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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 110 में से

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पृष्ठ 102

तीन त्यागहु चलौ चौथे, सहर अजब बनाय ।
राति नहिं तहँ दिवस नाहीं, अजब दिस सुहाय ॥ ३ ॥
बैठि गुरु सत तखत पर, तहँ रहो सीस नवाय ।
जगजीवन तहँ निरखि निर्मल, वरनि नाहीं जाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३३ ॥
सच नामं तत्त निर्मल, सुमिरहु मन लाइ ।
करै जाय अनेक कोइ कछु, अवर नहिं समताइ ॥ १ ॥
दान पुन्यं जज्ञ व्रत तप, तिरथ कोटि अन्हाइ ।
पार नहिं वहि नाम बिनु, सत सब्द आपत गाइ ॥ २ ॥
पढ़ै कोउ पुरान पाठं, ज्ञान कथि कविताइ ।
कीरति परगट कहन कहिये, नाहिं यह भगताइ ॥ ३ ॥
जानि छानि जिन नाम रसना अनत ना चित जाइ ।
जगजिवन दास ते भक्त मे गुरु चरन रहे लिपटाइ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
ए मन जोगी बैठि मढ़ी जपु राम ।
करता की गति काहु न पाई ।
नौ खिरकी दस दियो बनाई ॥ १ ॥
तीरथ व्रत कहँ कतहूँ न धाव ।
नेम अचार विचार बहाव ॥ २ ॥
पचीस जोगिनी चेला पाँच ।
तिन पर रहै आपनी आँच ॥ ३ ॥
जगन्नाथ तैं अपनै जानु ।
काया कासी और न थानु ॥ ४ ॥
प्राग प्रान तिरबेंनी वास ।
और न दूजी राखहु आस ॥ ५ ॥