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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

कर्म भर्म निषेध । १०३
सुमिरत, निस्तु जोति मन जानी ।
निर्गुन निर्मल सो पहिचानी ॥ ५ ॥
जगजीवन सतगुरु कौ ध्यान ।
निसु दिन रहौं चरन लिपटान ॥ ६ ॥
॥ शब्द ४० ॥
सत मत कहत अहौं सुनाइ ।
तत्त सार बिचार कीन्ह्यौ नाम रटना लाइ ॥ १ ॥
बेद ग्रंथन छानि लीन्ह्यो भर्म नाहिं भुलाइ ।
बैठि दृढ़ ह्वै जुक्ति माहीं आस सब बिसराइ ॥ २ ॥
नाम की गति कहौं कहँ लौं सेस संभू गाइ ।
करत बरनन ब्रह्म मन महँ बेद परगट गाइ ॥ ३ ॥
तीनि त्यागै साध जन कोइ चौथ का घर पाइ ।
जगजीवन गुरु चरन गहि कै बैठु थिर ह्वै जाइ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४१ ॥
मन महँ जाइ फकीरी करना ।
रहै एकांत तंत तें लागा, राग निर्त नहिं सुनना ॥ १ ॥
कथा चारचा पढ़ै सुनै नहिं, नाहिं बहुत बक बोलना ।
ना थिर रहै जहाँ तहँ धावै, यह मन अहै हिंडोलना ॥ २ ॥
मैं तैं गर्ब गुमान बिबादहिं, सबै दूर यह करना ।
सीतल दीन रहै मरि अंतर, गहै नाम की सरना ॥ ३ ॥
जल पषान की करै आस नहिं, आहै सकल भरमना ।
जगजीवन दास निहारि निरखि कै,
गहि रहु गुरु की सरना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४२ ॥
साधो सुमिरहु नाम रसाला ।