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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

॥ शब्द १० ॥
बहुतक देखी देखा करहीं।
जोग जुक्ति कछु आवै नाहीं,
अंत भर्म महँ परहीं ॥ १ ॥
गे भरुहाइ१ अस्तुति जेइ कीन्हा,
मनहिं समुझि ना परई।
रहनी गहनी आवै नाहीं,
सब्द कहे तें लरई ॥ २ ॥
नहीं बिबेक कहै कछु औरै,
और ज्ञान कथि करई।
सुझि बूझि कछु आवै नाहीं,
भजन न एकौ सरई ॥ ३ ॥
कहा हमार जो मानै कोई,
सिद्धि सच चित धरई।
जगजीवन जो कहा न मानै,
झार२ जाय सो परई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ११ ॥
साधौ भक्ति सहजहि ध्यान ।
मनहिं ब्यापत साँचु नाहीं, कहा प्रात अस्नान ॥ १ ॥
कहा कंठी कंठ बाँधे, सैल्हि मुद्रा कान ।
कहा माला लै सुमिरनी, हिये नहिं पहिचान ॥ २

ठाढ़ बैठे घोंच तूरहिं, तकत हैं असमान ।
वृथा सब परतीत बिनु है, भ्रम भूले हैवान ॥ ५ ॥
खोज काया करहु थिर मन, त्यागि कपट सयान ।
भजहु अंतर नाम वाहै, राम सत्त प्रमान ॥ ६ ॥
लाउ रसना नाहिं बिसरै, प्रगट करु न बखान ।
जगजीवन बिस्वास निरमल, होहु जैसे भान ॥ ७ ॥
॥ शब्द १२ ॥
बौरे मन को नहिं भरमाव ।
तीन लोक के करता साँई, ताहि सों ध्यान लगाव ॥ १ ॥
तीरथ कोटि साज जिन कीन्हेउ, सो संतन हिये आव ।
चढ़ि कै गगन देखु सूरति को, ताहि काँ सीस नवाव ॥ २ ॥
सूरति सत्त प्रेम रस पानी, ताहि में चित अन्हवाव ।
अमर होहु भवसागर उतरहु, नहिं आवहु नहिं जाव ॥ ३ ॥
सतगुरु सत्त कहा यहि बानी, अलख नाम धुनि लाव ।
जगजीवन साहब को छबि में, आपनि सुरति समाव ॥ ४ ॥
॥ शब्द १३ ॥
मन गृह ग्राम यह अस्थान ।
सात दोप नव खंड पृथ्वी, सिर उर तेहि माँ जान ॥ १ ॥
तीनि लोक बिस्तार है तेहिं, रमत गन ससि भान ।
चौथ इहै बनाय दोन्ह्यौ, संत राखत ध्यान ॥ २ ॥
दरवाज नौ दस प्रगट आहैं, काहु तें न छिपान ।
रमत तेहि के ब्रह्म भीतर, नहीं कहुँ बिलगान ॥ ३ ॥
काया भीतर खेल खेलहु, अनत करु न पयान ।
बाहर तौ सब देखिबे को, घट अहै सो प्रमान ॥ ४ ॥
कहत हौं उपदेस छोड़ु, अँदेस रहु ठहरान ।
जगजीवन निर्बान सतगुरु, चरन रहु लिपटान ॥ ५ ॥

६० जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १४ ॥
मन तुम रहहु चरन सरनाई ।
यहि काया का अंत खोज नहिं, काहू भेद न पाई ॥ १ ॥
तीनि लोक काया रचि दीन्ह्यौ, चौथा दीन्ह बनाई ।
तीरथ कोटि अहैं याही में, संतन दीन्ह बताई ॥ २ ॥
अजपा जाप जपत रहु निसु दिन, प्रगट न देहु जनाई ।
इहि तें मंत्र नहीं है एकौ, भर्म न परहु भुलाई ॥ ३ ॥
सेस महेस बिस्नु औ ब्रह्मा, रहे हैं ध्यान लगाई ।
निर्गुन निरंकार वह मूरति, तेहि माँ रहौ समाई ॥ ४ ॥
रहु ठहराय गगन करु बासा, निरखि देखु निरथाई ।
जगजीवन सतगुरु की मूरति, रबि ससि छवि छिपि जाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द १५ ॥
साधौ भेष बाँधि गफिलाने ।
रहै अभेष भेद तब छूटहि, सहज रीति मन जाने ॥ १ ॥
जब तें माला कंठी पहिरी, गर्ब भयो इतराने ।

कर्म भर्म निषेध। ६१
दान पुन्यं करि तपस्या, बर्त बहुत रहाहिं।
त्यागि बस्ती बैठि बन महँ, कंदमूरहिं खाहिं ॥ २ ॥
पाठ करि पढ़ि बहुत बिद्या, रैन दिनहिं बकाहिं।
गाय बहुत बजाइ बाजा, मनहिं समुझत नाहिं ॥ ३ ॥
करहिं स्वाँसा बंद कष्टित, भाँड़ की गति आहिं।
साधि पवन चढ़ाय गगनहिं, कमल उलटै नाहिं ॥ ४ ॥
साध नहिं केहु कीन ऐसे, सिखे बहुत कहाहिं।
प्रीति रस मन नाहिं उपजत, परे ते भव माहिं ॥ ५ ॥
जस सँजोग बियोग तैसे, तत अच्छर दुइ आहिं।
रटत अंतर भेंट गुरु तैं, मंत्र अजपा माहिं ॥ ६ ॥
कहौं प्रगट पुकारि जेहि के, प्रीति अंतर आहिं।
जगजीवन दासँ रीति अस,
तब चरन महँ मिलि जाहिं ॥ ७ ॥
॥ शब्द १७ ॥
चरन सरन रहौं, कहूँ अंतै नाहिं जाऊँ ॥ टेक ॥
रही पास किहे बास, त्यागि सर्ब और आस,
भजत रहौं नाऊँ ॥ १ ॥
तीनि त्यागि चौथ तत्त, पाँह बैठि निरभय ह्वै,
तकौं ना उराऊँ१ ॥ २ ॥
मारि आसन रहौं बैठि, नैनन टक लाय डोरि,
निरमल सत नीर पाइ, नित्त सो अन्हाऊँ ॥ ३ ॥
जुग जुग जग बैठि संग, मगन रसँ तेहि रंग,
जगजीवन दास सतगुरु सो, चेला ताहि क आऊँ२ ॥ ४ ॥
(१) दूसरी ओर। (२) हूँ।

६२ जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १८ ॥
सब खाकहि मिलिहै रे भाई ।
किया चहहु कर लेहु बंदगी, मन तें छाँड़हु गफिलाई ॥ १ ॥
भूलै फूलै देखि न दौलत, काहु क संग न जाई ।
पैदा भये निपैद भये ते, केहु की खबर न केह पाई ॥ २ ॥
कहँ धौं गये कहाँ धौं वह घर, कहाँ जाइ धौं रहे समाई ।
छत्री जोधा जोगी दानौ१, काल लीन्ह सब खाई ॥ ३ ॥
बचा नहीं कोउ ना कोइ बचिहै, मन्द कहत गोहराई ।
जगजिवन दास नाम गहि उबरे, सतगुर चरनन सरनाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १९ ॥
बहु पद जोरि जोरि करि गावहिं ।
साधन कहा सो काटि कपटि२ कै,
अपन कहा गोहरावहिं ॥ १ ॥
निंदा करहिं विवाद जहाँ तहँ,
बक्ता बड़े कहावहिं ।
आपु अंध कुछ चेतत नाहीं,
औरन अर्थ बतावहिं ॥ २ ॥
जो कोउ नाम का भजन करत है,
तेहि कौं कहि भरमावहिं ।
माला मुद्रा भेष किये बहु,
जग परमोधि३ पुजावहिं ॥ ३ ॥
जहँ ते आये सो सुधि नाहीं,
झगरे जन्म गँवावहिं ।
जगजीवन ते निन्दक बादी,
बास नर्क महँ पावहिं ॥ ४ ॥
(१) राक्षस । (२) काट छाँट कर । (३) राजी कर के ।

कर्म भर्म निषेध । ६३.
॥ शब्द २० ॥
अन्तर जो कोउ नाम धुनि लावै ।
अजपा रसना सदा लागि रहै, नाहीं भेद बतावै ॥ १ ॥
इत उत आस निरास होय जब, मन अस्थिर लै पावै ।
रहै ठहराय सिखर है सीतल, निरखि रूप तब आवै ॥ २ ॥
देखत अहै सुनत है सरवन, काहेक कहि गोहरावै ।
भयो मस्त रस पाय अमृतै, काहेक घंट बजावै ॥ ३ ॥
तब बैराग भयो अनुरागी, काल निकट नहिं आवै ।
जगजीवन सतगुरु की किरपा, नहिं आवै नहिं जावै ॥ ४ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अब तौ ज्ञान कथै को भाई ।
सब्द कहत सो मानत नाहीं, केतौ कहि समुझाई ॥ १ ॥
भेष जगत सब भूले मैं तैं, सुमति न हिये समाई ।
बहु जलधर बरषहिं पखान पर, सोखत नाहीं जाई१ ॥ २ ॥
दोख परत सब हिये सबहिन का, सुरति नाहिं ठहराई ।
जहाँ तहाँ भरमत बीतत है, नाहीं भजन दृढ़ाई ॥ ३ ॥
बहु अभिमान गुमान गर्ब तैं, करहिं बाद अधिकाई ।
सो करतूति भुगुति है काया, परै नर्क में जाई ॥ ४ ॥
कोइ कोइ जन मन को थिर राखैं, अन्तर रटनि लगाई ।
जगजीवन ते भक्त कहाये, सतगुरु लीन्ह सिखाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द २२ ॥
और कछु मंत्र नाम सम नाहिं ।
चलै न जिभ्या मुख नहिं बोलै, रटत रहै मन माहिं ॥ १ ॥
(१) जैसे बादल कितनाहीं मेंह बरसाते हैं पर पत्थर के भीतर नहीं
धसता इसी तरह जगत भेष को जितना चाहे उपदेश करो पर हृदय में असर
नहीं करता ।

६४' जगजीवन साहब की बानी
कोउ कासी कोउ जात द्वारकै, हित कर तीरथ न्हाहिं ।
कोउ ब्रत दान अचार करै बहु, कोऊ तपस्यहिं जाहिं ॥ २ ॥
तूरत बाहैं धींच गगन मुख१, उलटी धूम घुटाहिं२ ।
पीवत दूध दूब फल बन के, कंद मूरि खनि३ खाहिं ॥ ३ ॥
कोउ रहैं ठाढे कोउ रहैं बैठै, कोउ होइ जोगी जोग कराहिं ।
कोउ जागै निसि दिन नहिं सोवैं, कोउ दम साध रहाहिं ॥ ४ ॥
जज्ञ राग रस निर्त रंग कबि, ज्ञानी ज्ञान कथाहिं ।
पंडित कथा पुरान बखानहिं, पढ़तै जन्म सिराहिं४ ॥ ५ ॥
माला मुद्रा भस्म लगावहिं, चंदन तिलक कराहिं ।
सलिग्राम औ पीतर पुतरी, पूजि पूजि हरषाहिं ॥ ६ ॥
एह सब करै सरै न भजन बिन, मन थिर होवै नाहिं ।
परहिं आय भौजाल फेरि फिरि, समुझि समुझि पछिताहिं ॥ ७ ॥

कर्म धर्म निषेध । ६५
परपंची परपंच करहिं जे, परा ते भव प्रतिकूला ।
जगजीवन एहि देखि तमासा, सतगुर छवि गहि मूला ॥ ४ ॥
॥ शब्द २४ ॥
सब जग दीन्ह धंधे लाय ॥ टेक ॥
जहाँ तहाँ लगाय धागा, सुद्धि गई भुलाय ।
जारि डारि संसार माया, लीन्ह सबहिं विरुफाय१ ॥ १ ॥
बिना दाया नाहिं छूटै, करै कोटि उपाय ।
पाँच और पचीस मिलि कै, अपथ गैल चलाय ॥ २ ॥
चुभे पाँवन कर्म काँटा, दरद भे अधिकाय ।
गये गल पचि नाम बिनु बहि, ज्यों बुल्ला बुंद बिलाय ॥ ३ ॥
करि कृपा मन खैंचि लीन्ह्यो, राखि लइ सरनाय ।
जगजीवन सोइ भयो निर्भय, काल तें न डेराय ॥ ४ ॥
॥ शब्द २५ ॥
भे जे नाम भजि मस्तान ।
सदा लागी रहत तारी नाहिं सूझत आन ॥ १ ॥
दीनता गहि सीस वारे तजे गर्व गुमान ।
अबल कोऊ कहै नहिं तेहिं महा है बलवान ॥ २ ॥
काल तिन तें करत बिनती रहत सदा हैरान ।
कहत सब्द पुकारि कै सुनि मान ले परमान ॥ ३ ॥
रहत नीचे तकत ठाढ़े जहँ सतगुर निर्वान ।
जगजीवन गहि चरन मन तें, भये ताहि समान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २६ ॥
कर मुकाम जहाँ निर्गुन नाम ।
ए मन बैठ रहौ तेहिं के ढिग,
तबही सुख पैहौ बिस्राम ॥ १ ॥
(१) ऐसा उलझना कि फिर न छूटै ।

६६ जगजीवन साहब की बानी
उत्तम मध्यम तहँवाँ कछु नहिं,
नाहिं छाँह नहिं अहै घाम ।
पानि पवन उहँ भूख प्यास नहिं,
नाहीं दुख नहिं अहै अराम ॥ २ ॥
झलमल निर्मल निरख देखु तहँ,
उत्तम बना गगन भल ग्राम ।
जगजीवन डर नाहिं काल का,
सतगुर चरन तें राखहु काम ॥ ३ ॥
॥ शब्द २७ ॥
मन महँ समुझि भजहु रे भाई ।
बिना नाम नाहीं सुख पैहौ, छाँड़ि देहु गफिलाई ॥ १ ॥
बादसाह तख्त चढ़ि भूला, सूबा करत सुबाई ।
राजा राज-काज महँ भूला, कबहुँ न बंदगी आई ॥ २ ॥
साहूकार दाम तकि भूला, दाया जिन्ह बिसराई ।
साँईं खैंचि लीन्ह सब माया, जहँ तहँ गयो बिलाई ॥ ३ ॥
जोगी जोग जुक्ति महँ भूला, पंडित करि पंडिताई ।
भोगी भोग पाप महँ भूला, सुधि बुधि गै बिसराई ॥ ४ ॥
तपसी करत तपस्या भूला, मनुवाँ कसा न जाई ।
पाँच साँच माँ आवत नाहीं, मिले बबूरिहि १ जाई ॥ ५ ॥
षट-दरसन दुनियाँ सब भरमत, जहँ तहँ तीरथ न्हाई ।
घटत न कर्म रहत अघ लादे, मन का मैल न जाई ॥ ६ ॥
बिना नाम कोइ पार न पाइहि, कहे देत गोहराई ।
जगजीवन सतगुर के चरनन, कबहुँ न मन बिसराई ॥ ७ ॥
(१) बबूल यानी काँटे में।

कर्म भर्म निषेध । ६७
॥ शब्द २८ ॥
अरे मन अंतै कतहूँ न धाव ।
रहै अंतर प्रीत लागी, जगत सब बिसराव ॥ १ ॥
तीन चौथ बनाय दीन्ह्यौ, नाहिं जान्यौ भाव ।
पाय औसर चूक नाहीं, इहै आहै दाव ॥ २ ॥
तीर्थ ब्रत और दान पुन्यं, एह न मन में लाव ।
एह सब अहैं गुलाम भक्त के, सीस नाहीं नाव ॥ ३ ॥
त्यागु सर्वस आस मन तें, गगन गाँव बसाव ।
जगजिवनदास निहारि मूरति, नयन दरसन पाव ॥ ४ ॥
॥ शब्द २९ ॥
जो कोइ यहि बिधि तीरथ न्हाय ॥ टेक ॥
मन का मैल लेइ मिसाय१, तब तिरबेनी घाट अन्हाय ॥ १ ॥
माया मोह दाल दै डारि, काम क्रोध मद देइ लुटाय ॥ २ ॥
काहे क कासी गंगहिं जाय, नाम तें मैलहिं डार छुड़ाय ॥ ३ ॥
जगजीवन दास कहै गोहराय,
बिन सतगुरु कोउ पार न जाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
ऐसी डोरि लगावहु पोढ़ि ।
टूटै डोरि लेहु फिरि जोरि ॥ १ ॥
जब लगि मुख तें कहिये बात ।
तब लगि नाम बिसरि मन जात ॥ २ ॥
जग प्रपंच संगति नहिं करिये ।
हिये नाम की रटना धरिये ॥ ३ ॥
चित माँ चित जो राखै लाय ।
ता पर काल कि कछु न बसाय ॥ ४ ॥
( १ ) उबटन लगा कर साफ करना ।
२३

६८ | जगजीवन साहब की वानी

जगजीवन के चरन अधार ।
सतगुरु संत उतारहिं पार ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३१ ॥
बिन वहि नाम तरै कोउ नाहीं ।
देखहु समुझि बूझि मन माहीं ॥ १ ॥
तीरथ ब्रत बहु भाँति कराय ।
जो पै अन्तर देखि न पाय ॥ २ ॥
जल तन धोय मैलि गा धोय ।
मन यहु नाम तें निर्मल होय ॥ ३ ॥
भूले करि षट कर्म अचार ।
याही तें भूला संसार ॥ ४ ॥
सहज डोरि जो राखै लाय ।
अंतर भजि तब भक्त कहाय ॥ ५ ॥
झूंठ साँच बहुत नहिं बोलै ।
रहि जग अपने मारग डोलै ॥ ६ ॥
रहै छिपित नहिं देइ जनाय ।
तब भजि अंतर भक्त कहाय ॥ ७ ॥
गर्ब गुमान त्यागि चलै चालू ।
दुख तेहिं देह न कबहुँ कालू ॥ ८ ॥
जगजीवन निर्मल निर्बान ।
सतगुरु चरन रहै धरि ध्यान ॥ ९ ॥
॥ शब्द ३२ ॥
मनुवाँ रहहु जिकिरि लगाय ।
और आस न राखु एकौ, देहु सब बिसराय ॥ १ ॥
कथा ग्रंथ पुकारि भाषैं, देत संत सिखाय ।
नाहिं एहि तें कछु उत्तम, त्यागि दे अमताय ॥ २ ॥

तीन त्यागहु चलौ चौथे, सहर अजब बनाय ।
राति नहिं तहँ दिवस नाहीं, अजब दिस सुहाय ॥ ३ ॥
बैठि गुरु सत तखत पर, तहँ रहो सीस नवाय ।
जगजीवन तहँ निरखि निर्मल, वरनि नाहीं जाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३३ ॥
सच नामं तत्त निर्मल, सुमिरहु मन लाइ ।
करै जाय अनेक कोइ कछु, अवर नहिं समताइ ॥ १ ॥
दान पुन्यं जज्ञ व्रत तप, तिरथ कोटि अन्हाइ ।
पार नहिं वहि नाम बिनु, सत सब्द आपत गाइ ॥ २ ॥
पढ़ै कोउ पुरान पाठं, ज्ञान कथि कविताइ ।
कीरति परगट कहन कहिये, नाहिं यह भगताइ ॥ ३ ॥
जानि छानि जिन नाम रसना अनत ना चित जाइ ।
जगजिवन दास ते भक्त मे गुरु चरन रहे लिपटाइ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
ए मन जोगी बैठि मढ़ी जपु राम ।
करता की गति काहु न पाई ।
नौ खिरकी दस दियो बनाई ॥ १ ॥
तीरथ व्रत कहँ कतहूँ न धाव ।
नेम अचार विचार बहाव ॥ २ ॥
पचीस जोगिनी चेला पाँच ।
तिन पर रहै आपनी आँच ॥ ३ ॥
जगन्नाथ तैं अपनै जानु ।
काया कासी और न थानु ॥ ४ ॥
प्राग प्रान तिरबेंनी वास ।
और न दूजी राखहु आस ॥ ५ ॥

१०० जगजीवन साहब की बानी
अजबै मढ़ी बनी चौगान ।
दृढ़ आसन निरखहु निर्बान ॥ ६ ॥
अमी नीर ले नैन तें पाइ ।
कर्म धर्म अघ सब मिटि जाइ ॥ ७ ॥
जगजीवन यह मति अनुरागु ।
आदि अंत गुरु चरनन लागु ॥ ८ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
सुमिरहु मन राम नाम चित लाइ ।
बिन वहि नाम नाहिं कोउ तरिहै, कहत अहौं गोहराइ ॥ १ ॥
जज्ञ दान ब्रत तीर्थ तपस्या, जगत भ्रम सब आइ१ ।
बाहर ढूंढ़े नहिं कछु मिलिहै, रहु अंतर ठहराइ ॥ २ ॥
धावहु ना कहुँ आवहु थिर है, बाहर फिकिर बहाइ ।
कर परतीत रीत संतन की, मिलिहैं तबहीं साँइँ ॥ ३ ॥
कहे सुने नहिं भटकसि कबहूँ, जगत बदी अधिकाइ ।
सिखि पढ़ि सुनि कै बातें बहुती, भजन मनहिं बिसराइ ॥ ४ ॥
रहु जानत मन नाहिं जनावहु, रहहु अभेष छिपाइ ।
जगजीवन सतगुरु काँ निरखहु, चरन रहहु लिपटाइ ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३६ ॥
सतगुरु तुम मोहिं सिखायो ।
सो सिखि मैं सोई गायो ॥ १ ॥
अब मोहिं आपन करि लीन्हा ।
मैं सीस चरन तर दीन्हा ॥ २ ॥
मैं आदि अंत का आऊँ२ ।
अब सुमिरत आहूँ नाऊँ ॥ ३ ॥
(१) है। (२) हूँ।

कर्म भर्म निषेध । १०१
एहि कठिन नदी है धारा ।
तुम अब कि उतारहु पारा ॥ ४ ॥
जगजीवन दास तुम्हारा ।
मैं सीस चरन पर वारा ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३७ ॥
साधौ का कहि सब्द सुनावै ।
सब्द है साँच माँच१ कहि भाषै,
काहु के मन नहिं आवै ॥ १ ॥
जग सब अंध कुमारग डोलहि,
चेत हेत नहिं लावै ।
हिय कठोर पाषान अहै बहु,
नाहीं सब्द समावै ॥ २ ॥
भेख अलेख२ बहुत है दुनियाँ,
करि कै स्वाँग दिखावै ।
आसा झूठ लाय सब बाँधा,
नाहिं निरंतर गावै ॥ ३ ॥
कोई तीरथ बरत तपस्या,
जहाँ तहाँ कहँ धावै ।
जल पषान की आहै पूजा,
भ्रमि भ्रमि जन्म गँवावै ॥ ४ ॥
अजपा जपत रहै बिन जिभ्या,
कबहूँ नाहिं बिसरावै ।
जगजीवन पहुँचा चौथे पद,
गुरु कहँ सीस नवावै ॥ ५ ॥
(१) सच मुच । (२) बेहिसाब ।

१०२ जगजीवन साहिब की बानी
॥ शब्द ३८ ॥
नाम मंत्र सम नाहीं कोय ।
प्रगट पुकारि कहत हौं सोय ॥ १ ॥
अंतर डोरी राखहु लाय ।
सोवत जागत बिसरि न जाय ॥ २ ॥
बोलहु नाहिं बहुत बतलाहु ।
अंतर भजि ले याहै लाहु१ ॥ ३ ॥
जो पै कोटिउ तिरथ अन्हाय ।
मन का मैल तबहुँ नहिं जाय ॥ ४ ॥
करै तपस्या तन काँ जारी ।
नाम बिना गै सबै बिगारी ॥ ५ ॥
दूध पियहि तस मूरिहि खाय ।
भावै घर माँ खाय अघाय ॥ ६ ॥
जगजीवन बिस्वास बस राम ।
तेहि कौ सुफल सिद्ध भा काम ॥ ७ ॥
॥ शब्द ३६ ॥
राम क भजन करहु मन माहीं ।
जीवन जन्म सुफल जग माहीं ॥ १ ॥
भूलहु नाम न तब सुख पाय ।
राम मंत्र सुमिरहु मन लाय ॥ २ ॥
बिनु सुमिरन गति मुक्ति न होय ।
सब्द सत्य कहि भाखत सोय ॥ ३ ॥
सुमिरत ब्रह्मा सुमिरत सेस ।
सुमिरत गौरी और गनेस ॥ ४ ॥
(१) लाभ ।

कर्म भर्म निषेध । १०३
सुमिरत, निस्तु जोति मन जानी ।
निर्गुन निर्मल सो पहिचानी ॥ ५ ॥
जगजीवन सतगुरु कौ ध्यान ।
निसु दिन रहौं चरन लिपटान ॥ ६ ॥
॥ शब्द ४० ॥
सत मत कहत अहौं सुनाइ ।
तत्त सार बिचार कीन्ह्यौ नाम रटना लाइ ॥ १ ॥
बेद ग्रंथन छानि लीन्ह्यो भर्म नाहिं भुलाइ ।
बैठि दृढ़ ह्वै जुक्ति माहीं आस सब बिसराइ ॥ २ ॥
नाम की गति कहौं कहँ लौं सेस संभू गाइ ।
करत बरनन ब्रह्म मन महँ बेद परगट गाइ ॥ ३ ॥
तीनि त्यागै साध जन कोइ चौथ का घर पाइ ।
जगजीवन गुरु चरन गहि कै बैठु थिर ह्वै जाइ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४१ ॥
मन महँ जाइ फकीरी करना ।
रहै एकांत तंत तें लागा, राग निर्त नहिं सुनना ॥ १ ॥
कथा चारचा पढ़ै सुनै नहिं, नाहिं बहुत बक बोलना ।
ना थिर रहै जहाँ तहँ धावै, यह मन अहै हिंडोलना ॥ २ ॥
मैं तैं गर्ब गुमान बिबादहिं, सबै दूर यह करना ।
सीतल दीन रहै मरि अंतर, गहै नाम की सरना ॥ ३ ॥
जल पषान की करै आस नहिं, आहै सकल भरमना ।
जगजीवन दास निहारि निरखि कै,
गहि रहु गुरु की सरना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४२ ॥
साधो सुमिरहु नाम रसाला ।

१०४ जगजीवन साहब की बानी
बकबादी बेबादी१ निंदक । *
तेहि का मुँह करु काला ॥ १ ॥
साखी सब्द जोरि कै लीन्ह ।
जहाँ तहाँ लै झगरा कीन्ह ॥ २ ॥
भजहीं नाहिं बकहिं अधिकार ।
बाझि रहे माया के जार ॥ ३ ॥
सूकर स्वान बुद्धि तेहिं आइ२ ।
नहिं उद्धार नर्क परै जाइ ॥ ४ ॥
करहीं बहुत गरब अभिमान ।
ता तें बिसरि गयो वह ज्ञान ॥ ५ ॥
भेष अलेख अंत कछु नाहीं ।
तिन तो गर्व करैं मन माहीं ॥ ६ ॥
करि दिनताय नवै सिर नाइ ।
तबहिं सुमति कछु उपजै आइ ॥ ७ ॥
जगजीवन दास देत उपदेस ।
नाम भजहु तब मिटै अँदेस ॥ ८ ॥
॥ शब्द ४३ ॥
अन्तर सुमिरहु नामहीं बिसरावहु नाहीं ।
मूल मंत्र ईहै अहै बसि रहु तेहिं माहीं ॥ १ ॥
देखहु दृष्टि पसारि कै कोऊ थिर नाहीं ।
नीरहिं तें पैदा भये फिर खाक मिलाहीं ॥ २ ॥
कर्म फाँस सब जग पर्यो कोउ छूटत नाहीं ।
छूटे कोउ कोउ दास जन जुक्ती जिन माहीं ॥ ३ ॥
(१) बिवादी । (२) है ।

कर्म भर्म निषेध । ५८५
डोरी पोढ़ि लगाइ कै सतगुरुहिं मिलाहीं ।
जगजीवन अस निरखि कै चरनन लिपटाहीं ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४४ ॥
ए मन नामहिं सुमिरत रहौ ।
परगट भेद न काहू कहौ ॥ १ ॥
परगट कहे नाहिं भल होइ ।
सुमिरन मन तें जाइह खोइ ॥ २ ॥
परपंची निंदक तें दूरी ।
तब सुभ भजन होइ भरपूरी ॥ ३ ॥
बकवादी बीबादी त्यागू ।
सत्त सुकृत नामहिं में लागू ॥ ४ ॥
यहि तें सुख नाहीं अधिकारा ।
कहै पुरान औ ज्ञान बिचारा ॥ ५ ॥
सबहिन कहा पिया सो जिया ।
जिन केहु भक्ति माँगि कै लिया ॥ ६ ॥
सतगुरु के चरनन लिपटाना ।
साधू सोई भे निरबाना ॥ ७ ॥
जगजीवन करि प्रगट बखान ।
गुरु के चरन तजि भजहु न आन ॥ ८ ॥
॥ शब्द ४५ ॥
इत उत आसा देहु त्यागि ।
सत्त सुकृत तें रहहु लागि ॥ १ ॥
मन तुम नाम रटहु रट लाइ ।
रहु सचेत नहिं बिसरि जाइ ॥ २ ॥
१४

१०६ जगजीवन साहब की बानी
काया भीतर तीरथ कोटि।
जानि परत नहिं मन की खोटि ॥ ३ ॥
ठाढ़े बैठे पग चलाइ।
तस पौढ़े¹ चित अनत न जाइ ॥ ४ ॥
रात दिवस धुनि छूटै नाहिं।
ऐसे जपत रहहु मन माहिं ॥ ५ ॥
गगन पवन गहि करहु पयान।
तहवाँ बैठि रहहु निरबान ॥ ६ ॥
गुरु के चरन गहहु लिपटाइ।
निरखहु सूरति सीस उठाइ ॥ ७ ॥
या है ब्यापि रहे सब माहिं।
देखत न्यारा कतहूँ नाहिं ॥ ८ ॥
जगजीवन कहि मथि पुरान।
यहि तैं सत मत और न आन ॥ ९ ॥
॥ समाप्त ॥
(१) लेटे।

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