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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

५८ हिंदुत्व
सो भी इसलिये कि जिसमें मुसलमानोंकी विजय हो, चित्त
अत्यन्त उद्विग्न हो उठा—वीरोंका उत्साह भंग होने लगा ! शिवाजी
जयसिंहसे कहते हैं—"आप जो किले चाहते हों, मैं देनेके लिये
तैयार हूं। उनपर आपका झण्डा चढ़ाता हूं। पर मुसलमानोंको
यश मत दो। मैं हिन्दू हूं। आप राजपूत हैं; इसलिये आप भी
हिन्दू ही हैं। असलमें राज हिन्दुओंका ही है। हिन्दू धर्मरक्षकके
सामने सौ बार मैं अपना मस्तक झुकाऊंगा। पर हिन्दू धर्म
अपमानित हो, ऐसा कभी नहीं हो सकता।
जयसिंहपर इसका असर हुआ और उन्होंने जवाब दिया—
"औरंगजेब बादशाह पृथ्वीपति हैं। उनसे आप मैत्री कर लें।
शत्रुत्व करके इस कालमें निबाहना नहीं हो सकता। हम हिन्दू
जयपुरके राजा हैं। आप भी हिन्दू ही हैं। आप हिन्दू धर्म
स्थापन करते हैं, इसलिये हम आपके अनुकूल हैं।"
शिवाजीके अधीन हिंदुओंका जो उत्थान हुआ, उससे हिंदु-
स्थानके समस्त हिंदुओंमें नवजीवनका सञ्चार हो गया था।
पीड़ित जाति उन्हें अवतार और रक्षक मानती थी। सावनूरके
हिंदुओंने मुसलमानोंके अत्याचारोंसे त्रस्त होकर देखिये किस
प्रकार उन्हें पुकारा है,— "यह यूसुफ बड़ा दुष्ट है। स्त्रियों और
बच्चोंपर अत्याचार करता है। गोवध आदि निंद्य कर्म करता है।
हमलोग इसके राज्यमें बहुत ही तंग आ गये हैं। आप हिन्दूधर्मके
संस्थापक हैं, म्लेच्छोंके नाशक हैं; इसलिये आपकी शरणमें
आये। हमलोग आपके पास आये इसलिये हमारे द्वारपर पहरा

हिन्दवानेकी ढाल ५६
खड़ा है। अन्न-जलके बिना हमें मार डालना चाहते हैं। इसीलिये
रातका दिन करके (बहुत जल्द) आइये।”
इसके बाद फिर जब शिवाजीने तंजोरकी जागीर अपने भाई
व्यंकोजीको इस शर्तपर लौटा दी कि वह मुसलमान बादशाहका
सार्वभौमत्व न माने तब शिवाजीने लिखा है—“दुष्ट हिन्दु-
विद्वेषियोंको अपने राज्यमें न रहने दें।”
स्वातंत्र्ययुद्धमें संताजी और उनके भाइयोंने जो पराक्रम
किया उसका यथा-उचित सत्कार करनेके लिये राजाराम महा-
राजने जो महान् और अभिमानास्पद पदवी दी वह पदवी थी
“हिन्दुराव”। जब जिंजिके किलेको शत्रुओंने मजबूतीसे घेर
लिया था तब उस घिरावको तोड़नेके लिये मुगल सेनापतिके
अधीनस्थ मराठे सैनिकोंको फोड़ लेनेका प्रयत्न किया गया—
“गुप्तरूपसे नागोजी राजाके साथ बातचीत की गयी कि हम और
आप यदि एक हो जायं तो यह सेना नष्ट करके हिन्दू-धर्मकी रक्षा
कर सकेंगे। इसलिये आप मुसलमानोंका पक्ष त्यागकर हमारे
पक्षमें आ मिलें।” तब नागोजी राजा मुसलमानोंकी नौकरी
छोड़कर, ५ हजार फौजके साथ शहरमें गये……शिर्के
मुगलोंके ताबेदार बने (कारण संभाजीने शिर्कोंको कतल कराया
था)। तब खण्डो बल्लालने कहा, “जिस प्रकार आपके परिवार-
वालोंका कतल कराया उसी प्रकार हमारे भी तीन पुरुष हाथीके
पैरोंतले कुचलवा कर मारे गये। परन्तु हिन्दुओंके राज्यके लिये
हम उद्योग कर रहे हैं और इसमें आप भी हिस्सेदार हैं।” तब

६० ( हिन्दुत्व
शिर्के भी इस षड्यन्त्रमें सम्मिलित हुए और मराठोंसे मिले और
राजाराम शत्रु के घिरावको तोड़कर वहांसे निकले ।
शाहू महाराज और सवाई जयसिंहसे तो इस विषयमें वाद-
विवाद ही चल पड़ा था कि, “हिन्दू-धर्मकी रक्षाके लिये हमने
क्या किया और तुमने क्या किया ?” (सरदेसाई मध्यविभाग । )
यही भाव बाजीराव और नाना साहेबकी संतानोंमें था ।
इतिहासकारने लिखा है—“बहुतोंने बाजीरावके ही उद्योगका
अनुकरण और परिपोष किया दिखाई देता है.........ब्रह्मेन्द्र
स्वामी, गोविंद दीक्षित आदि देशभर भ्रमण करके अनुभव प्राप्त
किये हुए साधु पुरुषोंमें यही 'हिंदूपदपादशाही' की भावना काम
कर रही थी और वे अपने सब शिष्योंको इसी भावनासे उप-
देश दिया करते थे ।” (सरदेसाई) बाजीराव स्वयं कहते हैं—“अरे
देखते क्या हो ? चलो कूचकर आगे बढ़ो । हिन्दू-पद-पादशाही
होनेमें अब विलम्ब ही क्या है ?” (बाजीराव)
उस समय पण्डित-समाजमें ब्रह्मेन्द्र स्वामी मुख्य थे ।
परंतु जिस राज्यमें हिंदू-धर्मका उच्छेद होता है उस राज्यमें
रहना उन्होंने उचित नहीं समझा ।......'हिंदू-साम्राज्यमें देव
ब्राह्मणोंपर अत्याचार' यह कितना लज्जाजनक विषय है यह बात
उन्होंने शाहू महाराजको अच्छी तरह समझा दी । ( सरदेसाई )
मथुराबाईने ब्रह्मेंद्र स्वामीको लिखा—“शंकराजी मोहिते,
गणोजी शिंदे, खंडोजी नालकर, रामाजी खराडे, कृष्णाजी मोड
आदि बड़े बड़े सरदारोंने राज्य-रक्षण करके शामलों ( पुर्तगीजों )

हिन्दवानेकी ढाल ६१
को परास्त किया और कोंकणमें हिंदू-धर्मको रक्षा की।” इस
वीरांगना मथुराबाईने जो चिट्ठियां लिखी हैं उनमें देश-भक्तिकी
इतनी प्राण-शक्ति भरी हुई है कि इन चिट्ठियोंको वे लोग अवश्य
पढ़ें जो उस समयके हिंदू-उत्थानका वास्तविक भाव समझना
चाहते हैं।
पुर्तगीजोंने गोवामें जो धर्मोन्माद-मूलक अत्याचार किया
वह यूरोपके धर्मके नामपर होनेवाले अत्याचारका ही भारतीय
संस्करण था। एक बार तो इन्होंने खुलेआम हिन्दू-धर्म-कर्म
करनेकी बिलकुल मनाई कर दी थी। तब स्वाभिमानी अन्ताजी
रघुनाथने इस आज्ञाका उल्लंघन किया और अन्य हिन्दुओंको भी
ऐसा करनेके लिये उत्साहित करने लगा। पर वह यह अच्छी
तरह जानता था कि शक्तिहीन निष्क्रिय प्रतिरोध शक्तिहीन निष्फल
सहिष्णुता है। इसलिये इस प्रतिरोधके पीछे बाजीराव या चिम-
णाजीका खड्ग होना चाहिये। अन्ताजी रघुनाथने ही हिन्दुस्तानके
पुर्तगीज राज्यमें राज्यक्रांति करायी, बाजीरावके पक्षके समस्त
हिन्दू नेताओंकी सहानुभूति प्राप्त की और ऐसा उद्योग किया कि
गोवापर मराठे आक्रमण करें। चिमणाजी अप्पाके सेनापतित्वमें
मराठोंने पुर्तगीजोंपर चढ़ाई की और उनके अधीनस्थ समस्त हिन्दू
प्रदेशोंको स्वाधीन किया।
परन्तु इसी बीच, वसई पुर्तगीजोंके हाथसे निकलनेके पूर्व
नादिरशाहने हिन्दुस्तानपर चढ़ाई की और उसने दिल्लीपर कब्जा-
किया। बाजीरावके मराठे दूतोंने उन्हें लिखा—"तहमास्म कुली-

६२ हिन्दुत्व
खान (नादिरशाह) कोई देव नहीं है जो संसारको कतल कर
डाले। जबरदस्तसे सन्धि करेगा। इसलिये बलवान फौजके साथ
आइये। पहले जबरदस्ती और फिर सन्धि। अब सब राजपूत और
स्वामी (बाजीराव) एक हो जायं तो काम बन जाय। सबको—
बुंदेले आदिको—एकत्र करके बड़ा भाव दिखाना होगा। नादिर-
शाह वापिस नहीं जाना चाहता। वह सीधे हिन्दूराज्यपर चढ़ाई
करेगा। सवाई जयसिंहकी यह इच्छा है कि दिल्लीके तख्तपर
उदयपुरके राणा बैठाये जायं। (सब) हिन्दू राजा सवाई आदि
श्रीमान्‌की मार्ग-प्रतीक्षा कर रहे हैं। श्रीमान्‌का पृष्ठबल होते ही
जाट आदि फौज दिल्लीपर भेज सवाईजी स्वयं दिल्ली जायंगे।”
(धोंडो गोविन्दकी चिट्ठियां बाजीरावके नाम)
परन्तु वसईकी लड़ाई अभी चल रही थी, इससे बाजीराव
समयपर नहीं पहुंच सके। अपनी कठिनाइयोंको देखकर अपनी
लाचारीपर उन्हें बड़ा मानसिक क्लेश हो रहा था। उन्होंने लिखा,
“हिन्दुओंपर बड़ा भारी संकट उपस्थित है। अभीतक वसई हाथ
नहीं आयी।...ऐसी अवस्थामें सब मराठी फौजें एक होकर
चमेली पार हो जायं। उसे (नादिरको) इस ओर न आने देना-
ऐसा विचार है।” (बाजीरावका पत्र ब्रह्मेंद्रस्वामीको)
परन्तु बाजीरावके अजेय धैर्यने सब विघ्नोंको पार किया।
वे फिर लिखते हैं—"घरके झगड़ोंको अब किनारे करो। इस
समय समग्र हिन्दुस्थानका एक शत्रु उत्पन्न हुआ है। मैं तो
नर्मदा पार करके समस्त मराठा फौज चम्बलतक फैला दूंगा।
फिर देखें, नादिरशाह कैसे आगे बढ़ता है! (बाजीरावके पत्र)

हिन्दवानेकी ढाल ६३
सवाई जयसिंहको अपने हिन्दुत्वका वैसा ही ज्वलन्त अभि-
मान था जैसा हिन्दुओंके अन्य नेताओंको । इन्होंने ही मालवेके
परराज्यपीड़ित हिन्दुओंसे यह कहा था कि बाजीरावसे प्रार्थना
करो कि वे हिन्दुओंकी स्वाधीनताके युद्धका क्षेत्र मालवेतक
विस्तृत करें और इस प्रकार शिवाजीके अनुयायियोंकी संततिका
उद्देश्य—हिन्दू-पद्-पादशाहीकी स्थापनाका उद्देश्य पूरा करनेमें
और आगे बढ़ें। अपनी एक चिट्ठीमें इन सुसंस्कृत और देशभक्त
राजपूत राणाने लिखा है—
“सिधिश्री... ...नन्दलालजी प्रधान व भाईजी ठाकुर संस्थान
इन्दोर अमरगढ़सु महाराजाधिराज श्रीसवाई जयसिंगजी कृत
प्रणाम बंचजो ।......सो आपको लिखते हैं कि बादशाहने चढ़ाई
की है तो कुछ चिन्ता नहीं। श्रीपरमात्मा पार लगावेगा। बाजी-
राव पेशवासे हमने आपके निसबत कोलवचन कर लिया है।”
पीछे फिर लिखा है—“हजार शाबाश है। आप सब मालवे सर-
दार एक रहके हिन्दू धर्मका कल्याण होना और मालवेमें हिन्दू-
धर्मकी वृद्धि होना। इस बातपर विचारकर मालवेमेंसे मुसल-
मानोंको नौमेद किये। और हिन्दुधर्म कायम रखा।।” (जयसिं-
हके पत्र २६—१०—१७२१ ई०)
हिन्दुपदपादशाही और हिन्दू-स्वातंत्र्यके इस प्रचण्ड
उद्योगमें बाजीरावके पुत्र नाना साहब सबसे बड़े नेता हुए।
इनका पत्रव्यवहार स्वयं एक अध्ययनकी वस्तु है। सर्वत्र इन्हें
हिन्दुत्वका ही पक्ष करते हुए हम देखते हैं। ताराबाईको नाना

६४ हिन्दुत्व
साहब लिखते हैं—"मुगल निरे हिन्दू राज्यके शत्रु हैं। उनके
साथ आप मेलकी बातचीत करती हैं और मुझ अपने सेवकको
दोष देती हैं।"
पानीपतके युद्धमें बड़ी भारी हानि हुई पर सर्वस्व नाश नहीं
हुआ। उस युद्धसे दो आदमी बचे और उन्होंने सबको बचा
लिया। नाना फड़नवीस और महादजी शिंदे हिन्दू जातिके
दिमाग, हिन्दू जातिकी ढाल और तलवार थे। पानीपतमें भयं-
कर पराजय होनेके बाद भी ये ५० वर्षतक हिन्दू स्वातंत्र्यकी
लड़ाई लड़े और ये विजयी हुए। इन्होंने हिन्दुओंको हिन्दुस्थान-
का प्रकृत शासक बना दिया। उस समय कैसा दिव्य राष्ट्रीय
चैतन्य और हिन्दुत्वका सदभिमान जाग रहा था, यह उस
समयके नीतिकुशल राजकीय लेखकोंके पत्रव्यवहारसे मालूम
होता है। नाना और महादजीके दिल एक दूसरेसे साफ हो गये—
यह वार्ता सुनकर महाराष्ट्रमें ओरसे छोरतक आनंद छा गया
और निजामकी राजधानीसे गोविंदराव काले नाना फड़नवीसको
लिखते हैं—
“पत्र देखते ही रोमांच हो गया। बहुत संतोष हुआ। चिट्ठीमें
कहाँतक लिखूँ ? ग्रंथके ग्रंथ मनमें उदय हुए। अटक नदीके
इस ओर दक्षिण समुद्रतक हिन्दुओंका स्थान है—तुर्कस्थान नहीं।
पाँडवोंके समयसे विक्रमाजिततक अपनी यही सीमा रही। उन्होंने
इसकी रक्षा करके इसका उपभोग किया। उनके बादके राजा
नालायक निकले। यवनोंका बल बढ़ा। चकतोंने ( बाबरके वंश-

[Header] हिन्दवानेकी ढाल ६५

जोंने) हस्तिनापुरका राज्य ले लिया। अन्तको आलमगीरके
समयमें यह नौबत आयी कि यज्ञोपवीतपर साढ़े तीन रुपया
जजिया-कर बैठाया गया और गीला अन्न खरीदना पड़ा।
“उस समय स्वर्गवासी शिवाजी महाराज 'शककर्ता' और
धर्मरक्षक पैदा हुए। उन्होंने देशके किसी कदर एक कोनेमें धर्म-
रक्षण किया। बाद स्वर्गीय नाना साहब और भाऊ साहब ऐसे
प्रचण्ड प्रतापसूर्य उदय हुए कि जिनका कोई जोड़ नहीं। इस
समय श्रीमान्के पुण्यप्रतापसे और राजश्री पाटिल बुवाकी बुद्धि
और तलवारके पराक्रमसे खोया हुआ सब कुछ वापिस मिल
गया। पर यह सब कैसे हुआ ? हम लोग जीत गये, इसलिये अब
उसमें कुछ विशेष बात नहीं मालूम होती। यदि मुसलमानोंको
ऐसी विजय प्राप्त होती तो उसपर न जाने कितने इतिहासग्रन्थ
लिखे जाते। मुसलमानोंमें यह दस्तूर है कि जरासी कोई बात
हो जाय तो आकाशतक उसका कीर्ति-स्तंभ खड़ा कर दें। पर
हम हिन्दुओंमें यह चाल है कि महान्से महान् पराक्रम करनेपर
भी उसका कोई जिक्र नहीं। वास्तवमें बात तो ऐसी हुई है कि
अलभ्य वस्तुओंका लाभ हुआ है। यवन सोचते हैं और कहते हैं
कि काफिरशाही स्थापित हो गयी।
“परंतु जिन जिनने हिन्दुस्थानमें सिर उठाया, उनके सिर
पाटिल बुवाने उड़ा दिये। जो बातें कभी न हुईं वे बातें हो
गयीं। शककर्ताके समान इनका प्रबन्ध करके उपभोग करना
अभी आगे बाकी है। पुण्यबलमें क्या कसर रह जायगी और
५

६६ हिन्दुत्व
किसको कैसी नजर लगेगी, नहीं मालूम ! अबतक जो हुआ
हैं, वह केवल देशपर अधिकार, राज्यप्राप्ति यही नहीं है प्रत्युत
वेदशास्त्ररक्षण, गो-ब्राह्मण-प्रतिपालन, सार्वभौमत्व और
कीर्तियशके डंकेका बजना, ये बातें हैं। इन सबकी रक्षा करना
आपका और पाटिल बुवाका काम है। इसमें यदि बाधा पड़ी
तो शत्रु बलवान हो जायगा। संशय दूर हुआ। बहुत अच्छा
हुआ। शत्रु सिरहाने पायताने हैं। अबतक मन बेचैन था।
आपकी चिट्ठीसे मनका समाधान हुआ।” ( १७६३ ई० )
इस एक पत्रके सरल सुन्दर लेखसे हमारे इतिहासका सच्चा
भाव जितना प्रकट हो जाता है, उतना सैकड़ों बेमतलब ग्रन्थोंसे
नहीं होता। कैसे स्वाभाविक ढङ्गसे हिन्दु और हिन्दुस्थान, इन
शब्दोंकी उत्पत्तिका पता इससे चल जाता है और यह भी
मालूम हो जाता है कि अभी गत पीढ़ी तक किस प्रकार हमारे
पूर्वपुरुष इन नामोंको प्यार करते और उनसे अपनेको अभिन्न
मानते थे। यह इतना स्पष्ट उदाहरण है कि इसके बाद दूसरा
उदाहरण देनेकी आवश्यकता नहीं रहती।

( ५ )
हिन्दुत्वके तीन लक्षण
इस प्रकार वैदिक कालसे लेकर सन् १८१८ ई० में हमारे
अन्तिम हिन्दू साम्राज्यके अन्ततक हिन्दू और हिन्दुस्थान, इन
शब्दोंके इतिहासके भिन्न भिन्न प्रकरण देखनेके बाद अब हम यह
विचार कर सकते हैं कि हिन्दुत्वके लक्षण क्या हैं। सबसे
पहली बात जो मालूम होती है, वह यह है कि हमारे अनेक देश-
वासियोंकी जो एक धारणा हो गयी है कि "हिन्दु" और "हिन्दु-
स्थान" की उत्पत्ति मुसलमानोंके द्वेषभावसे हुई है—वह बिलकुल
ही गलत है। अबतक इस विषयमें पिछले परिच्छेदोंमें जो कुछ
कहा गया है उससे यह स्पष्ट है कि यह धारणा केवल मूर्खता-
पूर्ण है। जिस समय महम्मदका जन्म भी नहीं हुआ था, जिस
समय अरबोंकी कोई जाति भी नहीं पैदा हुई थी, उस समय यह
प्राचीन राष्ट्र सिंधु या हिंदु नामसे विख्यात था। हम लोग इसी
नामसे इसे पुकारते थे और बाहरवाले भी इसका यही नाम जानते
थे। अरबोंने यह नाम नहीं ढूंढ़ निकाला। प्रत्युत उन्होंने ईरानि-
यों, यहूदियों और अन्य जातियोंसे यह नाम जाना। परन्तु इन
ऐतिहासिक बातोंको छोड़कर भी यदि हम विचार करें तो क्या
यह समझना कुछ कठिन है कि यदि यह नाम वास्तवमें

६८ हिन्दुत्व
तिरस्कारसूचक होता तो क्या हमारी जातिके श्रेष्ठ और वीर
पुरुष इसे कदापि ग्रहण करते ? हमारी जातिके लोगोंको निश्चय
ही अरबी, फारसी अपरिचित नहीं थी ! मुसलमान हमें काफिर
भी कहा करते थे, पर यह नाम क्या कभी हिन्दुओंने ग्रहण
किया ? यदि नहीं तो हिन्दुस्थान और हिन्दू, इन शब्दोंके
बारेमें ही यह राष्ट्रीय अपमान उन्होंने क्यों स्वीकार किया ?
बहुतसे लोग यह कहा करते हैं कि “हिन्दु” शब्द संस्कृतमें नहीं
है । ठीक है, पर “हिन्दु” ही क्यों, बहुतसे शब्द हैं जो
संस्कृतमें नहीं हैं पर नित्य जिनका प्रयोग हम करते हैं । जैसे
बनारस, मराठा, सिख, गुजरात, पटना इत्यादि । पर क्या ये शब्द
यहां बाहरसे आये हैं ? 'बनारस' शब्द संस्कृतमें नहीं है, फिर
भी वह हमारा है और संस्कृतके “वाराणसी” शब्दका केवल
प्राकृत रूप है । सच तो यह है कि किसी प्राकृत शब्दको हम शुद्ध
संस्कृतमें ढूंढने लगें यही मूर्खता है । फिर भी, यह प्राकृत शब्द
होनेपर भी, किसी किसी संस्कृत ग्रन्थमें यह शब्द मिलता है ।
इसे इस शब्दके महत्त्वका ही प्रबल प्रमाण समझना चाहिये ।
उदाहरणार्थ, मेरुतंत्रमें यह शब्द आता है। महाराष्ट्रके सुप्रसिद्ध
कोषकार आपटे और बंगालके तारानाथ तर्कवाचस्पतिने अपने
कोषोंमें इसका हवाला दिया है। और “शिव शिव न हिन्दुर्नय-
वनः” यह वचन तो इतना प्रसिद्ध है कि उसका उल्लेख करनेकी
भी आवश्यकता नहीं ।
यह हो सकता है कि आधुनिक मुसलमानी फारसी भाषामें

हिन्दुत्वके तीन लक्षण [४६]

इस शब्दमें कोई तिरस्कारसूचक भाव आ गया हो, पर इससे
यह थोड़े ही होता है कि हिन्दू शब्दका मूल अर्थ ही ऐसा हो
और वह "काला आदमी" का पर्यायवाची हो ? हिन्दी और हिन्दू
शब्द फारसीमें हैं, पर उनका अर्थ "काला" नहीं है और यह भी
हम जानते हैं कि ये शब्द हिन्दू शब्दके साथ ही सिन्धु या सिन्ध
इसी संस्कृत शब्दसे निकले हुए हैं। यदि यह बात हो कि हिन्दू
शब्दका अर्थ "काला" होनेसे हम लोग "हिन्दु" कहलाये तो
फिर हिन्द और हिन्दी शब्द भी हममें क्यों लगाये गये जब कि
उनका अर्थ तो "काला आदमी" नहीं है ? बात यह है कि यह
शब्द आधुनिक फारसीसे निकला हुआ नहीं बल्कि ईरानकी
प्राचीन जेंद भाषाके समयका है और उस समय "हप्तहिन्दु" का
मतलब "सप्तसिन्धु" से ही था। हिन्दुओंका रंग "काला"
देखकर उन्हें हिन्दू कहा गया हो—यह सम्भव ही नहीं है, क्योंकि
बिलकुल सीधीसादी बात है कि अवेस्ता-कालके सप्तसिन्धु
अर्थात् हिन्दू पारसिकों (ईरानियों) के समान ही शुभ्र वर्णवाले
थे और ये दोनों पास पास ही और कभी कभी एक साथ ही
रहते थे। कभी कभी (याने ईसवी सन्‌के आरम्भमें पारथियन
लोग हमारे सीमान्तप्रदेशोंको "श्वेतभारत" कहकर संबोधन
करते थे। इस प्रकार हिन्दू शब्दका अर्थ मूलतः "काला आदमी"
कभी रहा हो, यह सम्भव नहीं है ।
इस प्रकार हिन्दू और हिन्दुस्थान ये गौरवयुक्त और देशाभि-
मानसूचक शब्द तबसे हमारे देश और राष्ट्रके नाम हैं, जब

द्वितीय खण्ड: धर्म, संस्कृति एवं पितृभूमि-पुण्यभूमि का लक्षण

मुसलमानां या मुसलमान ईरानियोंका पता भी नहीं था और
इसलिये जहां हिन्दू शब्दका इतना गौरव है और वह इतना हमारे
प्रेमका अधिकारी है, वहां इस बातका महत्व ही क्या है कि कोई
ऐरेगैरे दीवाने इस नामको अपमानसूचक मानते हैं या क्या
करते हैं । एक समय था जब खास इङ्गलैण्डमें "इङ्गलैण्ड" नाम
उसके नार्मन विजेताओंकी नजरोंमें इतना गिर गया था कि
वह एक दूसरेको गाली देनेके काम आता था । "क्या मैं अंगरेज
हूँ" यह कहना अपनी घोर भर्त्सना करना था "तुम अंगरेज हो"
यह किसी नार्मनको कहना अक्षम्य अपराध समझा जाता था ।
पर क्या इससे अंगरेजोंने अपने देश और राष्ट्रका नाम बदल दिया
और उसे "इङ्गलैण्ड"के बदले "नारमंडी' कहना शुरू किया ? और
क्या "इङ्गलैण्ड" या "अङ्गरेज" नाम त्याग कर देनेसे वे बड़े हो
जाते ? कदापि नहीं, प्रत्युत इसके विपरीत उन्होंने अपने पूर्वजोंके
रक्त और नामका उत्तराधिकार नहीं छोड़ा, इसीसे आज हम देखते
हैं कि जहां "नार्मन" शब्द और नार्मन देशका कहीं पता भी
नहीं है, वहां अंगरेज जाति और अंगरेजी भाषाने संसारमें
अपना सबसे महान् साम्राज्य स्थापित कर लिया है। अंगरेजी
साम्राज्यका वैभव निश्चय ही महान् है, पर हिन्दू साम्राज्यके
वैभवके सामने वह क्या चीज है !
लड़ाई-झगड़ोंके समय राष्ट्रोंका मन स्थिर नहीं रहता और
ऐसे समय यदि फारसवाले तथा अन्य लोग "हिन्दू" शब्दका
अर्थ "चोर" या "काला आदमी" ही मान बैठें, तो उन्हें यह भी

हिन्दुत्वके तीन लक्षण ७१
जानना चाहिये कि हिन्दू भी "मुसलमान" शब्द सदा भले आदमी-
का ही वाचक नहीं समझते थे । किसीको "मुसलमान" या
"मुसल्ला" कह देना उसे पशु कहनेसे भी बढ़कर गाली देना
था । जिस समय दो राष्ट्रोंके बीच जीवन-मृत्युका संग्राम
छिड़ता है उस समय इस तरह एक दूसरेको कोसना, गाली
देना चाहे अनिवार्य हो, पर ये बातें तब भूल जानी चाहिये जब
मनुष्य होशमें आकर भले आदमी कहलाना चाहते हैं। यह बात
भी भूलनेकी नहीं है कि प्राचीन यहूदी लोग "हिन्दू" शब्दसे बल
और तेजका अर्थ ग्रहण करते थे अर्थात् हमारे देश और राष्ट्रमें
ये गुण थे । "सोहाब मो अलक" नामक एक अरबी महाकाव्यमें
यह लिखा है कि, "घरवालोंके अत्याचार तो एक हिन्दूकी तल-
वारके प्रहारसे भी अधिक प्रखर और भीषण होते हैं" ; और
"हिन्दूकी तरह जवाब देना" यह कहावत तो ईरानियोंमें प्रसिद्ध
ही है, जिसका मतलब "हिन्दुस्थानी तलवारसे और दिलेरीके
साथ गहरा जखम करना" है । बाबीलान देशके लोग सबसे
अच्छे कपड़ेको "सिन्धु" कहा करते थे; क्योंकि ऐसा कपड़ा
प्रायः सप्तसिन्धुसे ही उन्हें मिलता था और इससे भी यह जाहिर
है कि ये लोग भी हमारे इस प्राचीन सिन्धु नामसे परिचित थे ;
और बाबिलानकी भाषामें इस शब्दका जो राष्ट्रीय अर्थ है उसके
सिवाय और कोई दूसरा अर्थ भी है, यह हमने अबतक नहीं
सुना ।
अपने पड़ोसके अत्यन्त प्राचीन और अत्यंत सुसंस्कृत चीन

७६ हिन्दुत्व
देशके सुप्रसिद्ध यात्री युआन चंगने “हिन्दू” नामका जो अर्थ
किया है, उसे जानकर कोई भी हिन्दू आत्मगौरव बोध किये बिना
न रहेगा। इसने “हिन्दू” शब्दको “इन्दु” शब्दसे मिलाया है
और कहा है कि संसार इस जातिको जो इन्दु (चन्द्रमा) कहता
है, वह ठीक ही है; क्योंकि यह जाति और इसकी संस्कृति,
चंद्रमाके समान, दुःख-संतप्त मनुष्यके मनको सदा शांति, शीतलता
और आनन्द देनेवाली है। क्या इन बातोंसे यह स्पष्ट नहीं
होता कि अपने नामका आदर उत्पन्न करनेका मार्ग उस नामको
छोड़ देना या उससे इन्कार करना नहीं बल्कि अपने शस्त्रके
तेजसे, अपने उद्देश्यकी पवित्रतासे तथा अपनी उदात्त संस्कृतिसे
संसारको विवश करना है कि वह उस नामके सामने सम्मानके
साथ नतमस्तक हो। अब हम लोगोंमेंसे कुछ लोग अपना
हौसला पूरा करनेके लिये मर्डु मशमारीकी रिपोर्टोंमें अपने आपको
“हिन्दू” न लिखाकर भले ही “आर्य” लिखायें; पर इससे होगा
क्या सिवा इसके कि “आर्य” शब्दको भी ऊपरसे नीचे खींच लावें
और शब्दकोषमें दासार्थवाची शब्दोंमें एक शब्द और बढ़ा दें ?
—जबतक हमारा राष्ट्र यथार्थमें उस प्राचीन आर्यगौरव और
आर्यतेजको नहीं प्राप्त कर लेता।
परंतु यदि हम हिन्दु या हिन्दुत्व, इन नामोंको त्याग देनेके
बेमतलब प्रस्तावपर गंभीरताके साथ कुछ भी विचार न करें
और यह मूखतापूर्ण बात भी मान लें कि विदेशियोंने ही
द्वेषबुद्धिसे हमारा यह नाम रखा तौभी क्या यह संभव है कि हम

हिन्दुत्वके तीन लक्षण ७३
इस नामको छोड़ सकें और कोई नया राष्ट्रीय नाम निर्माण करें ?
इस समय तो यही बात है कि "हिन्दू" शब्द हमारी जातिका
मानो झंडा ही बन बैठा है और यही एक ऐसी बात है जो कन्या-
कुमारीसे काश्मीरतक और अटकसे लेकर कटकतक हमारी
जातीय एकताको सबसे अधिक बल प्रदान करती और उसे दृढ़
करती है। क्या आप यह संभव समझते हैं कि इस नामको हम
इतनी आसानीसे बदल, सकते हैं जैसे कोई अपने सिरकी टोपी
बदल दे ? एक बारकी घटना है कि एक सज्जन मर्दुमशुमारीकी
रिपोर्टमें अपने आपको हिन्दू न लिखा कर "आर्य" लिखाना
चाहते थे; क्योंकि उनके सिरपर भ्रमका यह भूत सवार हुआ था
कि "हिन्दू" नाम घृणामूलक है और यह मुसलमानोंने रखा है
और इसका अर्थ चोर और काला आदमी है। समय न होनेसे
मैं उनके साथ बहुत बहस तो नहीं कर सका, पर मैंने उनसे
एक ही प्रश्न किया। पूछा, "आपका नाम क्या है ?" जवाब मिला
"तख्त सिंह"। तब मैंने कहा, भले आदमी ! पहले अपने नामको
तो देखो। हिन्दू शब्द तो ज्यादासे ज्यादा विवादग्रस्त शब्द
है, पर आपका नाम तो बिना किसी सन्देहके संकरी सृष्टि है और
इसलिये पहले यह नाम बदलकर कोई शुद्ध प्राचीन आर्य नाम
रखिये—जैसे मौद्गालायन या सिंहासनसिंह । तब बात छोड़कर
उन्होंने यह बतलाना आरंभ किया कि नाम बदलनेसे अर्थोपार्ज-
नका सारा कारबार ही उलट-पलट जायगा और फिर जब दुनिया
तख्तसिंह ही कहती रही तो हमारे सिंहासनसिंह घरमें ही बने

७४ , हिन्दुत्व
रहनेसे लाभ ही क्या ! तब मैंने कहा, “जब एक व्यक्तिको नाम
बदलना इतना कठिन है, यही नहीं बल्कि हानिकारक है, तब भला
एक समग्र जातिका नाम—वह नाम जो विदेशी नहीं बल्कि उतना
ही स्वदेशी है जितने कि हमारे वेद हैं—बदलना कितना कठिन
और कितना अधिक हानिकारक होगा, जरा सोचो ।” कोई ऐसा
नाम, जिसकी जड़ पातालमें पहुँची हो, बदलनेका प्रयत्न करना
कितना व्यर्थ है, इसका इस वैयक्तिक वृत्तान्तसे भी अधिक अच्छा
दृष्टान्त हमें पंजाबके हमारे खालसा पन्थमें मिलता है । यह वह
पन्थ है जिसे हिन्दु जातिका सिरमौर और सूरमा कहना चाहिये,
जिसे हमारे श्रेष्ठ गुरुने चुनकर तैयार किया और विजयानंदसे
गर्जना की कि, “नील वस्त्रके कपड़े फाडे तुरक पाणी अमल
गया ।” और जो पंथ संघटित करनेका कारण भी यही था कि,
“धर्म चलावन संत उबारण, दुष्ट दैत्यके मूल उपाटण, यहि काज
धरामैं जननम् । समझ लेहु साधुसम मननम् ॥ ( परित्राणाय
साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि
युगे युगे ॥) । योद्धाओंके उस दलका नाम “खालसा” रखा
गया । जिन महात्मा नानकका आज नित्य “वाह गुरुको फतेह,
वाह गुरु खालसा” कहकर साभिनन्दन वन्दन किया जाता है,
वे गुरु नानक दुःखसे कहा करते थे कि, “क्षत्रियां हि धर्म
छोडिया म्लेच्छ भाषा गहि । सृष्टि सब इक वर्ण हुई, धर्मकी
गति रही !” “दरबार”, “दीवान”, “बहादुर” इत्यादि शब्द
चोरोंकी तरह हमारे हरिमन्दिरके अन्तर्भागतक जा पहुंचे हैं ।

हिन्दुत्वके तीन लक्षण ७५
पुराने जखमोंके ये चिह्न हैं। जखम भरकर अच्छे हो गये पर
उनके ये चिह्न बाकी हैं और ऐसा मालूम होता है कि ये हमारे
शरीरके साथ ही रहेंगे। इन चिह्नोंको नखोंसे खरोचकर मिटानेकी
चेष्टा करनेमें जबतक हानिके सिवाय कोई लाभ नहीं, तबतक
जो कुछ कर सकते हैं वह यही है कि इनको सह लें; क्योंकि ये
चिह्न भी तो आखिर उसी रक्तरंजित रणभूमिमें लगे हुए जखमोंके
हैं जिसने हमींको जयमाल पहनायी थी।
फिर भी यदि कोई ऐसे शब्द हैं जो चाहे हमारे देव-
मन्दिरोंके नामोंसे भी कितने ही सम्बद्ध क्यों न हों पर जिन्हें
त्याग देने या बदल देनेकी जरूरत है तो वे शब्द ये ही हैं; क्योंकि
ये स्पष्ट ही विदेशी शब्द हैं और विदेशी प्रभुत्वके ही अवशेष
स्वरूप हैं। जो लोग इन नामोंको न केवल सह लेते बल्कि प्यार
करते हैं वे हिन्दु या हिन्दुस्थान नामको छोड़ देनेकी पुकार
मचायें, क्या यह कुछ अप्रामाणिकसी बात नहीं है?—वह नाम
जो हमारी जाति और देशका, हमारे पूर्व पुरुषों द्वारा रखा हुआ
नाम है, जो संसारके सबसे प्राचीन और सबसे पूज्य ग्रन्थ वेदोंमें
आया है—वह नाम जिसे सिन्धु नदीके दोनों ओर बसनेवाले
हमारे करोड़ों देश-भाई अधिक नहीं तो कमसे कम विगत ४०
शताब्दियोंसे धारण किये हुए हैं, जिस नाममें काश्मीरसे कन्या-
कुमारीतक और अटकसे कटकतक हमारे समग्र देशका अन्तर्भाव
होता है, जो नाम एक शब्दमें हमारी जाति और देशकी भौगो-
लिक स्थितिको प्रकट कर देता है, जो नाम अपनी विशिष्टता

७६ हिन्दुत्व
और श्रेष्ठताका दर्शक — "राष्ट्रमार्यस्यचोत्तमम्" का परिचायक
माना गया, उस नामको कोई कैसे छोड़ सकता है ? जिस नामके
लिये हमारे शत्रु हमारा तिरस्कार करते थे और जिसके लिये
हमारे शूरवीर योद्धा शालिवाहनसे शिवाजीतक महान्‌से महान्
पराक्रमी पुरुष शताब्दियोंतक लड़ते रहे, वह नाम यही है—
हिन्दु। यही हिन्दु नाम पद्मिनी और चित्तौड़ की अस्थियोंपर खुदा
था। यही हिन्दु नाम तुलसीदास, तुकाराम, रामकृष्ण और
रामदासने अपनाया था। हिन्दुपदपादशाहीका ध्यान ही तो
रामदासका ध्यान था, शिवाजीका यही व्रत था, बाजीराव और
बन्दा बहादुर, छत्रसाल और नानासाहेब, प्रताप और प्रतापा-
दित्यकी महत्त्वाकांक्षाओंका यही तो ध्रुव तारा था। यही नाम
उस झंडेपर अंकित था जिसकी रक्षामें एक दिनमें एक लाख
हिन्दू वीर, शत्रुओंको मारते हुए, पानीपतके मैदानमें खेत रहे और
उनके अग्र भागमें वीराग्रणी भाऊ भी हाथमें खड्ग लिये असि-
धारा तीर्थमें निमज्जित हुआ ! और इस बलिदानके पश्चात् भी,
इस बलिदानके फलस्वरूप नाना और महादजी इसी हिन्दूपद-
पादशाहीके लिये आंधी और तूफानकी कोई परवा न कर, चट्टानों
और आपदाओंको टालते हुए राष्ट्र-नौकाको उसके किनारेके
समीपतक खे ले गये थे। और आज भी यही "हिन्दू" और "हिंदु-
स्थान" नाम नेपालके राजसिंहासनसे राहके भिखारीकी झोली
तक करोड़ों मनुष्योंपर अपना प्रभुत्व चला रहा है। इस नामका
तिरस्कार करना अपनी जातिके हृदयको ही काटकर फेंक देना

हिन्दुत्वके तीन लक्षण ७७
है। ऐसा करनेके पूर्व ही तुम मर जाओगे। ऐसा करना केवल
प्राणान्तक ही नहीं बल्कि असाध्य साधन है। “हिन्दु” और
“हिन्दुस्थान” इन शब्दोंको उनके स्थानोंसे अलग करनेका ख्याल
हिमालयको ही उसके स्थानसे हटानेके समान है। भयानक और
कल्पनातीत उत्पात और उलटफेर करनेवाला कोई भीषण
भूकंप ही यह काम कर सकता है।
हिन्दु और हिन्दुस्थान इन नामोंपर जो यह मिथ्या आक्षेप
है कि ये नाम विदेशियोंके रखे हुए हैं, यदि यही एक बात हो
तो इसका समाधान निर्विवाद ऐतिहासिक प्रमाणोंसे ही अना-
यास हो सकता है। पर बात यह है कि इस आक्षेपके साथ कुछ
लोगोंके दिलमें एक गुप्त भय भी है। वे यह समझते हैं कि
यदि यह नाम हम अपनाते हैं तो यह समझा जायगा कि हम
उन सब बातोंको माननेवाले हैं जो “हिन्दू धर्म” के नामपर
प्रसिद्ध हैं। कोई इस भयको स्पष्ट रूपसे प्रकट करे या न करे,
पर इस भयसे बहुतसे लोग यह बात माननेको तैयार नहीं होते
कि यह नाम विदेशियोंका रखा हुआ नहीं है। यह भय बिल-
कुल निराधार है, यह बात भी नहीं। परन्तु जिन्हें इस प्रकारकी
आशंका होती है उन्हें वैसा स्पष्ट कहकर बतलाना चाहिये कि
अमुक कारणसे हम हिन्दू कहलानेको तैयार नहीं हैं—मिथ्या और
निराधार आक्षेपके बहाने वस्तुस्थितिको छिपाना कदापि उचित
नहीं। “हिन्दुत्व” और “हिन्दू धर्मसंप्रदाय (हिन्दुइज्म)” ये
दो शब्द आपाततः एक दूसरेके समान हैं और इससे अनेकोंका