइविभूति-
मृगछालाडारे ॥ अगमपन्थकी राहनिहारे ॥ काहूको जलमां-
झसुतावे ॥ कहंरतहीं सबरैनगंवावै ॥ भगती नारी कीन
श्रृंगार ॥ बिन प्रिया परचै सबै अंगार ॥ एकगर्भ ज्ञानअनु-
मान ॥ नारि पुरुषकाभेदनजान ॥ संसारीकहूंकलनाहिंपावे
॥ ^११२कहरतजगमेंजीवगंवावे ॥ चारिदिशामें मंत्रीझांरे ॥
लियेपलीतामुलनाहारे ॥ जरैनभूतबड़ो वरि^११४खारा ॥ काजी
पण्डित [पचिपचि] पढ़िपढ़ि हारा ॥ इन दोनोंपरएकै भूत ॥
झारेंगे क्यामाकी चूत ॥ साक्षी ॥ भूत नउतरे भूतसों, सन्तों
करोविचार ॥ कहैंकबीरपुकारिके, बिनुगुरु नहिंनिस्तार ॥
साक्षी॥परमप्रकाश ^११५भाँसजो, होत ^११६प्रौढाविशेष॥ तद् प्रकाश
१०६ अक्षर १०७ डुबाया ॥ १०८ उदास ॥ १०९ सुख ॥ ११० यहां
बवां ॥ १११ नेती धोती बाहर कराता है ॥११२ हाय २ करतें २ ॥
११३ पंडित लोग ॥ ११४ मजबूत बलीबलवान ॥ ११५ अध्यास
॥ ११६ दृढ़ ॥
संभव भई, महाकाश सो शेष २१ ॥ साक्षी ॥ झांईंसंभवबुद्धि
ले, करीकल्पना अनेक ॥ सोपरकाशक जानिये, ईश्वरसाक्षी
एक ॥ साक्षी ॥ बिषमभईंशंकल्प जब, तदाकारसोरूप ॥ महा
अंधेरीकालसो, परेअविद्या कूप ॥ साक्षी ॥ महातत्व
त्रीगुणपांच तत्व, सैमष्टि ११७ व्यैष्टि ११३ परमान ॥ दोय प्रकार होयप्र-
गटे, ११९खंड १२०अखंडसोजान ॥ २२ ॥ रमैनी ॥ सदा अस्ति १२१भा
से निजभास ॥ सोईकहियेपरम प्रकाश ॥ परमप्रकाशले झां-
ईं होय ॥ महदअकाश होयबरते सोय॥बरतेवर्त मानपरचंड॥
१२२भासक तुरियातीतअखंड ॥ कालसंधिहोये उश्वास ॥ आगे
पीछे अनवनि भास ॥ विविधि भावना कल्पित रूप ॥ परका-
शी सोसाक्षि अनूप ॥ शून्य अज्ञान सुषुप्तिहोय ॥ अकुलाहट
ते नादै सोय ॥ (शून्य ज्ञान सुषुप्ती होय ॥ अकुलाहटसे नादी
सोय ) ॥ नादवेद अकर्षण जान ॥ तेजनीर प्रगटे तेहिआन ॥
पानी पवन गांठि परिजाय ॥ देही देह धरे जग आय ॥ सो
कौआर शब्द परचंड ॥ बहुव्यवहार खण्डब्रह्माण्ड ॥ साक्षी ॥
जतन भये निज अर्थ को, जेहि छूटे दुख भूरि १२३॥ धूर परी
जब आंखमें, सूझे किमि निजसूर ॥ २३ ॥ रमैनी ॥ पांजी
परख जबै फरिआवै ॥ तुरतहि सबै विकार नशावै ॥ शब्द
सुधारिके रहे अकरम ॥ स्वाती भक्ति के खोटे भरम ॥ काल
जाल जो लखि नहिं आवै ॥ तौलौ निजपद नहीं पावै ॥
झांई संधि काल पहिचान ॥ शार शब्द बिनु गुरु नहिं-
जान ॥ परखे रूप अवस्था जाए ॥ आन विचार न ताहि
समाए॥ १२४झांईं संधि शब्दले परखे जोय॥संशय वाकेरहै न कोय॥
११७ समूह जैसे बन ॥ ११३ एक जैसे एक वृक्ष ॥ ११९ अंस
॥ १२० पूर्ण ॥ १२१ सत्य ॥ १२२ अध्यास का कराने वाला ॥
१२३ ढेर्र समूह ॥ १२४ वेदांत ॥
साक्षी ॥ धन्य धन्य तरण तरण, जिन परखा संसार ॥
बंदी छोरकबीरसों, परगटगुरू विचार ॥ २४ ॥ रमैनी ॥
शब्द संधि ले ज्ञानी मूढ ॥ देह करमजगत आरूढ़ ॥ नौंइंसं-^१२५
धिलै सपना होय ॥ झांईं शून्य सुषोपति सोय ॥ ज्ञान प्रका-
शक साक्षी संधि ॥ तुरियातीत अभास अबंधि ॥ झांईं ले
बरते वर्तमान ॥ सो जो तहां परे पहिचान ॥ काल अस्थिति
के भासनशाए ॥ परख प्रकाश लक्ष बिलगाए ॥ बिलगेलक्ष
अपन ^१२६पौ जान ॥ आपु अपन पौ भेद न आन ॥ साक्षी
॥ आप अपन पौ भेद बिनु, उलटिपलटि अरझाय ॥ गुरु बि-
न मिटे न दुगदुगी, अनबनीयतभनशाय ॥ २५ ॥ रमैनी ॥
निज प्रकाश झांई जो जान ॥ महा संधि माकाश बखान ॥
सो ईं^१२७पांजी ल बुद्धि विशेष॥प्रकाशक तुरियातीत अरुशेष॥
विविध भावना बुधि अं^१२८नुरूप ॥ विद्यामाया सोई स्वरूप ॥
सो संकल्प