घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
घट रामायण / १०१
उसके चरणों को पहचान कर मैं आगे बीसवें शून्य में पहुँची, और आगे इक्कीसवें शून्य में आनन्द
धाम सत्य पुरुष था॥ ११॥
हे सखी! उसके बाद सामने के प्रिय नगर को पारकर मैं 'सत्यलोक' पहुँची और अगमपुर पर दौड़े
कर चढ़ी तथा वहाँ पति को पाकर उस तक पहुँची॥ १२॥
सत्यपुरुष को पाने की, (इस प्रकार मेरी) मेरी प्रतिज्ञा पूरी हुई और पति की सेज प्राप्त की। उस
भवन के मध्य मैंने जो कुछ पाया, उसे वैसा ही बता दिया॥ १३॥
बाइसवाँ शून्य आगे है-उसे समझकर कोई प्राप्त करेंगे। जिन-जिन सन्तों ने यहाँ पर्वत शिखरों पर
विश्राम किया है, वही उसे बताएँगे॥ १४॥
तुलसी साहब कहते हैं कि यह शरीर रूई की भाँति नश्वर है, मूलात्मा तो चित्त में निवास करती है।
जिन्होंने इसके रहस्य को नहीं समझा है, वे वेद के भवजाल में फँसे है॥ १५॥
॥ सोरठा ॥
स्रुति पद परम निवास, चढ़ि अकास पति पै गई।
पिय पद सुरतिबिलास, सेज बास जल जस कही॥ १॥
पिय मोरे दीनदयाल, काटि जाल न्यारी करी।
अमर बुटी अज माल, सो पियाइ मो कौ दई॥ २॥
पिय पद पूर पियास, अमी पियाइ अमर करी।
सूरति अगम निवास, महल बास अपने करी॥ ३॥
अर्थ-वेद के परम स्थलस्वरूप उस परम निवास में स्थित शून्याकाश पर चढ़कर वह पति के पास
गई। प्रिय के उस निवास स्थल (पद) के सुरति विलास में जैसे-जैसे वर्णित है, तदनुसार उसने (प्रियतम
की) सेज पर रही॥ १॥
मेरा पति दीन दयाल है और उसने मेरी माया की जाल को काटकर मुझे उससे अलग किया और
अजपाजाप अभी माला की अमर बूटी मुझे पिला दी॥ २॥
प्रिय पद के साथ ही मेरी प्यास पूरी हुई और उसने अमृत पिलाकर अमर कर दिया। मेरा निवास
सुरति समाधि के अगम महल में हो गया और अपने साथ उस महल में रख लिया॥ ३॥
॥ दोहा ॥
पिय प्रभुता निज धाम, काम टहल मो कौ कही।
रही भवन के माहिं, अमल बास मो पै नहीं॥
अर्थ-उसकी प्रभुता उसके उस भवन में दिखी और उसने अपने भवन में टहल (भृत्य कर्म) के
लिए कहा। मैं इस तरह उसके भवन में रही-मुझ पर माया के नशे की गंध अब लेश मात्र भी नहीं रही॥
॥ सोरठा ॥
पृथ्वी पवन अकास, नीर नास सब होइँगे।
अगिन सूर अरु चंद, बँद बास पुनि पुनि नसै॥
अर्थ-पृथ्वी, आकाश, जल, वायु इन सबका विनाश होगा, अग्नि, सूर्य, चन्द्र ये सभी माया की
गंध के वश (बंद) में हैं, सब का बार-बार विनाश होगा॥
१०२ / घट रामायण
॥ चौपाई ॥
पिय सँग अजर अमर भया बासा। आदि अंत हमरा नहिं नासा।
अर्थ-मेरा निवास प्रिय (ब्रह्म) के साथ अजर-अमर हो उठा और अब हमारा विनाश नहीं होगा॥
॥ मंगल ॥
अमर बूटी मोरे यार, प्यार पिया ने दई।
काटी जम की जाल, काल डर ना रही॥ १॥
मैं पिय मोर अनूप, रूप पिय में गई।
दरसै एकै नूर, सूर स्रुति से भई॥ २॥
जुगजुग अमर अहवात, साथ पिय के सखी।
जावँ न आवों हाथ, साथ पिय के पकी॥ ३॥
नौतम निरखि निहारि, सार दसवें वही।
आगे अजब अजूब, खूब खुलि कै कही॥ ४॥
पिय मोरे दीन-दयाल, चाल चीन्हा सही।
सुख सागर सुख चौज, मौज मुख से दई॥ ५॥
अंड खंड ब्रह्मांड, कोई करता नहीं।
हमार सकल पसार, सार हम से भई॥ ६॥
धरती गगन अकास, नास सब होइँगे।
अगिनि पवन जल नास, हमीं हम रहेंगे॥ ७॥
ब्रह्मा बेद नसाय, बिस्नु सिव ना बचैं।
बचै नहीं बैराट, कहनि कहौं को पचै॥ ८॥
कोई न पावै अंत, संत हम को लखै।
तुलसी बिधि बेअंत, अंत कहि को सकै॥ ९॥
अर्थ-मेरे यार, मेरे प्रिय न प्यार की मुझे अमर बूटी दी है, उन्होंने यम के जाल को काट डाला
और अब काल का भी डर नहीं है॥ १॥
मेरा प्रिय और उसके साथ मैं भी अनुपम हो उठी औ पति के रूप में ही खो गई। वेद के प्रकाश में
हम दोनों का प्रकाश एकमेव हो उठा और एक तरह का दिखाई पड़ता है॥ २॥
हे सखी! मेरा सौभाग्य युग-युग तक प्रिय के साथ ही अमर हो उठा। मैं, अब गमनागमन (जाँव व
आँखों) के बन्धन से मुक्त हो उठी-प्रिय के साथ ही तन्मय होकर एक जैसी (परिपक्व) हो उठी
हूँ॥ ३॥
नवें तत्त्व (नवम द्वार) पूरी तरह से देख करके दसवें द्वार के सार तत्त्व को बताया है-उसके आगे
तो खूब आश्चर्यजनक है-मैंने खुल करके उसका अत्यधिक वर्णन किया है॥ ४॥
मेरे प्यारे दीन दयाल ब्रह्म ने मेरी गति (चाल) को भलीभाँति समझकर मुझे आनन्दमयी वस्तुओं से
मुक्त आनन्द स्वाद मेरे मुख को दिया है॥ ५॥
घट रामायण / १०३
हमारा सम्पूर्ण ज्ञान विस्तार हमसे ही हुआ है, संसार में सब कहने के लिए है-पिंड, उसके तत्त्व
एवं ब्रह्मांडादि किसी के विस्तार में कोई मदद नहीं करते ॥ ६ ॥
पृथ्वी, आकाश सभी का नाश होगा-अग्नि, वायु तथा जल भी नष्ट होने वाले हैं-केवल इस सृष्टि
में हम ही हम बचे रहेंगे ॥ ७ ॥
ब्रह्मा, वेद, विष्णु नष्ट हो जाएँगे तथा विष्णु, शिव भी नहीं बच पाएँगे-यह सम्पूर्ण विराट ( पृथ्वी,
जल, वायु, अग्नि-शून्यादि से सर्वत्र ब्रह्मांड रूप में व्याप्त) भी नहीं बचेगा और मैं किसी (किन सब की
बचै) बात कहूँ ॥ ८ ॥
हमारा अन्त कोई नहीं देख पाएगा और कोई सन्त ही हमें देखेगा। तुलसी साहब कहते हैं कि हमारी
आत्मिक सत्ता अन्तहीन (बेअंत) है-उसके अन्त (समाप्ति) के विषय में कौन कह सकता है ॥ ९॥
॥ दोहा ॥
बाइस सुनु बर्त्तमान, सुरति छान भिनि भिनि कही।
जानै संत सुजान, जिन चढ़ि देखा भेद सब ॥
अर्थ-सुनो, इसके बाईस रूप हैं-और इस सुरति के स्थानों को भिन्न-भिन्न रूपों में समझाया गया
है। इसके विषय में वही चतुर सन्तजन जानते हैं, जिन्होंने सुरति समाधि के शिखर पर चढ़कर इसके
भेदों को देखा है॥
॥ चौपाई ॥
तुलसी संत चरन बलिहारी। चढ़े अगम जिन सुरति सम्हारी॥
लख लख जस जस भेद सुनाई। साखी सब्द ग्रंथ में गाई॥
महुँ पुनि चरन लागि लख बोला। जस जस कृपा संत कर खोला॥
संत चरन सूरति भइ चेरी। मति उन सब बिधि भाँति निबेरी॥
मैं उनकी चरनन बलिहारी। मोहि सों अजान जान कियो लारी॥
सुन्न सुन्न बाइस कर लेखा। खुलि हिये नैन सुरति से देखा॥
और सुन्न का भाखौं लेखा। कोड़ निज संत सुरति से देखा॥
तुलसी बूझी मोर अबूझी। जो कोड़ संत सैल कर सूझी॥
मैं अपनी गति कस कस भाखी। कहैं संत जिन देखी आँखी॥
मैं किंकर उन पर निज दासा। जिन जिन देखा अगम तमासा॥
सोइ सोइ देखि देखि कै भाखी। नैन से देखि पेखि उर आँखी॥
छै सुन्न का पुनि भेद बताऊँ। न्यारा भिन्न भिन्न दरसाऊँ॥
कौन सुन्न में कौन निवासा। ता कर भेद कहौं परकासा॥
प्रथम सुन्न में है निःनामी। ता की गति मति संतन जानी॥
दूजी सुन्न का भाखौं लेखा। जहँवाँ सत्तनाम को देखा॥
तीजी सुन्न सब्द एक होई। सुरति सैल कोड़ संत बिलोई॥
चौथी सुन्न कहौं समझाई। पारब्रह्म तहँ रह्यो समाई॥
संत ताहि परमातम भाखी। सो पुनि देखा दिये की आँखी॥
१०४ / घट रामायण
पंचम सुन का भेद बताउँ। पूरन ब्रह्म जीव तेहि नाऊँ॥
ता को आतम बेद बखाना। जीव नाम आतम कर जाना॥
षटवीं सुनि मन तन के माईं। इन्द्री संग तास लिपटाई॥
परमहंस तेहि ब्रह्म बतावैं। नेतहि नेत बेद गोहरावै॥
सुन तेहि मन कौ ब्रह्म बखाना। ता को नाम निरंजन जाना॥
येही निरंजन जोति कहाई। ब्रह्मा बिस्नू सिव सुत है ताही॥
तिन पुनि रचा पिंड ब्रह्मांडा। सातौ दीप और नौखंडा॥
जोति निरंजन इनको जानी। ता को संतन काल बखानी॥
यह जम काल जाल जग डारा। ज्यों धीमर मछरी गहि मारा॥
दस औतार निरंजन काला। बाँधे जीव कर्म जग जाला॥
तीरथ बरत नेम अरु धरमा। कर्म भाव कहियत है रामा॥
ता की जगत जपै मन लाई। बार बार भरमै भव माहीं॥
जग सब अंद फंद नहिं बूझै। अंधा भया हिये नहिं सूझै॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैं उन सन्त चरणों की बलिहारी जाता हूँ-जो सुरति समाधि को
सम्हाल कर अगम पर्वत पर चढ़े हैं। उन्होंने उसे देख-देख कर जैसे-जैसे भेदों को बताया है, साखी एवं
'सबद' द्वारा इस ग्रंथ में गाया है॥ (यहाँ साखी का अर्थ सन्तों का साक्ष्य सब शब्द का अर्थ सन्तों का
वर्णन है, मेरा अपना कुछ नहीं है॥)
मैं भी उनके चरणों में लगकर और देखकर वर्णन किया है जैसे सन्तों की कृपा होती गई, रहस्य
खुलता गया। मेरी मति सन्त चरणों की दासी बन गई। मति ने ही उसी भाँति लिखकर शान्ति प्राप्त की॥
मैं उन सन्तों के चरणों की बलिहारी जाता हूँ-जिन्होंने मुझ जैसे अज्ञानी को ज्ञानी बनाकर प्रभु के
प्रति संसक्त बनाया। बाईस रूपों के शून्य का वर्णन करके जिन्होंने खुले नेत्रों से सुरति समाधि में देखा॥
और मैं शून्य के विषय में क्या कहूँ, किसी-किसी सन्त ने उसे अपनी सुरति समाधि में देखा है।
तुलसी साहब कहते हैं-जो मुझे कभी अबूझ थी, सन्तों की कृपा से उसे समझा। यह सन्तों की ही कृपा
थी कि उन्हें भी कभी दुर्नाम शिखर पर वह प्रतीत हुई होगी॥
सन्तों ने जिसे आँखों से देखकर बताया है, मैं अपनी उस गति का कैसे-कैसे वर्णन करूँ? मैं उन
सन्तों का सेवक तथा दास हूँ जिन्होंने अपनी प्रज्ञा से उस अगम तमाशे को देखा है॥
किस शून्य में किसका निवास है, उनके मदों को मैंने प्रगट रूप से कहा है। प्रथम शून्य में निःनामी
है-जिसका ज्ञान तथा जिसकी थाह सन्त ही जानते हैं॥
मैं दूसरे शून्य का वर्णन बता रहा हूँ जहाँ 'सत्य नाम' का अस्तित्व है। तीसरा शून्य एक शब्द मात्र
है-जहाँ कोई-कोई सन्त सुरति समाधि में विलीन रहते हैं॥
मैं चौथे शून्य को समझाकर कहता हूँ-जहाँ पार ब्रह्म समाया रहता है। सन्तगण उसे ही परमात्मा
कहते हैं-जिसको वे हृदय की आंख से देखते हैं॥
मैं पंचम शून्य का भेद बता रहा हूँ। उसका नाम पूर्णब्रह्म जीव है। वेदों ने उसे आत्मा तत्त्व कहा है-
और जीव का नाम ही आत्मा है॥
छठें शून्य के विषय में सुनो, वह मन तथा तन में निरन्तर है। उसी के साथ सम्पूर्ण इन्द्रियाँ संसक्त
हैं-परमहंस साधुगण उसे ही ब्रह्म कहते हैं और वेदादि उसे नेति नेति (जिसक अन्त नहीं है) कह कर
बुलाते रहते हैं॥
घट रामायण / १०५
सुनो! उसी मन को ब्रह्म कहा गया है और उसी का नाम निरंजन जाना जाता है। निरंजन की ज्योति
यही कही जाती है और ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव उसके पुत्र हैं॥
उसी ने ही पिंड एवं ब्रह्मांड की रचना कर रखी है-सातों द्वीप तथा नवों खण्ड की उसी के रचे हुए
हैं। इनको निरंजन रूप ज्योति समझो। सन्तों ने उन्हीं को 'काल' कहकर बखाना है॥
यम के सहायक इस काल ने संसार में (मृत्यु का) जाल डाल रखा है और जैसे निषाद या
मल्लाह जाल में मछली पकड़ कर मार डालते हैं, वैसे काल भी (सबका विनाश करता है) काल ही
निरंजन के दसों अवतार है और उसने जीव को सांसारिक कर्म जाल में बांध रखा है॥
तीर्थ, नियमाचरण, व्रत एवं ब्रह्म का कर्म भाव माना जाता है। जिस राम का यह संसार निरन्तर
जाप करता रहता है, वह बार-बार इस भवसागर में बार-बार भ्रमित होता है॥
सारा संसार अंधा (अंद-अंध) है, उसे यह भवसागर का बंधन (फंद) सूझता नहीं, सामने रहते
हुए भी उसे देख नहीं पा रहा है, वह अन्धा हो गया है॥
॥दोहा॥
आदि अंत का भेद कह तुलसी देखा सही।
लेखा अगम अलेख लखि अगाध अदबुद कहा॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने आदि अन्त का भेद सही-सही देखा है, उस अकथनीय और
अलक्ष्य को मैंने देखा है-और उसे देखकर ही मैं उसकी अगाध एवं अद्भुत कथा कह रहा हूँ॥
॥छन्द॥
तुलसी गति गाई अगम सुनाई। सुन्न सुन्न भिन्न भिन्न कही॥
जस जस जेहि लेखा निज निज देखा। आदि अन्त गति सार भई॥
संतन गति गाई महुँ पुनि पाई। जो उतपति सब आदि भई॥
जिनही जिन जानी सबहि बखानी। तुलसी उनके लार लई॥
अर्थ-तुलसी ने अगम्य तत्त्व के ज्ञान को गाकर सुनाया और शून्य के भिन्न-भिन्न रूपों का वर्णन
किया। अपने प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा जिसे-जिस-जिस रूप में देखा-मैंने आदि अन्त से युक्त उनके सार
तत्त्व का वर्णन किया॥
जो इनकी अनादिमयी उत्पत्ति है, उसकी गति का गान सन्तों ने किया। जिन-जिन्होंने इसे समाया,
उन्होंने इसका वर्णन किया है-तुलसीदास तो उनके प्रेम में डूबे हुए हैं॥
॥सोरठा॥
सब में कहा विचार सार पार गति पाइकै।
बूझै बूझनहार जिन में चाखा अगम रस॥१॥
तुलसी तिरन समान अगम भान घटि लखि परा।
सूझा निज घर धाम यह अनाम गति यों कही॥२॥
अर्थ-उस सार तत्त्व के उस पार उसके ज्ञान को प्राप्त करके, सबमें उसके प्रति क्या विचार हैं-
उसका वर्णन कोई बूझने वाला ही कर सकता है और विशेष कर वह जिसने उस अगम के रस के सार
तत्त्व को चख लिया है॥१॥
इस घट में वह अगम्य ज्ञान सूर्य तृण के समान दिखाई पड़ा है-उसी से यह आत्मगृह सुझाई पड़ा है,
उस (सन्त ही) ने उस अनाम की गति को इस प्रकार वर्णित कर सकता है॥२॥
१०६ / घट रामायण
॥ चौपाई ॥
नभ घट भूमी भान दिखाना। लखि लखि लखा भेद जिन जाना ॥
अर्थ-आकाश में, घट में तथा भूमि में सूर्य दिखाई पड़ा-जिन्होंने इसके भेदों को जाना है-उसे
बार-बार देखकर समझा है॥
॥ सोरठा ॥
घट भूमी बिच भान, जानि भेद भिन जिन कही।
सखि सुन देस बयान, रमक रीति उलटी लखी ॥
अर्थ-घटाकाश की भूमि के बीच में सूर्य है-जिनके भेदों को समझकर सन्तों ने भिन्न भिन्न रूपों में
कहा है। हे सखी! उस देश का वर्णन सुनों-वहाँ की व्यवस्था रीति (रमक रीति) उल्टी दिखाई पड़ती
हैं॥
॥ कहेरा ॥
सुन हो सखी इक दिसवा। भूमी ऊगै भान।
दिसवा की उलटी रीति। साधू पालै प्रीति॥ टेक ॥
मछरी गगन पर गाजा। चंदा चुनै नाम।
दिसवा उरध-मुख कुइया। गइया चुगै चाम ॥ १॥
गगन उठै धधकारी। धरै सूरति ध्यान।
खम्भा न महल अटारी। प्यारी पिव धाम॥ २॥
तारा अवर नहिं पानी। बानी उठै बिन तान।
खिरकी खुली बिन द्वारे। पारे परे ठाम ॥ ३ ॥
नइया कुटी भौ पारा। उतरै बिन दाम।
तुलसी अगम गम जानी। श्रुति पायो जिन नाम ॥ ४ ॥
अर्थ-हे सखी! उस एक देश (दिशा) बारे में सुनो, सूर्य पृथ्वी पर उगता है। उस देश (दिशा) की
उल्टी चलन है-सन्तजन प्रीति में फँसे रहते हैं॥
आकाश में मछलियाँ उछलती रहती हैं या शोर करती रहती है चन्द्रमा केवल (राम) नाम को
चुनता है। उस देश में कुएँ ऊर्ध्वमुखी (ऊपर की तरह मुँह वाले) होते हैं और गाएँ चमड़े को खाती रहती
हैं॥ १॥
गगन रह-रह कर धधक उठता है, और सुरति का ध्यान लगा रहता है। न खम्भा है, न महल है, न
अटारी है-बिना किसी आश्रय के प्रिया अपने पति के धाम पर निवास करती है॥ २ ॥
नीचे (अवर) कोई तालाब (तारा) तथा जल नहीं है, और वहाँ बिना तान के वाणी उठती रहती है।
बिना द्वार के खिड़की खुली हुई है और उसके आगे ही (रहने लायक) स्थान भी है॥ ३॥
सन्त नाव से उस कुटी के पार हो जाता है किन्तु कोई उतराई नहीं देनी पड़ती। तुलसी साहब कहते
हैं कि मैंने अगम्य को समझ लिया है और वेदों में (ज्ञान के प्रकाश में) अपना नाम प्राप्त कर
लिया है॥ ४ ॥
घट रामायण / १०७
॥ सोरठा।
साहिबै एक अनाम, अगम धाम संतन लखा।
भखा भेद जिन जान, तिन तिन बरनि सुनाइया॥
अर्थ-स्वामी (ब्रह्म) एक है और अनाम है, उसका धाम अगम्य है, ऐसा सन्तों ने देखा है-जिन्होंने
उसे जाना है-उसके स्वरूप भेद जो वर्णन किया है और बार-बार उसका वर्णन करके सुनाया भी है।
॥ चौपाई॥
अब अनाम इक साहिब न्यारा। सुन और महासुन्न के पारा॥
वो साहिब संतन कर प्यारा। सोइ घर संत करैं दरबारा॥
वा घर का कोई मरम न जाने। नानक दास कबीर बखाने॥
दादू और दरिया रैदासा। नाभा मीरा अगम बिलासा॥
और अनेक संत कहि गाये। जे जे अगम पंथ पद पाये॥
तुलसी मैं चरनन चित चेरा। उन रज चरनन कीन्ह निबेरा॥
अर्थ-मेरा एक साहब (पारमात्मा) अनाम और विलक्षण है वह शून्य तथा महाशून्य के भी पार
स्थित है। वह स्वामी सन्तों को प्रिय है और सन्तगण उसी के घर में दरबार लगाते हैं॥
उस घर का मर्म कोई नहीं जानता, ऐसा नानक एवं कबीरदास कहते हैं। सन्त दादू, दरियादास एवं
रैदास, नाभादास, मीराबाई आदि उसके अगम्य आनन्द विलास को जानते हैं॥
अनेक सन्तगण भी कह गए हैं कि जिन्होंने उसके अगम्य पद को प्राप्त कर लिया है, ऐसे अनेक
सन्तगण भी कह गए हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि मैं उनके चरणों का मन से दास हूँ और उन्हीं के
चरण रजों से इस परमतत्त्व का विवेचन किया है।
॥ सोरठा॥
संत चरन निज दास, तुलसी ताहि बिचारिया।
पायौ जिन घर बास, आदि अनामी लखि कह्यौ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैं सन्त चरणों का सेवक हूँ और मैंने उन्हें मैंने अच्छी तरह से
विचार कर रखा है उस आदि तथा अनादि ब्रह्म को देखकर कह रहा हूँ कि मैंने अपने आत्मस्वरूप गृह
में निवास प्राप्त कर लिया है।
बरनन चार गति बैराग
॥ चौपाई ॥
अब बैराग जोग गति गाऊँ। ज्ञान भक्ति भिनि भिनि दरसाऊँ॥
चारि गति बैराग बताऊँ। जोगी चारि गती गति गाऊँ॥
तीनि ज्ञान का भेद बताई। चौथा ज्ञान जगत जग माईं॥
तेरा भक्ति भेद बतलाऊँ। भिन्न भिन्न कर कहि समझाऊँ॥
न्यारा भेद भाव सब केरा। जो जस जिनका भया निबेरा॥
जो जिनकी करनी जस भाँती। सो सब संतन कही सनाथी॥
मैं रज पावन उन कर चेरा। निरनय कहौं छानि इन केरा॥
१०८ / घट रामायण
अर्थ-अब मैं वैराग्य तथा योग के ज्ञान का वर्णन करता हूँ। उसी के साथ ज्ञान तथा भक्ति को भी
भिन्न-भिन्न रूपों में बतलाऊँगा। वैराग्य की चार अवस्थाओं का वर्णन करूँगा और योगियों की चार
गतियों का भी गान करूँगा ॥
ज्ञान की तीन गतियों का भेद बतलाकर और चौथे ज्ञान को जो जगत में स्थित है-उसका वर्णन
करूँगा। भक्ति के तेरह भेदों का वर्णन करूँगा और भिन्न-भिन्न करके उनके विविध रूपों का वर्णन
करूँगा ॥
सभी भक्ति के भेद भाव न्यारे हैं-जिनसे उनके स्वरूप का स्पष्टीकरण (निबेरा) हो सके, उसका
वर्णन करूँगा। जिनका जैसा स्वरूप है और जैसा भेद है-उन सबको सन्तों ने विश्वास भाव (सनाथी)
से कहा है।
मैं उन सन्तों के चरणों की पवित्र धूलि का दास हूँ, और उन्हीं का मत समझकर मैं उनका वर्णन
करूँगा ॥
॥ सोरठा ॥
भक्ति ग्यान और जोग, भोग भाव सब विधि कहीं।
जो जेहिं गति जस भोग, सो तस करौं विचारि कै ॥
अर्थ-भक्ति ज्ञान तथा योग, भोग एवं अन्य भावों का हर प्रकार से वर्णन करूँगा। जो जिस गति
एवं जिस भोग में जीवन जी रहा है, उन सबका मैं विचारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ॥
॥ प्रथम बैराग ॥
॥ चौपाई ॥
अब बैराग तीनि गति गाऊँ। भाखों भेद भिन्न दरसाऊँ ॥
बेरक्ती बैराग सुनाऊँ। ता कर चिन्ह भिन्न बतलाऊँ ॥
माया मोह जगत नहिं भावै। काम रु क्रोध लोभ नहिं लावै ॥
और जगत सँग रहै उदासी। जग संसार करत सब हाँसी ॥
त्यागी अति संतोष समावा। भूख प्यास निद्रा न सतावा ॥
और अनेक भाँति रस त्यागी। बन बसि रहै नाम अनुरागी ॥
बिन सतगुरू धूरि सब जाना। संत सुरति बिन भरमै खाना ॥
जो कोइ त्याग लाग मन कीन्हा। संगल दीप भोग तेहि दीन्हा ॥
जो जेहि त्याग भाग जस पावा। सुरति सब्द बिन भौं में आवा ॥
अर्थ-अब वैराग्य की तीन गतियों का वर्णन कर रहा हूँ और उनके भिन्न-भिन्न भेदों को दिखला
रहा हूँ। 'विरक्ति' वैराग्य का वर्णन कर रहा हूँ तथा उसके भिन्न-भिन्न लक्षणों को बतला रहा हूँ॥
विरक्त सांयासी को इस संसार के माया-मोह भाते नहीं और कभी काम, क्रोध एवं लोभ के
वशीभूत नहीं होता। वह संसार की संसक्ति से उदासीन रहता है और सारा संसार उसकी हँसी करता
रहता है।
वह त्यागी है तथा उसमें सन्तोष भाव समाया हुआ है। उसे भूख प्यास एवं निद्रा पीड़ित नहीं करते।
उसने अनेक रूपों की संसक्तियों रस-वासनाओं का त्याग कर रखा है। वन में निवास करता हुआ
केवल परमात्मा के नाम में अनुरक्त रहता है॥
बिना सतगुरु (परमात्मा) के वह सम्पूर्ण जगत को धूलि की भाँति समझता है-सन्तों की सुरति योग
के बिना दर दर (खाना) भटकता रहता है।
घट रामायण / १०९
जिस किसी ने भी त्यागपूर्वक उस परमात्मा में मन लगा दिया वह सिंघल द्वीप (सिद्ध भूमि) में
निरन्तर आनन्द करता रहेगा ॥
॥ द्वितीय वैराग ॥
॥ चौपाई ॥
परम जोग बैराग बताऊँ। रहनी चाल ताहि दरसाऊँ॥
अष्ट कँवल उलटै हिये माई। उलटै कँवल तत्त मन लाई॥
निस दिन तत्त मती गति राखै। पाँचो तत्त गती सोइ भाखै॥
तब तन छूटे तत्त समाई। चारि तत्त जिव उपजै जाई॥
फिर तन छूटै खानि समाना। सो पुनि करै जो लेइ निदाना॥
अर्थ-परम जोग वैराग्य के विषय में बता रहा हूँ-उसकी दिनचर्या एवं आचरण (रहनी) का वर्णन
करता हूँ। उसने चित्त में स्थित अष्ट कमलदल को उल्टा कर दिया है और उस उल्टे कमल से जुड़े
तत्त्व में चित्त लगाए रहता है॥
रात-दिन वह मूल तत्त्व (ब्रह्म) की गति का वर्णन करता रहता है और पाँचों तत्त्वों की गति का
वह वर्णन करता रहता है॥
उसके बाद जब उसका शरीर विनष्ट होता है तो वह परमतत्त्व में विलीन हो जाता है और वह चार
तत्त्वों एवं जीव के साथ पुनः उत्पन्न होता है। इसके पश्चात् उसका चित्त भण्डार की तरह भर जाता है-
इसको वही कर सकता है-जो इसके फलों को धारण करने की आकांक्षा करता हो॥
॥ तृतीय बैराग ॥
॥ चौपाई ॥
त्याग बैराग कौ बरनि सुनाई। छूटै देह खानि गति पाई॥
जो जस त्याग भोग तन तैसा। खान पान तन पावै जैसा॥
अर्थ-त्याग वैराग्य का मैं वर्णन करके सुनाता हूँ-उसकी देह छूटने पर इसे सम्पन्नता की गति प्राप्त
होती है। उसका जैसा त्याग होगा, या जैसा भोग होगा-उसी प्रकार उसका शरीर होगा, वह अपने कर्म
के अनुसार ही खान-पान तथा शरीर प्राप्त करेगा॥
॥ चतुर्थ बैराग ॥
॥ चौपाई ॥
तन त्यागी बैरागी भाई। जो जेहि लिया देन सोइ जाई॥
बार बार छूटै तन जाइ। छूटै तन तहँ गर्भ समाई॥
वहि वहि देह खाइ पुनि जाई। ऐसे भर्म खानि भरमाई॥
बिना सुरति नहिं पावै पारा। भरमै भोग परै भौ धारा॥
अर्थ-त्वह बार-बार शरीर छोड़कर माता के गर्भ में जाता है-उसे देकर वह पुनः खाता हुआ अपना
जीवन व्यतीत करता है, ऐसे भ्रम की खानि में वह भटकता रहता है। बिना सुरति ज्ञान के वह भवसागर
से पार नहीं हो पाता-क्योंकि वह संसार सागर की योग धारा में बहता हुआ निगरन्तर भरमता रहता है॥
११० / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
चारौ गति वैराग सुरति लाग न्यारी रही।
सत मत गति कोइ जाग संत सरनि उबरा सोइ॥
अर्थ-त्ये चारों गति वैराग्य की हैं-इसमें सुरति में लगी हुई चित्तगति विलक्षण है-कोई ही सन्तमति
का व्यक्ति संसार में जगता है-और सन्तों की शरण में जाकर मुक्ति प्राप्त कर लेता है॥
॥ वरनन जोग ॥
॥ प्रथम जोग ॥
॥ चौपाई ॥
चारों गति बैराग बखाना। आगे कहौं जोग साधांना॥
पिरथम परम जोग गति गाऊँ। भिन्न भिन्न तेहि को दरसाऊँ॥
मुद्रा पाँच अवस्था चारी। तीनि ज्ञान पुनि बानी चारी॥
सहस कँवलदल सुरति लगावै। आतम तत्त अकास समावै॥
पुनि तन छूटि पावै नर दही। भोग भुगति पुनि भव रस लेही॥
पावै मुक्ति बास कर चीन्हा। मुक्ति भोग पुनि होइ अधीना॥
अर्थ-वैराग्य की चारों गतियों का वर्णन कर रहा हूँ। आगे योग के लक्ष्य (संधान) का वर्णन
करूँगा। प्रथम परम योग की गति का गान करता हूँ। उसके भिन्न-भिन्न स्वरूपों को भी स्पष्ट करूँगा।
पाँच मुद्राएँ हैं, चार अवस्थाएँ, तीन ज्ञान हैं, तथा चार वाणियाँ हैं। सहस्त्र कमल दल पर जो सुरति
ध्यान लगाता है, और आत्म तत्त्व के साथ जो शून्य में समा जाता (विलीन हो जाता) है। पुनः शरीर
छूटने पर वह मनुष्य की देह प्राप्त करता है फिर अनेक प्रकार के भोगों एवं संसार की आनन्दमयी
वासनाओं का भोग करता है। अन्त में, वह मुक्ति का निवास प्राप्त करता है, फिर मुक्ति और भोग दोनों
उसके अधीन हो उठते हैं॥
द्वितीय जोग
॥ चौपाई ॥
दूजा जोग कहौं समझाई। इड़ा पिंगला सुषमनि माई॥
बंक नाल पट मारग जाई। मन भया भिन्न सुन्न के माई॥
देखै जोति निरखि निज नैना। तन छूटै सुपने की सैना॥
जो कछु कर्म भाव जग कीन्हा। छूटै देह भोग फल लीन्हा॥
सुरति सब्द बिन भये अचीन्हा। ता सों हो गये जोग अधीना॥
बिन सतसंग भेद नहिं पावै। ता ते कर्म भोग भव आवै॥
अर्थ-अब मैं दूसरे योग का समझाकर वर्णन कर रहा हूँ। इसका सम्बन्ध इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना से
है। बंक नाल के छः सन्धियों के मार्ग से जाता हुआ इस साधक का मन शून्य में पहुँच जाने के कारण
लोकजन से भिन्न हो उठता है।
वह अपने नेत्रों से उस परम ज्योति को देखता है और उसकी मृत्यु भी स्वप्न की ही भाँति होती है।
उसने संसार में जो भी कर्म तथा भावनाएँ की हैं-देह छूटने पर उसके अनुसार फल भोग प्राप्त होता है।
घट रामायण / १११
वह साधक सुरति ज्ञान से सर्वथा अपरिचित ( अचीन्हा ) रहता है इसलिए वह उसी योग के ही
अधीन बना रहता है। (इसने सतसंग नहीं किया हैं) इसलिए सत्संग के बिना ज्ञान (भेद) नहीं समझ में
आता-इसीलिए वह पुर्नजन्म लेकर सांसारिक कर्म भोगों में आता है।
॥ सोरठा ॥
जोग जुगुति गति गाइ, नहिं अकाय गति पायऊ।
बिन सतसंग नसाइ, सुरति सब्द चीन्हें बिना॥
ज्ञान गती कथि गाइ, जो अघाइ आगे कही।
ताहिं पाइ मति माइ, सो तुलसी सब बिधि कही॥
अर्थ-योग युक्ति (तरीकों) की गति गाकर निष्काम गति नहीं प्राप्त की जा सकती। सुरति शब्द
की पहचान किए बिना तथा सत्संगति से रहित सारा जीवन नष्ट हो जाता हैं।
मैंने ज्ञान की गति का वर्णन किया है-जो साधुजनों की तृप्ति का कारण होता है उसे मैं आगे
कहूँगा-हे सन्तों, उसे ज्ञान के अन्तर्गत प्राप्त करो-इसका वर्णन मैं (तुलसीदास) आगे करूँगा॥
॥ बरनन ज्ञान ॥
॥ प्रथम ज्ञान ॥
॥ चौपाई ॥
अब सुनु ज्ञान ठान गति गाऊँ। ता का भेद भाव बतलाऊँ ॥
रेचक पूरक कुम्भक कहिये। ता का भेद सबै सुनि लैये ॥
चारि अवस्था तन में भाखी। तुरिया तत्त चारि अभिलाखी ॥
परमहंस ता की मति जाना। मन करता को ब्रह्म बखाना ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति कहाई। तुरिया चौथी भेद न पाई ॥
तुरियातीत बसै वोहि पारा। सुनि पुनि है मन का ब्यौहारा ॥
मनमत चलै मान मद माई। मन करता को ब्रह्म बताई ॥
ता ते भौ गति मति नहिं पावै। बार-बार भौ माहिं समावै ॥
सतगुरु सब्द भेद नहिं जानै। आपी आप ब्रह्म मन मानै ॥
सास्तर सिंध सार बतलावै। ता ते भौजल पार न पावै ॥
चीन्हैं संत सुरति गति न्यारी। तौ पुनि उतरै भौजल पारी ॥
आपा आप पाप गति खोवै। तब सतसंग संत गति जोवै ॥
अर्थ-अब ज्ञान की स्थिति (ठाम) सुनों, मैं उसकी गति का गान कर रहा हूँ और मैं उसके भेद
तथा भाव की गति बतला रहा हूँ। रेचक, पूरक, कुम्भक इसे कहा जाता हैं और सभी भेदों को सुन लें॥
शरीर की चार अवस्थाएँ कही गई हैं-(जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति) के साथ तुरीया गति की
अभिलाषा की जाती हैं। इसकी गति परमहंस ही जानते हैं तथा इस कर्त्ता मन को ही ब्रह्म कहा जाता है॥
मन की अवस्थाएँ जागृति, स्वप्न एवं सुषुप्ति कही जाती हैं-इसके चौथे भेद तुरीया को सामान्य
जन नहीं प्राप्त करते। मन की अन्तिम व्यवहार दशा यह है कि वह तुरीयातीत होकर उसके उस पर
निवास करता रहे ॥
१९२ / घट रामायण
म् आदि को मन में विलीन करके मन के अनुसार आचरण करे तथा कर्त्ता मन को ब्रह्म समझे।
इससे व्यक्ति भवसागर को भोगने की स्थिति नहीं प्राप्त करेगा किन्तु इसके विपरीत बार-बार भवसागर
में भोग की गति प्राप्त करता है। जो 'सतगुरु' शब्द का अर्थ नहीं समझता, और स्वयं अपने-आप को
ही ब्रह्म मानता है, शास्त्रों को ज्ञानसिन्धु का सार तत्त्व समझता है, वह इस मायाजाल (भौजल) से
मुक्ति नहीं पाता॥
जो सन्तों को पहचानता है, उनकी विलक्षण सुरति गति (ज्ञान) को जानता है, वही इस सांसारिक
प्रपंचों से मुक्त होता है। आत्म ज्ञान से स्वयं जो पापमयी वृत्ति को नष्ट कर देता है, वही सत्संगति द्वारा
संत गति को प्राप्त करता है॥
॥ द्वितीय ज्ञान॥
॥ चौपाई॥
औरहि ज्ञान सुनौ जग केरी। बेद पुरान जाल भौ बेरी॥
पंडित पढ़ पढ़ ज्ञान सुनावै। आदि गती गम भेद न पावै॥
झूठी आस बास सब केरी। फिरि फिरि स्वाँस आस भौ बेरी॥
जो जो कर्म करै सोइ पावै। बार बार भौ भटका खावै॥
मन में मान मोट कर जानै। ता ते परै नरक की खानै॥
भक्ती भाव भेद नहिं पावै। ऊँची जाति मान मन लावै॥
साधु संत मन में नहिं आवै। ऊँचा ज्ञान आप ठहरावै॥
नीचा होइ संत को जानै। संत कृपा कछु जानै आनै॥
संतन भेद बेद से न्यारा। नीच होइ पुनि पावै सारा॥
ऊँचा मान सदा मन राखै। सोइ सब जगत जीव कह भाखै॥
पूजन अपनी चाल बतावै। ऐसे सकल जीव भरमावै॥
अर्थ—संसार के अन्य ज्ञान के विषय में सुनें। वेद पुराणादि तो भवसागर के लिए बेड़ी बन्धन
(बेरी) जैसे हैं। पंडित इन्हें पढ़-पढ़कर ज्ञान कहता है, और वह आदि ज्ञान की समझ और उसके भेदों
को नहीं समझता॥
आशा, वासनाएँ (बास) सब कुछ झूठे हैं-पुनः पुनः श्वास की आशा (जीवन) भवसागर के लिए
बेड़ी बन्धन (बेरी) बन जाता है। जो जो कार्य करता है, उसी का फल उसे मिलता है—और वह वासना
के संसार में भटकता रहता है॥
मन की आकांक्षाओं का वह लक्षण (मोह) मान बैठता है, इसीलिए वह नरक की खान में पड़ता
है। वह भक्तिभाव का रहस्य नहीं समझ पाता और जातियों को श्रेष्ठ मानकर उनमें मन लगाता है॥
साधु संगति का भाव उसके मन में नहीं उत्पन्न होता और अपने ज्ञान को ही सर्वोच्च ठहराता है। वह
जब लघुता के भाव से सम्पन्न होगा तो संतों को समझेगा, फिर सन्तों की कृपा से थोड़ा बहुत ज्ञान
उत्पन्न होगा। संतों के भेद वेद ज्ञान से भी विलक्षण हैं और सब कुछ लघुता से ही व्यक्ति प्राप्त कर
सकता है।
उच्च मानदण्ड सदैव ही रक्षा करते हैं और वही सम्पूर्ण संसार एवं जीवों के रूपों का निरूपण
करता है। इससे भिन्न केवल अपने अनुसार अन्य पूजा आदि की विधियाँ बताते हैं, ऐसे व्यक्ति सभी
के लिए भ्रम उत्पन्न करते हैं॥
घट रामायण / ११३
॥ सोरठा ॥
यहिं बिधि जग मत ज्ञान पंडित भूले भरम में।
वाक ज्ञान परमान संत भेद चीन्हें नहीं॥
अर्थ-इस प्रकार से सांसारिक ज्ञान है, शास्त्रकार पंडित भ्रम में भूले हुए हैं-जहाँ तक सन्तों का
प्रश्न है, वे किसी तरह के भेद भाव को नहीं पहचानते। उनके लिए केवल वाक् ज्ञान (सही-सही रूपो
में शब्दों का गया) ही प्रमाण है॥
॥ चौपाई ॥
अब सुनु भक्ति भाव कर लेखा। रामायन में कीन्ह बिबेका॥
भक्ति भाव नौ बरनि सुनाई। ता से भिन्न चारि पुनि भाई॥
नौ फल भाव बेद बतलावै। जो जस करै भोग तस पावै॥
नौ की राह मुक्ति नहिं पावै। दसवीं अविरल भक्ति लखावै॥
एकादस अनुपावन लेई। बार बार मुक्ती बर देई॥
भेद भक्ति कर भाखौं लेखा। इष्ट भाव मन बसै बिबेका॥
अब अभेद का भेद अभेदा। ता को परम न पावै बेदा॥
कोइ कोइ साध संत गति पाई। जिन की सूरति सब्द समाई॥
सूरति सैल करै असमाना। जोगी पंडित परम न जाना॥
परमहंस सन्यासी भाई। उन का मरम नहीं उन पाई॥
जगत जाल संसार बिचारा। उनकी गति कोइ पावै न पारा॥
अर्थ-अब भावभक्ति का वर्णन सुनें। मैंने रामायण में उसका विवेक (स्पष्ट निरूपण) किया है।
मैंने नौ प्रकार के भक्तिरूपों का वर्णन करके बताया है-उनसे भिन्न चार प्रकार के और भी भक्ति भेद
हैं।
वेद या शास्त्र परम्परा नवधा भक्ति के फलों के स्वरूप का वर्णन करते हैं-जो जिस प्रकार की
भक्ति करता है-वह उसी प्रकार का फलभोग प्राप्त करता है। नवधा भक्ति के मार्ग पर चलने से मुक्ति
नहीं मिलती। दसवीं अविरल भक्ति का मार्ग दिखाती है। एकादश भक्ति अनुपावन (आत्म शुद्धि) होती
है और यह भक्ति बार-बार श्रेष्ठ मुक्ति देती है।
अब भेद भक्ति का वर्णन करता हूँ इससे इष्ट भाव के प्रति मन में विवेक उत्पन्न होता है। अब
अभेद रूप अभेद भक्ति का भेद बताता हूँ उसका रहस्य वेद को भी नहीं ज्ञात है। इसका ज्ञान किसी-
किसी साधु सन्त को प्राप्त होता है-इसका ज्ञान सुरति समाधि में समाविष्ट है॥
सुरति समाधि द्वारा जो शून्य (आकाश) में स्थित शिखर पर है, योगी तथा पंडितजन भी उसके मर्म
को नहीं जानते। परमहंस एवं सन्यासी भी उसका रहस्य नहीं जान पाए हैं। यह बेचारा मनुष्य संसार
जगत जाल में फँसा पड़ा है-उनकी गति का कोई पार नहीं पा सकता॥
॥ सोरठा ॥
तेरा भक्ति बयान, सो प्रमान संतन कही।
तुलसी तनहिं बिचारि, सुरति भेद समझै कोई॥१॥
नौ जग माहिं पसार, दसवीं कछु कछु भिन्न है।
११४ / घट रामायण
एकादस मुक्ति मँझार, द्वादस गति मति मुक्ति मय ॥ २ ॥
अब अभेद गति गाइ, तेरह येहि बिधि यों कही।
ये साधन के माहिँ, सुरति सब्द जा ने लखी ॥ ३ ॥
अर्थ-सन्त तुलसी साहब कहते हैं कि उनकी भक्ति के वर्णन का प्रमाण वही है, जो संतों द्वारा
किया गया है। जरा विचार करके देखो, सुरतिभेद (रूपी भक्ति) कोई समझता नहीं है॥ १॥
नवधा भक्ति का संसार में प्रचलन है, दसवीं भक्ति कुछ-कुछ भिन्न है, एकादश भक्ति के लिए
वही आधार है और बारहवीं भक्ति ज्ञानमय, विवेकमयी एवं मुक्तिमयी है॥ २॥
इस अभेद भक्ति का वर्णन करके मैंने इस प्रकार तेरह भक्ति रूपों का वर्णन किया है-जिसने
सुरति 'शब्द' देख लिया है, उनके लिए ये सब साधन हैं या मार्ग हैं॥ ३॥
॥ छन्द ॥
चारों बैरागा जोग समाधा। तीनि ज्ञान गति गाड़ दई।
नौ चारों भक्ती जो निज उक्ती। भाषि भेद सब गाइ कही॥
जो जिन जानी संत बखानी। चरन चेत चित लाइ लई ॥ १ ॥
सूरति सर चेती छाँड़ि अचेती। सुरति सैल नभ माहिं लई।
फोड़ा असमाना निरखि ठिकाना। पच्छिम किवारी द्वार गई॥ २ ॥
परमातम पाया जीव छुड़ाया। पारब्रह्म पद कँवल मई।
कँवला निज फूला मिटि गया सूला। जीव गती तजि ब्रह्म भई ॥ ३ ॥
आगे इक द्वारा अगम पसारा। सत्तलोक वोहि नाम कही।
वहँ है सतनामा ब्रह्म न जाना। वे सत साहिब अगम सही ॥ ४ ॥
तीनों से न्यारा लोक पसारा। चौथे पद के पार वही।
जहँ है निःनामी कोउ न जानी। तीनों पट के पार रही ॥ ५॥
कहौं अगम अनामी ठीक न ठामी। संतन जानी सार सही।
अंबर असमाना मही न भाना। चाँद सुरज तत तारे नहीं ॥ ६ ॥
पानी नहिं पवना अगिनि न भवना। वेद भेद गति नाहिं लई।
ब्रह्मा नहिं बिस्ना राम न किस्ना। सिव सिद्धी नहिं पार लई ॥ ७ ॥
निर्गुन नहिं सर्गुन नहिं अपबर्गुन। पिंड ब्रह्मांड दोउ नाहिं कही।
जोती नहिं सोती अगम न होती। पारब्रह्म की आदि नहीं ॥ ८ ॥
नहिं कार अकारा नहिं निरकारा। सत्त नाम सत सत्त रही।
नहिं नाम अनामी तुलसी जानी। जाइ समानी सार मई ॥ ९॥
अर्थ-चारों प्रकार के वैराग्य, योग, समाधि तथा तीन ज्ञानों की गतियों का वर्णन करके बतला
चुका हूँ। तेरह (नौ + चार) प्रकार की भक्ति के सम्बन्ध में अपने मत आदि का वर्णन करके उनके
भेदों का निरूपण किया ॥
इनमें से जो इसको जान ले रहा सन्त कहा जाएगा और मैंने उसके निर्मल चरणों में चित्त को लगा
लिया है॥ १॥
घट रामायण / १९५
अज्ञानता (अचेती) का त्याग करके सूरति रूपी सरोवर का स्मरण करो (ध्यान करो) और सूरति
के पार स्थित ध्यान के पर्वत शिखर के आकाश पर ध्यान लगाओ। उस आसमान को तोड़कर अपने
ठिकाने को देखो और मैं पश्चिमी किवाड़े के द्वार पर पहुँची ॥ २ ॥
वहाँ परमात्मा मिला और इस जीवत्व के बन्धन से मुक्ति मिली और पारब्रह्म के चरण कमलमय
हो उठे॥ स्व कमल पुष्पित हुआ-जन्म जन्मान्तर की पीड़ा समाप्त हो उठी और जीव के इस स्वरूप का
परित्याग करके मैं ब्रह्ममय हो उठा॥ ३ ॥
उसके आगे अगम्य तक फैला एक द्वार मिला-उसका नाम सत्य लोक कहा गया है। वहाँ एक
सत्यनाम है-जिसे ब्रह्म भी नहीं जानता-वही अगम्य 'सत साहब' हैं॥ ४ ॥
यह लोक तीनों लोकों से विलक्षण तथा व्याप्य लोक है, और वही चतुर्थ पद (मोक्ष) के उस पार
है, जहाँ पर अनाम (निःनामी) निवास करते हैं और जिनके विषय में कोई नहीं जानता। वे तीनों पटों
(लोकों की सीमा) के पार रहते हैं॥ ५ ॥
न वहाँ जल है, न वायु है, न अग्नि है, न निवास गृह है और ज्ञान की गतियों का कोई स्वरूप भी
नहीं है। जहाँ न ब्रह्मा हैं, न विष्णु हैं, न राम हैं, न कृष्ण हैं और शिव तथा सिद्ध भी जिसका रहस्य नहीं
प्राप्त कर पाते ॥ ७ ॥
वहाँ न निर्गुण है, न सगुण है और न वहाँ स्वर्ग का नामोनिशान है और न कहीं वहाँ पिंड या ब्रह्मांड
है॥ परमात्मा की ज्योति का न वहाँ कोई स्रोत (सोती) है, वहाँ अगम या अज्ञेय भी नहीं है और पार
ब्रह्म परमात्मा का आदि स्वरूप लक्षण भी नहीं है॥ ८ ॥
वहाँ न कोई अनाकृति है, न कोई आकृति है, न कोई निरंकार है-वहाँ केवल 'सत्य नाम-ही सही-
सही स्थिति में है। तुलसी साहब जानते हैं कि वहाँ न कोई नाम है, न अनामी है वरन् वहाँ समस्त तत्त्व
या महातत्त्व उस परम सारगय 'सत्य तत्त्व' में जाकर समाविष्ट हैं ॥ ९ ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी अगम अनाम, अगत भेद का से कहौं।
कोड न मानै बात, संत अंत कोड ना लखै ॥ १ ॥
निगम न पावै बेद, नेति नेति गोहरावही।
ब्रह्म न जानै भेद सत्त, नाम निज भिन्न है॥२॥
एक अनीह अनाम, सत सुरति जानै यही।
वे पहुँचे वोहि धाम, सो अनाम गति जिन कही॥ ३॥
तुलसी अगम बिचार, सार पार गति पद लखा।
वह अलेख का ठाम, तुलसी तरक विचारिया ॥ ४ ॥
सुरति अटा के पार, आठ अटारी अधर में।
तुलसिदास लियौ सार, सुरति सिंध से भिनि भई॥ ५॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि वह परम तत्त्व अगम्य है, अनाम है-फिर उसे ज्ञान के भेद का
वर्णन मैं कैसे करूँ सम्भव है, मेरी बातें कोई न स्वीकार करे-क्योंकि सन्तों की अन्तिम ज्ञान दशा
किसी की समझ में नहीं आती ॥ १ ॥
शास्त्रादि जिसके ज्ञान को नहीं प्राप्त कर सकते और जिसे 'नेति नेति' कहकर पुकारते हैं-जिसके,
स्वरूप भेद को ब्रह्म भी नहीं जानता, यह 'सत्य' नाम स्वयं में सबसे अलग है॥ २॥
वह केवल एक है, आकांक्षा शून्य, अनाम है और जिसे सुरति के द्वारा ही जाना जाता है-वही
१९६ / घट रामायण
सुरति ध्यानी मे न ही उस धाम तक पहुँचते हैं, वह अनाम गति है-उसके विषय में ऐसा कहा गया
है॥ ३ ॥
तुलसी साहब कहते हैं कि यह मेरा अपना अगम चिन्तन है और मैंने इसे उस परम तत्त्व के पार
(शून्य पर्वत शिखर के पार ) जाकर मैंने देखा है-वह अलेख्य की स्थली है-तुलसी ने उसे अपने
अनुभव से विचारा ( समझा) है॥ ४॥
सुरति ध्यान रूपी अटारी ( अट्टालिका ) के उस पार उस शून्य (अघट ) में आठ अटारियाँ
( अट्टालिकाएँ) हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने उनका सारतत्त्व समझा है और उसको समझने के
बाद उनमें तन्मयता (भिनि गई) प्राप्त कर ली॥ ५ ॥
॥ चौपाई ॥
आठ अटारी सुरति समानी। मंगल ठुमरी करी बखानी॥
जस जस सूरति चढ़ी अटारी। तस तस बिधि मैं भाखी सारी ॥
अर्थ-सुरति आठ अटारियों (अट्टालिकाओं) में जाकर समा गई और मैं उसका वर्णन मंगल ठुमरी
राग में कर रहा हूँ। जैसे-जैसे एक-एक (अटारी) अट्टालिका पर सुरति चढ़ रही है, उस-उस प्रकार से
उसके मंगल का गान मैं कर रहा हूँ।
॥ मंगल ॥
आठ अटारी महल, सुरति चढ़ि चाखिया।
ठुमरी माहीं भेद, भाव सब भाखिया ॥ १ ॥
संत पंथ का अंत, साध कोइ बूझिहै।
प्यारी पुरुष मिलाप, साफ स्रुति सूझिहै॥ २ ॥
जस जस मारग रीति, राह समझाइया।
प्यारी अटारी माहि, जाइ सोइ गाइया ॥ ३ ॥
मन मथ कीन्हा चूर, सूर स्रुति ले चढ़ी।
गुरु पद पदम मँझार, पुरुष पै जा खड़ी ॥ ४॥
बिधि बिधि ठुमरी माहिं, गाइ तुलसी कही।
जो कोइ चीन्हे भेद, संत सोई सही ॥ ५ ॥
अर्थ-आठ अटारियों (अट्टालिकाओं) के ऊपर चढ़कर सुरति अपने प्रिय का आनन्द चख रही है।
इस मंगल ठुमरी के माध्यम से उसके स्वरूप तथा दशाओं का मैं वर्णन करता हूँ॥ १ ॥
संत मार्ग की समाप्ति का मर्म कोई ही संत बूझेगा। प्रिय आत्मा एवं पुरुष ब्रह्म का मिलन वेदों में
साफ-साफ दिखाई पड़ता है॥ २ ॥
जैसा-जैसा वहाँ तक पहुँचने का मार्ग है और उनके परस्पर मिलने की रीति है, मैं उसे समझा रहा
हूँ। प्रिया (आत्मा) प्रिय (ब्रह्म) की अटारी में है वहीं जाकर मैं गान करता हूँ॥
कामदेव को पूरी तरह नष्ट करके चूर्णकर दिया और श्रुति के सूर (आत्म तत्त्व) को लेकर मैं
अट्टालिका के ऊपर चढ़ चली। गुरु के चरण कमल के मध्य होकर मैं अपने प्रिय पुरुष (आराध्य
परमात्मा) के चरणों में जाकर खड़ी हो गई ॥ ५ ॥
तुलसी साहब कहते है अनेक प्रकार की ठुमरियों में इसे गाकर बताया है-जो इन भिन्न-भिन्न
ठुमरियों के भेद पहचान ले वही संत है ॥ ५ ॥
घट रामायण / १९७
॥ सोरठा ॥
ठीका ठुमरी माँहि आठ अटारी अधर की।
सूरति पदम विलास विधि बयालीस पद मिली॥
अर्थ-इस ठीका ठुमरी राग द्वारा अन्तर्रात्मा (अधर) की आठ अटारियों का वर्णन कर रहा हूँ।
सूरति द्वारा प्रिय के चरणों में विलास करती हुई मैं विधिवत् बयालीस तत्त्वों से मैं मिली॥
॥ ठुमरी १॥
अली अटकी सुरति अटारी। मन हटकर हारा री॥ टेक ॥
यह अँग संग भंग ले लटकी। सूली स्वर्ग नर्क भौ भटकी।
दीन्ही सतगुरु घट की तारी। चटकी मति फटक फटा री॥ १॥
ये ले लार पार स्रुति सटकी। निरखि अलख आदि घटघट की।
हकलख लागी बिरह करारी। हिये खटकी कसक कटारी॥ २॥
नौलख खेल कला ज्यों नट की। सूरति सहस कँवल झर भटकी॥
लीला सिखर निकर नित न्यारी। दधि मटुकी घिरत मठारी॥ ३॥
तुलसी तोल कही तिल तट की। भड़ धुनि रंकार रस रट की॥
ये दस रस बस सुरति सँवारी। पिउ पट की खोलि किवारी॥ ४॥
अर्थ-हमारी सखी अभी सुरति की अटारी में ही फँसी हुई है, वहाँ से हटकर मन हार बैठा है, सुरति
लोक में अन्य तत्त्वों को साथ-साथ लेकर मैं लटकी रही-स्वर्ग, नरक, भवसागर की पीड़ा (सूली)
में भटकती रही। सतगुरु ने इस पिंड के दरवाजे पर ताली लगा दी और उस दरवाजे की आवाज सुनते
है-हमारी चेतना जाग्रत (फटक) हो उठी॥ १॥
अलक्ष्य ब्रह्म जो मूलरूप में आदि से ही घट-घट में स्थित है, उसे देखकर यह मेरी ज्ञान चेतना
आनन्दपूर्वक मुझे लेकर उसके पास पहुँच गई-एकाएक (हकलक) मुझे उसे पाने के लिए तीक्ष्ण
वियोग जागृत हो उठा और हृदय में जैसे कसक भरी कटारी खटक (घुस गई या लग गई-या हिल
गई) गई हो॥ २॥
मैं सुरति ज्ञान के स्त्रहस्त्रार कमल दल में एकाएक ऐसी भटक गई मानो नट कला के नौलख
खेलों में भटक गया हो। शून्य शिखर की लीला नित्य विलक्षण है-जैसे दही से भरी हुई मटकी में ऊपर
छाँछ क्षण-क्षण अपने आप उतर आता हो॥ ३॥
एक तिल जैसे स्थान वाले तट की कोई तुलना (तोल) नहीं है और उसमें अनाहत नाद के 'रंकार'
ध्वनि की रसमयी रटन शुरू हो उठी। फिर पति (ब्रह्म) के कक्ष की किवाड़े खोलकर मैंने दस रसों के
वश में होकर सुरति ध्यान (आलिंगनादि का आनन्द) सँवार लिया॥ ४॥
॥ ठुमरी २॥
मँझरी पिय झाँकि निहारी। सखि सतगुरु की बलिहारी॥
दीन्हे दृग सुरति सँवारी। चीन्हा पद पुरुष अपारी॥ १॥
चली गगन गुफा नभ न्यारी। जहँ चंद न सूर सिहारी॥
तुलसी पिय सेज सँवारी। पौढ़ी पलँगा सुख भारी॥ २॥
अर्थ-हे सखि! मझली नायिका ने पति (ब्रह्म) को झाँक कर देख लिया, यह गुरु की ही कृपा का
तृतीय खण्ड: घट रामायण उपसंहार एवं परमपद प्राप्ति
११८ / घट रामायण
फल है। सुरति ध्यान को सँवार कर उसने आँखें बन्द कर ली और उस अनन्य ब्रह्म (अपारी पुरुष) का
स्थान पहचान लिया ॥ १ ॥
उस शून्याकाश की न्यारी गुफा में वह चल पड़ी जहाँ न चन्द्रमा है, न सूर्य है-न कोई अन्य
(सिहारी) है। तुलसी साहब कहते हैं कि वहाँ प्रिय (ब्रह्म) की सेज सजी हुई बिछी है-और वह आत्मा
पलँग पर अत्यन्त आनन्द के साथ लेट गई (पौढ़ी) ॥ २ ॥
॥ ठुमरी ३ ॥
सलिता जिमि सिंध सिधारी। सूरति रत सब्द बिचारी॥
जहँ सुन्न न सुन्नी न्यारी। मत मीन महासुन पारी॥ १ ॥
नहिं गुन निर्गुन मत झारी। निज नाम निअच्छर भारी॥
जहँ पिंड ब्रह्मांड न तारी। तुलसी जहँ सुरति हमारी॥ २ ॥
अर्थ-जैसे सरिताएँ सिन्धु के लिए प्रस्थान करती हैं-उसी प्रकार सुरति रत साधक अनादि शब्द की
ओर चलता है। जहाँ न शून्याकाश है और न शून्यसाधक चित्त, यह मन रूपी मछली उस महाशून्य रूपी
सरोवर में जा पड़ी (पारी) ॥ १ ॥
जहाँ न गुण है, न निर्गुण है और सारे मतवाद भी वहाँ नहीं हैं-और वहाँ उसका (ब्रह्म का) अपना
नाम बिना अक्षर का है। जहाँ न पिंड है, न ब्रह्मांड हैं न ज्ञान की किवाड़ों को बंद किये हुए ताली हैं-
तुलसी साहब कहते हैं कि वहाँ हमारी सुरति निवास करती है ॥ २ ॥
॥ ठुमरी ४ ॥
ए अली आदि अंत अधिकारी। पिय प्यारी प्रीति दुलारी॥
हम कीन्हा खेल पसारी। सब रचना रीति हमारी॥ १ ॥
करता नहिं काल पसारी। हम अगम पुरुष की नारी॥
ठुमरी सोइ संत बिचारी। तुलसी नित नीच निहारी॥ २ ॥
अर्थ-हे सखी ! यह नायिका (पत्नी), आत्मा प्रिय (ब्रह्म) को अति प्रिय हैं, उसके आदि अन्त की
स्वामिनी है और अत्यन्त प्रेम के कारण उसके लिए दुलारी बनी हुई है। हमारे सारा खेल खुला फैला है
और खेल की रचना और दूसरे की नहीं, मेरी ही है ॥ १ ॥
इस खेल का कर्त्ता चारों ओर फैला हुआ काल नहीं है मैं तो उस अगम पुरुष (ब्रह्म) की पत्नी हूँ।
(जिस पर किसी अन्य का प्रभाव नहीं है)। संतों की इस आनन्दमंगलमयी ठुमरी को सुनकर तुलसी
साहब सदैव अपने को छोटा (तुच्छ, नीच) समझते रहते हैं ॥ २ ॥
॥ ठुमरी ५ ॥
ए गुइयाँ पिय हम हम पिय एकी। कोइ फरक न जानौ नेकी॥
कोइ बूझै संत बिबेकी। जोड़ अगम निगम नहिं लेखी॥ १ ॥
जिन अटल अटारी पेखी। पिय रूप न रेख अदेखी॥
कोइ कंथ न पंथ न भेषी। तुलसी सब मारग छेकी॥ २ ॥
अर्थ-हे साथिन (गुइयाँ)! प्रिय में मयी और मैं प्रियमयी बनकर एक हो उठी हूँ और हममें तथा
उनमें (आत्मा तथा ब्रह्म में) कोई जरा भी (नेकी) अन्तर न समझो। इस वास्तविकता को कोई
बिबेकवान् सन्त ही समझ सकता है-जिसने अगम एवं निगम में निरूपति ब्रह्म को न समझकर
आत्मब्रह्म को समझा हो ॥ १ ॥
घट रामायण / १११
जिन सन्तों ने इस शून्याकाश की अटल अट्टालिकाओं को देख लिया है और रूप तथा लक्षणों
(रेख) से हीन ब्रह्म को हृदय में अपने को तन्मय कर दिया है, वह न कोई कंथ (कथा-शास्त्र) कहता
है और न किसी पंथ (ज्ञानमार्ग) को जानता है और न वह वेषभूषा (सन्तों जैसी) धारण करता है, वही
उस ब्रह्म के समस्त मार्गों में आत्म चित्त को साक्षात्कृत करके बैठा है॥२॥
॥ सोरठा ॥
ठुमरी ठौर ठिकान, अगम भान स्रुति पद लखा।
चखा अमर रस ज्ञान, पार पुरुष पद में मिली॥१॥
पिया भवन के माईँ, जाइ जोइ जस जस कही।
रही पुरुष पद छाइ, लई आदि अपने गई॥२॥
अर्थ-उसका ठौर ठिकाना ठुमरी ही है और उसी भाव में श्रुतियों ने निर्दिष्ट अगम्य सूर्य का स्थान
देखा है। इसी के माध्यम से उन्होंने उस ब्रह्म के अगम ज्ञान रस का स्वाद चखा है और मैं (आत्मा) उस
लोक (पार) में जाकर पुरुष (ब्रह्म) से मिल गई॥१॥
मैंने जो-
१२० / घट रामायण
अर्थ-सुरति रूपी दूरबीन की सहायता से शून्य शिखर पर चढ़कर मैंने उस आदि रूप अनादि तत्त्व
को हृदय रूपी नेत्रों से समाधि के क्षणों में साध कर देखा।
॥ चौपाई ॥
तुलसी निरखि देखि निज नैना। कोइ कोइ संत परखिहै बैना॥
जो कोइ संत अगम गति गाई। चरन टेकि पुनि महूँ सुनाई॥
अब जीवन का कहौं निबेरा। जा से मिटै भरम बस बेरा॥
जब या मुक्ति जीव की होई। मुक्ति जानि सतगुरु पद सेई॥
सतगुरु संत कंज में बासा। सुरति लाइ जो चढ़ै अकासा॥
स्याम कंज लीला गिरि सोई। तिल परिमान जानि जन कोई॥
छिन छिन मन को तहाँ लगावै। एक पलक छूटन नहिं पावै॥
स्रुति ठहरानी रहै अकासा। तिल खिरकी में निस दिन वासा॥
गगन द्वार दीसै इक तारा। अनहद नाद सुनै झनकारा॥
अनहद सुनै गुनै नहिं भाई। सूरति ठीक ठहर जब जाई॥
चूवै अमृत पिवै अघाई। पीवत पीवत मन छकि जाई॥
सूरति साथ संघ ठहराई। तब मन थिरता सूरति पाई॥
सूरति ठहरि द्वार जिन पकरा। मन अपंग होइ मानौ जकरा॥
चमकै बीज गगन के माईं। जबकि उजास पास रहै छाई॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने भली भांति निरखकर उस तत्त्व को अपनी हृदय-रूपी आँखों
से देखा है-कोई-कोई ही सन्त मेरी इस वाणी को समझेगा॥ जो कोई सन्त की गति का गान करता है,
उसी के स्वर में स्वर मिलाकर मैंने भी चरण टेक कर (उस ब्रह्म के प्रति) मैंने (महूँ) भी उस सत्त्व
को सुनाया है॥
अब मैं जीवन के वर्णन का निपटारा करता हूँ-जिससे कि भ्रमवश स्थित चित्त का बन्धन (घेरा)
समाप्त हो उठे। जब इस जीव की मुक्ति होगी-मुक्ति को समझकर साधक गुरुचरणों की सेवा
करेगा। सतगुरु (ब्रह्म) का निवास सहस्रार कमल में है, और जो साधक सुरति साधना द्वारा उस
शून्याकाश तक पहुँचता है वहीं उसे श्याम कमल लीला शिखर दिखाई पड़ता है-कोई-कोई ही सन्त जन
उसके तिल जैसे होने की प्रमाण गति को पहचानता है। वह साधक उस तिल जैसे तत्त्व पर क्षण-क्षण
मन को लगाए रहता है और एक पल के लिए वह ध्यान छूटने नहीं पाता॥
समस्त श्रुतियाँ उस आकाश में ठहरी रहती हैं और तिल की खिड़की में उनका निरन्तर निवास बना
रहता है। शून्याकाश के द्वार पर एक तारा दिखाई पड़ता है-और निरन्तर (अनाहत नाद की झंकार सुनाई
पड़ती है। हे भाई! अनाहत सुनाई पड़ती है किन्तु समझ में नहीं आती और जब भलीभाँति सुरति समाधि
ठहर जाती है, तब 'अमृत का निरन्तर स्राव होने लगता है और साधक तृप्त होकर उसका पान करता है
और उसका पान करते-करते मन सर्वथा परितृप्त हो उठता है॥
वह साधक सुरति के साथ आनन्द सिंधु में ठहर जाता है और तब साधक का स्थिर सुरति प्राप्त
करता है।
सुरति में स्थिर होकर जिन्होंने उस अगम्य के द्वार को पकड़ रखा है-उसका मन उसी में विलुप्त हो
उठता है, अपंग (जड़) की भाँति जकड़ उठता है। उस आकाश में हे सखी! विद्युत चमकती रहती है
और पास में उजाला छाया रहता है।