जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० जगजीवन साहब की बानी
अजबै मढ़ी बनी चौगान ।
दृढ़ आसन निरखहु निर्बान ॥ ६ ॥
अमी नीर ले नैन तें पाइ ।
कर्म धर्म अघ सब मिटि जाइ ॥ ७ ॥
जगजीवन यह मति अनुरागु ।
आदि अंत गुरु चरनन लागु ॥ ८ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
सुमिरहु मन राम नाम चित लाइ ।
बिन वहि नाम नाहिं कोउ तरिहै, कहत अहौं गोहराइ ॥ १ ॥
जज्ञ दान ब्रत तीर्थ तपस्या, जगत भ्रम सब आइ१ ।
बाहर ढूंढ़े नहिं कछु मिलिहै, रहु अंतर ठहराइ ॥ २ ॥
धावहु ना कहुँ आवहु थिर है, बाहर फिकिर बहाइ ।
कर परतीत रीत संतन की, मिलिहैं तबहीं साँइँ ॥ ३ ॥
कहे सुने नहिं भटकसि कबहूँ, जगत बदी अधिकाइ ।
सिखि पढ़ि सुनि कै बातें बहुती, भजन मनहिं बिसराइ ॥ ४ ॥
रहु जानत मन नाहिं जनावहु, रहहु अभेष छिपाइ ।
जगजीवन सतगुरु काँ निरखहु, चरन रहहु लिपटाइ ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३६ ॥
सतगुरु तुम मोहिं सिखायो ।
सो सिखि मैं सोई गायो ॥ १ ॥
अब मोहिं आपन करि लीन्हा ।
मैं सीस चरन तर दीन्हा ॥ २ ॥
मैं आदि अंत का आऊँ२ ।
अब सुमिरत आहूँ नाऊँ ॥ ३ ॥
(१) है। (२) हूँ।