जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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बकबादी बेबादी१ निंदक । *
तेहि का मुँह करु काला ॥ १ ॥
साखी सब्द जोरि कै लीन्ह ।
जहाँ तहाँ लै झगरा कीन्ह ॥ २ ॥
भजहीं नाहिं बकहिं अधिकार ।
बाझि रहे माया के जार ॥ ३ ॥
सूकर स्वान बुद्धि तेहिं आइ२ ।
नहिं उद्धार नर्क परै जाइ ॥ ४ ॥
करहीं बहुत गरब अभिमान ।
ता तें बिसरि गयो वह ज्ञान ॥ ५ ॥
भेष अलेख अंत कछु नाहीं ।
तिन तो गर्व करैं मन माहीं ॥ ६ ॥
करि दिनताय नवै सिर नाइ ।
तबहिं सुमति कछु उपजै आइ ॥ ७ ॥
जगजीवन दास देत उपदेस ।
नाम भजहु तब मिटै अँदेस ॥ ८ ॥
॥ शब्द ४३ ॥
अन्तर सुमिरहु नामहीं बिसरावहु नाहीं ।
मूल मंत्र ईहै अहै बसि रहु तेहिं माहीं ॥ १ ॥
देखहु दृष्टि पसारि कै कोऊ थिर नाहीं ।
नीरहिं तें पैदा भये फिर खाक मिलाहीं ॥ २ ॥
कर्म फाँस सब जग पर्यो कोउ छूटत नाहीं ।
छूटे कोउ कोउ दास जन जुक्ती जिन माहीं ॥ ३ ॥
(१) बिवादी । (२) है ।