गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
७६ गरीबदास जी की बानी
भवन तेग थी काठ की जैसे चमकी बीज ।
ओटनहारा को नहीं अवगत अलख अभीज१ ॥४२॥
भवन गमन गगनै किया घोरे सुधा गुलाम ।
ज्यों मिसरी साहब मिले बरछी लोह लगाम ॥४३॥
करनहिं जाँचे आन कर मंगत किया जुहार ।
मो कूँ पारस दीजिये दालिदर बेडार२ ॥४४॥
करन तोहि कूँ दसत में सोच परी बड़ भीर ।
धरती कूँ खोदन लगा मेटी जन की पीर२ ॥४५॥
पारस ठहका आन कर लगी तीर की भाल ।
परसत ही सोना भया कीन्हा करन निहाल२ ॥४६॥
ऐसी निःचा चाहिये पारस पूरन हाथ ।
जो रंगे सोई रँगे साँईं जेही दात ॥४७॥
गगन मँडल हुन बरखिया तीन बेर तत सार ।
सीता लछमन राम की मध मूरत करतार ॥४८॥
(१) भवन भक्त, जाति के राजपूत चौहान, राना के एक भारी कामदार थे । एक बेर
राना के साथ शिकार में एक हिरनी के पीछे घोड़ा डाला और उसको तलवार से मारा ।
वह हिरनी गाभिन थी उसका बच्चा भी दो टुकड़े हो गया । भवन जी को बड़ी ग्लानि
आई और उस दिन से प्रण किया कि लोहे की तलवार के बदले काठ की तलवार
रखना । एक चुगलखोर ने राना से कह दिया, राना ने इनको तलवार दिखलाने को
कहा । जब इन्होंने म्यान से काठ की तलवार खींची तो वह फौलाद की हो कर बिजली
की नाईं चमकी कि सब की आँखें चौंधिया गईं । भक्त का ओटनहार अर्थात् रक्षा
करने वाला भगवन्त आप ही हैं ।
(२) कथा है कि राजा करन सवासी मन सोना हर रोज दान किया करते थे एक
दिन भगवान उनकी जांच करने को मँगता के भेष में आये और राजा से ताजा सोना
मांगा [गरीबदास जी ने पारस पत्थर का मांगना लिखा है] राजा का प्रण था कि कभी
किसी का सवाल खाली न जाय इससे बड़ी फिकर में पड़ कर जंगल को निकल गये
और सोच में धरती को तीर से कुरेदने लगे । भगवान को उनकी दशा देख कर करुना
आई और तीर की गाँसी के तले पारस पत्थर रख दिया जिसके छूते ही गाँसी सोने की
हो गई और राजा ने निहाल होकर पारस पत्थर को धरती में से निकाल लिया और
ताजा सोना बन गया ।
साध महिमा का अंग ७७
सो मूरत क्यूँ ना पूजहीं पत्थर ढेला डार ।
सीता लछमन राम के लीजे चरन जुहार ॥४६॥
ग्यारह रुद्रों पर तपै द्वादस मद्ध मिलाप ।
सूछम मूरत सूँरते ब्रह्म सब्द गरगाप ॥५०॥
कोट धुजा१ किस काम का सूम सकल है चाल ।
असी गंज२ बाँटे नहीं परा तासु पर ज्वाल३ ॥५१॥
दिल दानी है तासुका सदाबरत मन माहिं ।
पृथ्वी पारस हो रही हुन बरषी जिस ठाहिं ॥५२॥
सुअर गऊ कूँ खात है बिसमिल४ करै हमेस ।
दोऊ दीन दोजख गये जम तेहि पकरे केस ॥५३॥
करदी करद५ चलावहीं जीव जोनि पर जाय ।
नैन बैन सूँ मिलि रहा छाती परदे पाय ॥५४॥
यह तो काफिर करम है धरम नहीं यह पाप ।
द्रोही नबी रसूल के डूबेंगे गरगाप ॥५५॥
जिव हिंसा जो करत हैं या आगे क्या पाप ।
कंटक जूनि जहान में भेंटा सिंह अरु साँप ॥५६॥
आतम प्रान उधार ही ऐसा धरम न और ।
कोटि जग्ग असुमेध फल सब्द समाना भौर ॥५७॥
॥ साध महिमा का अंग ॥
धन जननी धन भूमि धन धन नगरी धन देस ।
धन करनी धन सुकुल धन जहाँ साध परबेस ॥ १ ॥
जा ऊदर साधू बसै सो ऊदर है पाख६ ।
(१) पहिले कायदा था कि पूरे करोड़ रुपये पर एक फरहरा खड़ा कर दिया करते
थे जो निशान करोड़पती होने का समझा जाता था। (२) खज़ाना । (३) ज़वाल ।
(४) ज़िबह । (५) छुरी । (६) पाक ।
११
७८ गरीबदास जी की बानी
सनकादिक से उपज ही सुकदे बोले साख१॥ २ ॥
गंदा अंडा गरद मिल परा बिरिछ के खोढ़।
संकर तत्त सुनाइया पारबती गई पौढ़१॥ ३ ॥
धन संकर धन गीरजा धन सुकदे धन ब्यास।
धन जननी सुकदेव की द्वादश बरस बिलास१॥ ४ ॥
जहाँ साध जन औतरे तहाँ भक्ति का भेव।
गोरख उपजे ज्ञान जब भभूत दई महदेव२ ॥ ५ ॥
सूया अनसूया मिले तीनों देवा ध्यान।
सब्द स्वरूपी औतरे दत्तात्रे परमान३॥ ६ ॥
संत सुरसरी चलत हैं मारू देस बहंत।
बागड़ मंझ बिलास होय नदी सुरसरी संत ॥ ७ ॥
साध नदी दो अगम नग इन सम तुल नहिं और।
साध भक्ति के खंभ हैं नदिया बिरछा मौर ॥ ८ ॥
(१) कथा है कि एक समय में महादेव जी पारबती जी को एकान्त में तत्व-ज्ञान
का उपदेश दे रहे थे पास ही एक पेड़ था जिसके खोढ़र या खोखली पेड़ी में एक गंदा
अंडा सुग्गे का पड़ा हुआ था, वह उस चरचा के प्रताप से सजीव होकर फूटा और
बच्चा बन कर बड़ा हो गया। कथा के बीच में पारबती जी को औंघाई आ गई तब वह
सुग्गा जो कथा को सुन रहा था पारबती जी की जगह हुंकारी भरने लगा जिस में
महादेव जी कथा को बंद न कर दें। जब कथा समाप्त हुई तो महादेव जी ने पारबती
जी को सोता देख कर पूछा कि तुम तो सो गई थीं हुंकारी कौन भरता था। पारबती जी
ने कहा मैं नहीं जानती। इस पर महादेव जी ने क्रोध में भर कर अपना त्रिशूल
छोड़ा। सुग्गा भागा और त्रिशूल ने उसका पीछा किया। रास्ते में व्यास जी की स्त्री
सूर्य्य की पूजा कर रही थीं और उनका मुँह खुला हुआ था सुग्गा उनके मुँह में होकर
पेट में समा गया और बारह बरस तक उनके पेट में रहा क्योंकि त्रिशूल को उस स्त्री
के वध करने का अधिकार न था। जब व्यास आदिक ने जाकर महादेव जी से बिनती
की तब शिव जी ने त्रिशूल को फेर लिया और सुग्गा शुकदेव जी के रूप में व्यास जी
की स्त्री के उदर से निकल कर जंगल को चला। ब्यासजी उनके फेर लाने को पीछे दौड़े
तो शुकदेव जी ने उनको ज्ञान सुनाया।
(२) गोरखनाथ जी जोगी महादेव के उपासक थे। (३) अत्रय ऋषि की स्त्री
अनसूया के अंतर में ध्यान करते समय त्रिदेव ने अपना अंश डाल दिया जिससे
दत्तात्रेयजी उत्पन्न हुए। इन्होंने चौबीस गुरू धारन किये।
साध महिमा का अंग ७६
साँईं सरिखे संत हैं यामें मीन न मेख ।
परदा अंग अनादि है बाहर भीतर एक ॥६॥
साँईं सरिखे देखले बरतावै जे कोय ।
सप्त कोस जल चढ़ गया जहाँ साध मुख धोय१ ॥१०॥
सकल मेदिनी२ भर गई सब्द न पूटा३ फेर ।
सप्त कोस क्या बात है डूबे मेरु सुमेर ॥११॥
ऐसे साधू संत जन पार ब्रह्म की जात ।
सदा रते हरि नाम सँू अंतर नाहीं घात ॥१२॥
साध अगाध अपार जन परमानँद सँू प्रीत ।
कहवत के तौ संत हैं अवगत अलख अतीत ॥१३॥
साध सगे हैं जगत में संत सगाई साँच ।
साधू ढूँढ़न नीकलूँ बहु बिधि काछूँ काछ ॥१४॥
साध समुंदर गगन गत सुन्न समाने सोय ।
परमानँद के परमहंस एक कहूँ की दोय ॥१५॥
साध समुन्दर लाल नग संत हीरों की खान ।
सतगुरु बेदी बाँचहीं सुनतेही परवान ॥१६॥
महिमा कीजै संत की तन मन धन सब देहि ।
सिर माँगे टालो नहीं मोरध्वज लखि लेहि४ ॥१७॥
(१) गिरनार पहाड़ जहाँ अच्छे साधू रहते हैं वहाँ से सात कोस नीचे हनुमान
धारा गिरती है। (२) पृथ्वी। (३) पीठ।
(४) राजा मोरध्वज की प्रचण्ड भक्ति की बहुत सी कथा हैं। जिस बात का यहाँ
ज़िकर है वह यह है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को राजा मोरध्वज की असदृश भक्ति की लीला
दिखलाने को आप एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप धर कर और अर्जुन को अपना पुत्र बना
कर राजा के घर आये और कहा कि रास्ते में लड़के को बाघ ने पकड़ा था और हमारे
बहुत बिनती करने पर इस शर्त पर छोड़ा कि राजा मोरध्वज का दाहिना अंग हमारे
खाने को लाओ। राजा ने जवाब दिया कि बड़े भाग मेरे कि यह निकाम देह साध सेवा
में काम आवै और बूढ़े ब्राह्मण के कहने मुताबिक अपनी रानी और कुँवर को आज्ञा दी
कि आरे से चीर कर सिर से पाँव तक दो टुकड़े कर दो। आरा उठा कर राजा के सिर
पर रक्खा गया और एक ओर से रानी और दूसरी ओर से राजकँवर चलाने लगे कि
८० गरीबदास जी की बानी
संत सलहली सेज के जिन में कैसी भिन्न ।
साहब साँईं ऊतरे नाम धराया जन्न१ ॥१८॥
संत सलहली सेज के जिन के कैसी भिन्न ।
साहब परगट संत हैं जिन का एकै मन्न ॥१९॥
मोड़ अमोड़ं मगन है हद बेहद में सैल ।
साहब साधू पाक है उपजी बाजी मैल ॥२०॥
माल मुलक सब घूर है बिन साँईं के नाह२ ।
दुनिया अलग बिजोग है साधू साहब माँह ॥२१॥
माल मुलक सब घूर है पाक परम गुरु संत ।
जिन सूँ साहब निकट है तिन में कैसा अंत ॥२२॥
जिन में नाहीं अंतरा अरस परस परवान ।
साहब साधू एक हैं दुनिया दूजी जान ॥२३॥
संत सामना संत में दुनिया है सो न्यार ।
जिन में दूजी भिन्न क्या राते सिरजनहार ॥२४॥
साध समुन्दर कमल गति माहें साँई गंध ।
जिन में दूजी भिन्न क्या सो साधू निरबंध ॥२५॥
कमल न डूबै जल चढ़ै माहें मधुकर३ बास ।
जैसे चन्द कमोदिनी यूँ साँई निज दास ॥२६॥
नौ नेजे जो जल चढ़ै कमल न भींजै गात ।
माहें ज्ञान सुगन्ध सर४ आदि अंत का साथ ॥२७॥
नौ नेजे जो जल चढ़ै बूँद न लागै पान ।
ऐसे साधू अगम गत संसारी परवान ॥२८॥
इसमें राजा को बाँई आँख से एक आँसू टपक पड़ा । इस पर बूढ़े ब्राह्मण बोले कि
यह दान अब अशुद्ध हो गया क्योंकि तुम रोये जो चिन्ह दुःख और खेद का है । राजा
ने उत्तर दिया कि ऐसा कदापि नहीं है वरन बाँईं आँख अपनी अभाग्यता पर शोक
करती है कि हमारी ओर का अंग साध सेवा में न लगा । इस पर श्रीकृष्ण ने प्रसन्न
होकर निज रूप से दर्शन दिया ।
(१) भक्त । (२) नेह । (३) भँवरा । (४) तालाब ।
साध महिमा का अंग ८१
कमल पत्र की बासना जाको कवन सरूप ।
महकै गंध अपार गति सँूघत बड़े बड़े भूप ॥२६॥
भूप संत साधु कहे जुगन जुगन के राव ।
सप्त पुरी नहिं बासना जिनके भक्ति पसाव१ ॥३०॥
मन मधुकैर काया केवड़ा महकत गंध अजोख ।
हूँट हाथ गढ़ अगम है रच राखे सब लोक ॥३१॥
स्वर्ग सलेमा२ बास है तिरबेनी के घाट ।
आगे अगम अगाध गति अवर नहाहीं आट३ ॥३२॥
संत सरोवर हंस हैं भच्छन करें बिचार ।
पुहुप बासना ज्यूँ रहैं राई रिंच न भार४ ॥३३॥
साध कमल मध बासना ऐसा हलका अंग ।
मैल मनोरथ ना रहै निरमल धारा गंग ॥३४॥
साध सँगत हरि भक्ति बिन कोई न पावै पार ।
निरमल आदि अनादि है गंदा सब संसार ॥३५॥
साध साध सब कोउ कहै साध सुमत सें जान ।
कुमत कमावे जीव है जैसे जल पाखान ॥३६॥
ज्यूँ जल में पाखान है भींजत नाहीं अंग ।
चकमक लागे अगिन है कहा करे सतसंग ॥३७॥
जहँ महिमा है साध की चरन कमल से हेत ।
जुगन जुगन उर में रखूँ ध्रू प्रहलाद सकेत ॥३८॥
साध संत के अैन५ में बसैं हुजूर अमान ।
जा घर निन्दा साध की सो घर डूबे जान ॥३६॥
लख छल छिद्दर मैं करूँ अपने संतों काज ।
हिरनाकुस ज्यूँ मारहूँ नरसिंघ धरहूँ साज६ ॥४०॥
(१) क़दर । (२) सुखाला । (३) पाँच तत्व और तीन गुन । (४) जैसे फूल में सुगंध जिसका रत्ती भर बोझ नहीं होता । (५) घर, आँख । (६) देखो नोट पृष्ठ ७३ ।
८२ गरीबदास जी की बानी
स्वर्ग पतालों सकल में है अनुरागी राम ।
नरसिंघ होकर अवतरे प्रहलाद भक्त के काम१ ॥४१॥
जहँ जन की महिमा सुनूँ तहँ मैं गमन करंत ।
वो तौ नगर अमान है जहँ मेरे प्यारे संत ॥४२॥
साध साध सब कोउ कहै साध समुन्दर तीर ।
अवगत की गत को लखै मिल गये नीर कबीर२ ॥४३॥
नीर कबीर निरंजनं अंजन धरे सदेस३ ।
अंजन मंजन माँजिये जब होवे परवेस ॥४४॥
साध कहावन कठिन है मग पर धरे न पाँव ।
सहँगी४ संगत है नहीं चढ़ो नाम की नाव ॥४५॥
साध कहाया जगत में परचे पड़े न प्रान ।
जग सोभा जब होयगी मिलै अलख निरबान ॥४६॥
सब्द मिलावा अंग रस परसन है दीदार ।
रोम रोम तारी लगै झिलमिल किरन अपार ॥४७॥
बरषे किरन अवरन गत रिमझिम रिमझिम रंग ।
जो देखै सोई कहै अरस परस परसंग ॥४८॥
संत सकल के मुकट हैं साँईं साध समान ।
बड़ भागी वे हंस हैं जिन संतों नाल पिछान ॥४६॥
॥ राग-धुनि ॥
आज मेरे आये सन्त सुजान ।
तन मन धन वारूँगी प्रान ॥ टेक ॥
चरन कमल रज डारूँ सीस ।
मानो आप मिले जगदीस ॥ १ ॥
(१) देखो नोट पृष्ठ ७३ । (२) कबीर साहब नौजनमतुआ बालक की दशा में
काशी के लहरतारा तालाब में बहते मिले थे [ देखो जीवन-चरित्र कबीर शब्दावली भाग
१ में ] । (३) निकट । (४) सस्ती, सहज ।
साध महिमा का अंग ८३
संत की महिमा कही न जाय ।
अठसठ तीरथ चरनों माँय ॥ २ ॥
संत की महिमा अपरम्पार ।
पूरन ब्रह्म मिले करतार ॥ ३ ॥
संत की महिमा अगम अगाध ।
नारद से उधरे प्रहलाद¹ ॥ ४ ॥
ध्रु भेंटे नारद निर्बान ।
अमरापुर पर रचे बिमान¹ ॥ ५ ॥
संत की महिमा अगम अगाह ।
बूड़न तें राखे गज ग्राह² ॥ ६ ॥
संत की महिमा निश्चल थीर ।
द्रोपद सुता की बढ़ गई चीर³ ॥ ७ ॥
संत की महिमा अधिक सुमेर ।
भिलनी के जूठे खाये बेर४ ॥ ८ ॥
संत की महिमा निश्चल अंक ।
बालमीक का बाजा संख५ ॥ ६ ॥
संत की महिमा अमन अमान ।
देखो गनिका चढ़ी बिमान६ ॥१०॥
संत की महिमा पद गरगाप ।
तिरलोचन के बिर्तिया आप७ ॥११॥
पंडरपुर नामा निर्बान ।
देवल फेर छवा दई छान८ ॥१२॥
(१) प्रह्लाद भक्त की कथा नोट पृष्ठ ७३ में और ध्रू भक्त की नोट पृष्ठ २७ में
दी है । प्रह्लाद को गर्भ में और ध्रू को बन में नारद मुनि ने उपदेश दिया था ।
(२) देखो नोट पृष्ठ २० । (३) देखो नोट पृष्ठ २० । (४) सेवरी भिल्लिनी के दाँत से कुतर
कर चीखे हुए बेर श्री रामचन्द्र ने बड़ी रुचि से भोग लगाये । (५) देखो नोट पृष्ठ
५५-५६ । (६) देखो नोट पृष्ठ २० । (७) देखो नोट पृष्ठ ७३ । (८) पंडरपुर के ठाकुरद्वारे
का दरवाजा फिर जाने और नया छप्पर बन जाने का हाल नामदेव भक्त की कथा नोट
पृष्ठ ७१ में देखो ।
८४ गरीबदास जी की बानी
कासीपुरी कबीर कमाल।
गैबी बालद लाइ रसाल१ ॥१३॥
दिया भंडारा जन रैदास।
कनक जनेऊ पद परकास२ ॥१४॥
संत की महिमा कही न जाय।
पीपा कूद परे दरियाय३ ॥१५॥
दास गरीब संत कूँ सेव।
चौरासी मिट गइ सुकदेव४ ॥१६॥
॥ पारख का अंग ॥
अनंत कोटि अवतार हैं नहिं चितवै बुध नास।
खालिक खेलै खलक में छः ऋतु बारस मास ॥ १ ॥
पीछे पीछे हरि फिरैं आगे संत सुजान।
संत करैं सोइ साँच है चारो जुग परमान ॥ २ ॥
साँई सरिखे साध हैं इन सम तुल नहिं और।
संत करैं सोइ होत है साहब अपनी ठौर ॥ ३ ॥
संतों कारन सब रचा सकल जमीं असमान।
चंद सूर पानी पवन जग तीरथ औ दान ॥ ४ ॥
ज्यूँ बच्छा गउ की नजर में यूँ साँईं औ संत।
हरि जन के पीछे फिरैं भक्त बछल भगवंत ॥ ५ ॥
धारा मेरे संत की मुझ से मिटै न अंस।
बुरी भली भाषै नहीं सोई हमारा बंस ॥ ६ ॥
संखौं जिव परलै करै संखौं उत्पति ख्याल।
ऐसे समरथ संत हैं एक खिसै५ नहिं बाल ॥ ७ ॥
(१) भगवंत ने कबीर की लाज रखने को बैलों अन्न उनके द्वारे पर पहुँचा दिया
[देखो नोट पृष्ठ २६] कमाल कबीर साहब के पुत्र और चेले थे। (२) देखो रैदास
जी की कथा, नोट पृष्ठ २८-२६। (३) देखो नोट पृष्ठ २७। (४) तोते की चौरासी छूट कर
शुकदेव जी का चोला पाने की कथा देखो नोट पृष्ठ ७८। (५) उखड़ै।
पारख का अङ्ग ८५
गरजैं इन्द्र अनंत दल बहु बिध बरषा होय ।
संखों जिव परलै करें संखों उत्पति होय ॥ ८ ॥
इच्छा कर मारैं नहीं बिन इच्छा मर जाहिं ।
निःकामी निज संत हैं तहँ नहिं पाप लगाहिं ॥ ९ ॥
बरषैं तड़कैं डोब दें तारैं तीनों लोक ।
ऐसे हरिजन संत हैं सौदा रोकम रोक१ ॥१०॥
बहतर छोहन छै करी कुरुक्छत्तर देख२ ।
कपिल सँघारे सगर के पाप लगा नहिं एक३ ॥११॥
द्वादस कोट निनानबे गोरख जनक बिदेह ।
यूँ तारे यूँ डोब दे यामें नहीं संदेह ॥१२॥
सील माहिं सब लोक हैं ज्ञान ध्यान बैराग ।
जोग जग्य तप होम नेम गंगा गया पराग ॥१३॥
संतोष स्वर्ग पाताल सब और कहा मृत लोक ।
फिर पीछे कूँ क्या रहा जब आया संतोष ॥१४॥
बिबेक बिहंगम अचल है आया हिरदे माहिं ।
भक्ति मुक्ति औ ज्ञान गति फिर पीछे कुछ नाहिं ॥१५॥
दया सर्ब का मूल है छिमा छका जो होय ।
तिरलोकी कूँ तार दे नाम निरंजन गोय ॥१६॥
दस हजार रापत४ बली कामदेव महभंत ।
जा सिर अंकुस सील का तोरत गज के दंत ॥१७॥
क्रोध बली चंडाल है बल रापत द्वादस सहंस ।
एक पलक में डोब दे अनंत कोट जिव हंस ॥१८॥
(१) नकद, खरा । (२) कथा है कि कुरुक्षेत्र में महाभारत के संग्राम में बहत्तर
छोहनी दल जमा हुआ था जिन में से एक न बचा—एक छोहनी में दस हजार हाथी, तीस
हजार रथ, एक लाख मल्ल या पहलवान, दस लाख घोड़े, और छत्तीस करोड़ सिपाही
होना बतलाते हैं । (३) कपिलमुनि ने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को जो उनसे
दुर्वचन बोले थे भस्म कर दिया । (४) हाथी ।
१२
८६ गरीबदास जी की बानी
जा सिर अंकुस छिमा का मारे तुस तुस१ बीन ।
तिरलोकी से काट दे जे होय साधु प्रवीन ॥१६॥
लोभ सदा लहरा रहै तिरलोकी में इच्छ ।
बल रापत२ बीस सहस है पलक पलक के बिच्च ॥२०॥
ता अंकुस संतोष है तिरलोकी से काढ़ ।
काटै कोटक कटक दल संतोष तेग बड़ बाढ़ ॥२१॥
मोह मवासी मस्त है बल रापत२ तीस सहंस ।
तिरलोकी परिवार है जहँ उपजे तहँ बंस ॥२२॥
जा सिर अंकुस बिबेक है पूरन करै मुराद ।
तिरलोकी की बासना ले बिबेक सब साध ॥२३॥
॥ ब्रह्म बेदी ॥
ज्ञान सागर अति उजागर निरबिकार निरंजनं ।
ब्रह्म ज्ञानी महा ध्यानी सत सुकृत दुख भंजनं ॥ १ ॥
मूल चक्र गनेस बासा रक्त बरन जहँ जानिये ।
क्लिँग जाप कुलीन तज सब सब्द हमरा मानिये ॥ २ ॥
स्वाद चक्र ब्रह्मादि बासा जहँ साबित्री ब्रह्मा रहै ।
ओँ जाप जपत हंसा ज्ञान जोग सतगुरु कहै ॥ ३ ॥
नाभि कमल में बिस्नु बिसंभर जहँ लछमी सँग बास है ।
हँग जाप जपन्त हंसा जानत बिरला दास है ॥ ४ ॥
हृदय कमल महादेव देवं सती पारबती संग है ।
सोहं जाप जपत हंसा ज्ञान जोग भल रंग है ॥ ५ ॥
कंठ कमल में बसै अबिद्या ज्ञान ध्यान बुधि नासही ।
लील चक्र मध काल कर्म आवत दम कूँ फाँसही ॥ ६ ॥
त्रिकुटी कमल परमहंस पूरन सतगुरु समरथ आप है ।
मन पौना सम सिंध मेलो सुरत निरत का जाप है ॥ ७ ॥
(१) भूसी । (२) छिलका । (३) हाथी ।
ब्रह्म बेदी ८७
सहसकमलदल आप साहब ज्यूँ फूलन मध गंध है।
पूर रहा जगदीस जोगी सत समरथ निरबंध है ॥ ८ ॥
मीन खोज¹ हनोज² हर दम उलट पंथ की बाट है।
इला पिंगला सुखमन खोजो चल हंस औघट घाट है ॥ ९ ॥
ऐसा जोग बिजोग बरनौ जो संकर ने चित धरा।
कुंभक रेचक द्वादस पलटै काल करम तिस तें डरा ॥१०॥
सुन्न सिंघासन अमर आसन अलख पुरुष निर्बान है।
अति लोलीन बेदीन मालिक कादिर कूँ कुरबान है ॥११॥
है नरसिंघ अबंध अवगत कोट बैकुंठ नख रूप है।
अपरंपार दीदार दरसन ऐसा अजब अनूप है ॥१२॥
घुरै निसान अखंड धुन सुन सोहं बेदी गाइये।
बाजै नाद अगाध अगहै जहँ ले मन ठहराइये ॥१३॥
सुरत निरत मन पवन लपटै बंकनाल सम कीजिये।
स्रवै³ फूल अस्थूल अस्थिर अमी महारस पीजिये ॥१४॥
सतपुरी मेरुडंड खोजो मन मनसा गहि राखिये।
उड़िहैं भँवर अकास गमनं पाँच पसीसो नाखिये⁴ ॥१५॥
गगन मँडल की सैल करले बहुर न ऐसा दाव है।
चल हंसा परलोक पठाऊँ भवसागर नहिं आव है ॥१६॥
कंदर्प⁵ जीत उदीत⁶ जोगी षटकर्मी यह खेल है।
अनुभव मालिन यह हार गूँधै सुरत निरत का मेल है ॥१७॥
सोहं जाप अथाप थरपौ त्रिकुटी संजम धुन लगै।
मान सरोवर न्हान हंसा गंग सहसमुख जित बहै ॥१८॥
कालिन्द्री कुरबान कादिर अवगत मूरत खूब है।
छत्र सेत बिसाल लोचन गलताना महबूब है ॥१९॥
(१) मछली की राह जिसका निशान नहीं होता। (२) सदा। (३) चुवै। (४)
रोकिये। (५) कामदेव। (६) प्रकाशमान।
८८ गरीबदास जी की बानी
दिल अंदर दीदार दरसन बाहर अंत न जाइये ।
काया माया कहा बापुरी१ तन मन सीस चढ़ाइये ॥२०॥
अवगत आदि जुगादि जोगी सत पुरुष लौलीन है ।
गगन मँडल गलतान गैबी जाति अजाति बेदैन है ॥२१॥
सुख सागर रतनागर निरभय बिन मुख बानी गावही ।
बिन आकार अजोख निरमल दृष्टिमुष्टि न आवही ॥२२॥
झिलमिल नूर जहूर जोती कोट पदम उजार है ।
उलट नैन बेसुन्न बिस्तर जहाँ तहाँ दीदार है ॥२३॥
अष्ट कमलदल सकल रमता त्रिकुटी कमल मध निरखहीं ।
सेत धजा सुन्न गुमठ२ आगे पचरँग झंडे फरकहीं ॥२४॥
सुन्न मंडल सतलोक चलिये नौ दर मूँद बेसुन्न है ।
बिन चसमों एक बिम्ब३ देखा बिन सरवन सुनि धुन्न है॥२५॥
चरन कमल में हंस रहते बहुरंगी बरियाम है ।
सूछम मूरत स्याम सूरत अचल अभंगी राम है ॥२६॥
नौ मुखंध४ निसंक खेलो दसवें दर मुख५ मूल६ है ।
मालिन रूप अनूप सजनी बिन बेली का फूल है ॥२७॥
स्वास उस्वास पवन कूँ पलटै नागफली कूँ भूच७ है ।
सुरत निरत का बाँध बेड़ा गगन मँडल कूँ कूँच है ॥२८॥
सुनले जोग बिजोग हंसा सब्द महल कूँ सिध करो ।
गहु गुरुज्ञान बिज्ञान बानी जीवतही जग में मरो ॥२६॥
उजल हिरंबर सेत भौंरा अछै बृछ सत बाग है ।
जीते काल बिसाल सोहं तरजीजन बैराग है ॥३०॥
मनसा नारी कर पनिहारी खाकी८ मन जहँ मालिया ।
कुंभक काया बाग लगाया फूले फूल बिसालिया ॥३१॥
(१) बेचारी । (२) गुम्बज़ । (३) प्रकाशमान गोलाकार । (४) द्वारे । (५) मुख्य ।
(६) सार वस्तु । (७) भौंचना । (८) पिंडी ।
[Header] ब्रह्म बेदी ८६
कच्छ मच्छं कुरम धोलं सेस सहस-फन गावहीं ।
नारद मुनि से रटैं निस दिन ब्रह्म पार न पावहीं ॥३२॥
संभु जोग बिजोग साधा अचल अडिग समाध है ।
अवगत की गत नाहिं जानी लीला अगम अगाध है ॥३३॥
सनकादिक औ सिध चौरासी ध्यान धरत हैं तासुका ।
चौबीसो अवतार जपत हैं हरमहंस प्रकास का ॥३४॥
सहस अठासी औ तैंतीसो सूरज चंद चिराग है ।
धर१ अंबर२ धरनीधर३ रटते अवगत अचल बिहाग है॥३५॥
सुर नर मुनिजन सिध अरु साधक पारब्रह्म कूँ रटत हैं ।
घर घर मंगलचार चौरी ज्ञान जोग जहँ बटत हैं ॥३६॥
चित्रगुप्त धरमराय गावै आदि माया ओंकार है ।
कोट सरसुती लाप करत हैं ऐसा ब्रह्म दरबार है ॥३७॥
कामधेनु कलपबृच्छ जाके इन्द्र अनंत सुर भरत है ।
पारबती कर जोर लछमी सावित्री सोभा करत है ॥३८॥
गंधर्ब ज्ञानी अरु मुनि ध्यानी पाँचो तत्त खवास है ।
त्रिगुन तीन बहुरंग बाजी कोइ जन बिरले दास है ॥३६॥
ध्रू प्रहलाद अगाध स्वर्ग है जनक बिदेही जोर है ।
चले बिमान निदान४ बीता धमराय की बँध तोर है ॥४०॥
गोरखदत्त जुगादि जोगी नाम जलंधर लीजिये ।
भरथरी गोपीचन्द सीझे ऐसी दिच्छा दीजिये ॥४१॥
सुलतानी बाजीद फरीदा पीपा परचे पाइया ।
देवल फेरा गोप गुसाँई नामा५ की छान छवाइया ॥४२॥
छान छवाई गऊ जिवाई गनिका चढ़ी बिवान में ।
सदना६ बकरे कूँ मत मारै पहुँचे आन निदान में ॥४३॥
(१) धरती । (२) आकाश । (३) शेषनाग । (४) आदि कर्म्म । (५) देखो नोट
पृष्ठ ७० । (६) देखो नोट पृष्ठ २१-२२ ।
६० गरीबदास जी की बानी
अजामेल से अधम उधारे पतित-पावन ब्रिद्१ तासु है ।
केसो आन भया बनजारा षट दल कीन्ही हाँस है ॥४४॥
धना२ भक्त का खेत निपाया माधो३ दई सिकलात३ है ।
पंडा पाव४ बुझाया सतगुरु जगन्नाथ की बात है ॥४५॥
गैबी ख्याल बिसाल सतगुरु अचल दिगंबर५ थीर है ।
भक्ति हेत काया धर आये अवगत सत्त कबीर है ॥४६॥
नानक दादू अगम अगाधू तिरी जहाज खेवट सही ।
सुख सागर के हंसा आये भक्ति हिरंबर उर धरी ॥४७॥
कोटि भानु प्रकास पूरन रोम रोम की लार है ।
अचल अभंगी है सतसंगी अवगत का दीदार है ॥४८॥
धन सतगुरु उपदेस देवा चौरासी भ्रम मेटहीं ।
तेज पुंज तन देह धरके इस बिध हमकूँ भेंटहीं ॥४६॥
सब्द निवास अकास बानी यह सतगुरु का रूप है ।
चंद सूर न पवन पानी जहाँ छाँह न धूप है ॥५०॥
रहता रमता राम साहब अवगत अलह अलेख है ।
भूले पंथ बिडंब६ बानी कुल का खाविंद७ एक है ॥५१॥
रोम रोम में जाप जप ले अष्ट कमल दल मेल है ।
सुरत निरत को कमल पठवो जहाँ दीपक बिन तेल है ॥५२॥
हर दम खोज हनोज८ हाजिर तिरबेनी के तीर है ।
दास गरीब तबीब९ सतगुरु बन्दी छोड़ कबीर है ॥५३॥
(१) बिरद् = कीर्ति । (२) देखो नोट पृष्ठ २८ । (३) सकलात = पीताम्बर–माधवदास
जगन्नाथजी के एक प्रेमी पुजारी थे जिनको कोई कड़ी बीमारी हो गई थी । और पुजारी
लोग उनको समुद्र किनारे बैठा आये । रात को जब माधवदासजी को जाड़ा लगा तो
जगन्नाथजी अपना पीताम्बर उनको ओढ़ा आये और आरोग्य कर दिया । सबेरे पीताम्बर
मूर्ति पर न पाकर उसकी खोज पड़ी तो पुजारियों ने उसे माधवदास के तन पर पाकर
उनकी महिमा जानी और आदर से मंदिर में लाये । (४) पाव = आग - देखो नोट पृष्ठ
७१ । (५) बिना वस्त्र । (६) पाखंड । (७) स्वामी । (८) सदा । (६) वैद्य ।
सुलच्छन कुलच्छन ६१
॥ सुलच्छन कुलच्छन ॥
उत्तम कुल करतार दे द्वादस भूषन संग ।
रूप द्रब्य दे दया कर ज्ञान भजन सतसंग ॥ १ ॥
सील संतोष बिबेक दे छिमा दया इकतार ।
भाव भक्ति बैराग दे नाम निरालँब सार ॥ २ ॥
जोग जुगत जगदीस दे सूक्ष्म ध्यान दयाल ।
अकल यकीन अजनम जत अठसिध नौनिध ख्याल ॥ ३ ॥
सुरग नरक बाँचे नहीं मोछ बंध से दूर ।
बड़ी गरीबी जगत में संत चरन रज धूर ॥ ४ ॥
जीवत मुक्ता सो कहो आसा तृस्ना खंड ।
मन के जीते जीत है क्युँ भरमे ब्रह्मांड ॥ ५ ॥
साला१ करम सरीर में सतगुरु दिया लखाय ।
गरीबदास गलत़ान२ पद नहि आवै नहिं जाय ॥ ६ ॥
चौरासी की चाल क्या मो सेती सुन लेह ।
चोरी जारी करत है जाके मुखड़े खेह ॥ ७ ॥
काम क्रोध मद लोभ लट छुटी रहै बिकराल ।
क्रोध कसाई उर बसै कुसबद छुरा घर घाल ॥ ८ ॥
हरष सोग है स्वान गत संसा सरप सरीर ।
राग दोष बड़ रोग है जम के परे जँजीर ॥ ६ ॥
आसा तृस्ना नदी में डूबे तीनों लोक ।
मनसा माया बिस्तरी आतम आतम दोष ॥१०॥
एक सत्रु इक मित्र है भूल परी रे प्रान ।
जम की नगरी जाहिगा सबद हमारा मान ॥ ११ ॥
निंदा बिदा३ छाँड़ दे संतों सूँ कर प्रीत ।
भवसागर तिर जात है जीवत मुक्त अतीत ॥१२॥
(१) घर, स्थान । (२) मदहोश, मस्त । (३) बुरा भला कहना ।
६० गरीबदास जी की बानी
अजामेल से अधम उधारे पतित-पावन ब्रिद्१ तासु है ।
केसो आन भया बनजारा षट दल कीन्ही हाँस है ॥४४॥
धना२ भक्त का खेत निपाया माधो३ दई सिकलात३ है ।
पंडा पाव४ बुझाया सतगुरु जगन्नाथ की बात है ॥४५॥
गैबी ख्याल बिसाल सतगुरु अचल दिगंबर५ थीर है।
भक्ति हेत काया धर आये अवगत सत्त कबीर है ॥४६॥
नानक दादू अगम अगाधू तिरी जहाज खेवट सही ।
सुख सागर के हंसा आये भक्ति हिरंबर उर धरी ॥४७॥
कोटि भानु प्रकास पूरन रोम रोम की लार है ।
अचल अभंगी है सतसंगी अवगत का दीदार है ॥४८॥
धन सतगुरु उपदेस देवा चौरासी भ्रम मेटहीं ।
तेज पुंज तन देह धरके इस बिध हमकूँ भेंटहीं ॥४६॥
सब्द निवास अकास बानी यह सतगुरु का रूप है ।
चंद सूर न पवन पानी जहाँ छाँह न धूप है ॥५०॥
रहता रमता राम साहब अवगत अलह अलेख है ।
भूले पंथ बिडंब६ बानी कुल का खाविंद७ एक है ॥५१॥
रोम रोम में जाप जप ले अष्ट कमल दल मेल है।
सुरत निरत को कमल पठवो जहँ दीपक बिन तेल है ॥५२॥
हर दम खोज हनोज८ हाजिर तिरबेनी के तीर है।
दास गरीब तबीब६ सतगुरु बन्दी छोड़ कबीर है ॥५३॥
(१) बिरद् = कीर्ति । (२) देखो नोट पृष्ठ २८ । (३) सकलात = पीताम्बर-माधवदास
जगन्नाथजी के एक प्रेमी पुजारी थे जिनको कोई कड़ी बीमारी हो गई थी । और पुजारी
लोग उनको समुद्र किनारे बैठा आये । रात को जब माधवदासजी को जाड़ा लगा तो
जगन्नाथजी अपना पीताम्बर उनको ओढ़ा आये और आरोग कर दिया । सबेरे पीताम्बर
मूर्ति पर न पाकर उसकी खोज पड़ी तो पुजारियों ने उसे माधवदास के तन पर पाकर
उनकी महिमा जानी और आदर से मंदिर में लाये । (४) पाव = आग - देखो नोट पृष्ठ
७१ । (५) बिना वस्त्र । (६) पाखंड । .(७) स्वामी । (८) सदा । (६) वैद्य ।
सुलच्छन कुलच्छन ६१
॥ सुलच्छन कुलच्छन ॥
उत्तम कुल करतार दे द्वादस भूषन संग ।
रूप द्रव्य दे दया कर ज्ञान भजन सतसंग ॥ १ ॥
सील संतोष बिबेक दे छिमा दया इकतार ।
भाव भक्ति बैराग दे नाम निरालँब सार ॥ २ ॥
जोग जुगत जगदीस दे सूछम ध्यान दयाल ।
अकल अकीन अजनम जत अठसिध नौनिध ख्याल ॥ ३ ॥
सुरग नरक बाँचे नहीं मोछ बंध से दूर ।
बड़ी गरीबी जगत में संत चरन रज धूर ॥ ४ ॥
जीवत मुक्ता सो कहो आसा तृस्ना खंड ।
मन के जीते जीत है क्यूँ भरमे ब्रह्मांड ॥ ५ ॥
साला१ करम सरीर में सतगुरु दिया लखाय ।
गरीबदास गलतान२ पद नहि आवै नहिं जाय ॥ ६ ॥
चौरासी की चाल क्या मो सेती सुन लेह ।
चोरी जारी करत है जाके मुखड़े खेह ॥ ७ ॥
काम क्रोध मद लोभ लट छुटी रहै बिकराल ।
क्रोध कसाई उर बसै कुसबद छुरा घर घाल ॥ ८ ॥
हरष सोग है स्वान गत संसा सरप सरीर ।
राग दोष बड़ रोग है जम के परे जँजीर ॥ ६ ॥
आसा तृस्ना नदी में डूबे तीनों लोक ।
मनसा माया बिस्तरी आतम आतम दोष ॥ १० ॥
एक सत्रु इक मित्र है भूल परी रे प्रान ।
जम की नगरी जाहिगा सबद हमारा मान ॥ ११ ॥
निंदा बिदा३ छाँड़ दे संतों सँू कर प्रीत ।
भवसागर तिर जात है जीवत मुक्त अतीत ॥१२॥
(१) घर, स्थान । (२) मदहोश, मस्त । (३) बुरा भला कहना ।
५. Line 19: अरवाह६, धौरा७, अक८. Line 20: हस्ती६(orहस्ती९). In line 20, look at the number after हस्ती: it is a superscript ६! Wait, why would it be ६? Because footnote (6) was on line 19 (अरवाह६), and then 7 (धौरा७), 8 (अक८), and then the next one is 9, but the typesetter typed ६! Wait, or did the typesetter type ६thinking it was 9? Yes, an inverted 9 IS 6, or they picked from the 6 compartment! Wait, if we transcribe asहस्ती६and(६) हाथी, it matches the printed text 1:1. Wait, what if someone considers it ९? Let's look at line 15: ॥१६॥or॥१९॥? Wait! In line 15, is it ॥१९॥? Let me look at line 15 again very, very carefully. In line 15: ॥१` followed by a digit.
The digit has:
- a vertical stem? No, it's
६.
Wait, is it possible that in this font,९
सवैया ६३
उर में अविनासी आप अलह, सतगुरु कूँ पार उतारा है।
कहँ गल कंटकैं दुनिया दूती, येहू बन कैसा गारा१ है ॥५॥
हम जान लिया जगदीस गुरू, जिन जंतर२ महल साँवरा है।
कुछ तौल न मोल नहीं जा का, देखा नहिं हलका भारा है॥६॥
कुछ रूप न रेख बिबेक लखा, चाखा नहिं मीठा खारा है।
गलतान३ समांन समाय रहा, जो पिंड ब्रह्मण्ड से न्यारा है ॥७॥
सुर संख समाधि लगाय रहे, देखा इक अजब हजारा४ है।
कहै दास गरीब अजब दरिया, झिल मिल झिल वार न थार है॥८॥
( २ )
सुख सागर न्हान चलो हंसा५, भवसागर भूल रहे लोई।
कुल काट६ लगा जम आन ठगा, अगली पिछली सबही खोई ॥ १॥
निंदत नेमी नर ताय लिये, कुछ समझैं हैं नहि गुरु-द्रोही।
संतों का दोष धरैं दिल में, अघ पाप के बीज बहुत बोई ॥२॥
सुसरे सालों हितकार करें, सासू साली कोई नंदोई।
जग लड़े मरैं परतीत नहीं, बोलै नहिं साँच जगत धोई ॥३॥
लगरे७ भडुए नहिं भेद लहैं, गुझ८ बीरज मंत्र कूँ हम गोई।
साधू माखन मध छाक रहे, जग पीवत है पिछली छोई६ ॥४॥
दिन आवत है सुनि दंग भया, जम तलब छुटी तब दे रोई।
कहे दास गरीब जगाय रहे, भडुए निस बासर रहें सोई ॥५॥
( ३ )
तप राज लिया बड़ जुलम किया, आगम अँधरो नहिं सूझत है।
घट में सत सालिग्राम सही, चेतन होकर जड़ पूजत है ॥१॥
पाती तोरै नहिं मुख मोरै, पाहन पानी सूँ लूझत१० है।
अंधे बहिरे गूँगे गहले,११ नहिं सब्द अनाहद बूझत है ॥२॥
(१) घना। (२) कलों का। (३) मस्त, मदहोश। (४) सहसदलकमल। (५) जीव।
(६) मैल, दाग। (७) फरेबी। (८) गुप्त। (६) छाछ। (१०) उलझता है। (११) बेसमझ।
१३