गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
बिनती का अंग ४१
ऊँची भुमि अकास मठ जहँ जाय न कोई।
सुरत निरत से अगम है धुन ध्यान समोई ॥१२१॥
दरस परस देवल धजा फरकै दिन राती।
जोत अखंडित जगमगै दीपक बिन बाती ॥१२२॥
नभ से न्यारा नूर है झीने से झीना।
ज्ञान ध्यान की गम नहीं परखै परबीना ॥१२३॥
संख कलप जुग होगये जो टरै न टारा।
खड़ग बान बेधे नहीं है अधर अधारा ॥१२४॥
पत्थर में हीरा चलै धन धरती जानै।
लाख लोग पासै खड़े दरसत पाषानै ॥१२५॥
सात आवरण बेधिहै जो पावै हीरा।
काया में से उड़ चले पलकों के तीरा ॥१२६॥
उरगन¹ हीरा गह लिया सुरती घर आना।
सेत धजा देवल खिमै² जहँ कोट निसाना ॥१२७॥
कमल रूप करतार है नैनों के माहीं।
सातो कमल सरीर में वह न्यारा साँई ॥१२८॥
जागत सोवत है नहीं कछु खाय न पीवै।
चिरंजीव चिंतामनी जो बहु जुग जीवै ॥१२९॥
काल कर्म आगे खड़े लावै जिस लागै।
भगली भगल उचारिहै बिद्या अनुरागै ॥१३०॥
काल कर्म आगे खड़े नित नाच कराहीं।
भगली भावै सो करै जा की गम नाहीं ॥१३१॥
पलक बीच पैमाल³ है सब खंड ब्रह्मंडा।
अजब नबेली मेदनी⁴ छिन में परचंडा ॥१३२॥
ब्रह्मा बिस्नु महेस से कँपैं दिन राती।
निर्दावै⁵ सोई भये जिस काल न खाती ॥१३३॥
(१) साँप । (२) झलकै । (३) नाश (४) पृथ्वी (५) निर्भय ।
४२ गरीबदास जी की बानी
अनंत कोटि ब्रह्मांड का चरबन कर लेई ।
महा काल की दाढ़ में आवे सब कोई ॥१३४॥
काल डरै करतार से कर बंधन जोड़ी ।
संख असंखौ चल गये सिव बिस्नु करोड़ी ॥१३५॥
अकल पुरुष साहब धनी अविगत अविनासी ।
गरीबदास सरना लिया काटो जम फाँसी ॥१३६॥
॥ कुसंगत का अंग ॥
कमल फूल मन भँवर है काँटा कर्म कुसंग ।
पाँच विषय सूँ बँध रहा कैसे लागे रंग ॥१॥
काया सरवर मीन मन दसौ दिसा कूँ जाय ।
विषय लहर दिल देह में भगति न रंच१ सुहाय ॥२॥
कुटिल बासना कमल२ में पावत नहीं मुराद ।
मरजीया३ मन कूँ करै जहँ पथ अगम अगाध ॥३॥
सुरभी४ बँधी चमार के ब्राह्मन बोई भाँग ।
चंदन खर के लेपिये कुंदन बदले राँग ॥४॥
कर्म कटारी बाँध के करै भारथी जंग५ ।
अपने सिर लेवै नहीं प्राछित सौंपै गंग ॥५॥
तरन तारनी बकस दे हमरे प्राछित काट ।
पारब्रह्म सूँ ऊलमै परभी न्हावै घाट ॥६॥
बगुला हंसा एक सर एकै रूप रसाल ।
वह सरवर मोती चुँगै वह मच्छी का काल ॥७॥
सीप पियत है स्वाँति कूँ बिच है खारी नीर ।
माहें मोती नीपजै करनी बंध सरीर ॥८॥
(१) कुछ । (२) हृदय । (३) गोताखोर । (४) गाय । (५) महाभारत
सरीखी लड़ाई ।
नग फूटा बिकता नहीं सारा लीजै सोध ।
हीरा पत्थर में बसै धन धरती ले खोद ॥९॥
कदली माँह कपूर है गज मोती अँदरून ।
चुभक चिड़ैया चोंच भर पैठे गज नाखून ॥१०॥
यौ तो सतसँग तुझ कहा कुसँग कहूँ भय भीत ।
स्वाँति पड़े जो सरप मुख करता जहर अनीति ॥११॥
भूम पड़े जैसा फलै सुर की संगत कीन ।
नीचन मुख नहि देखना ना कोइ मिलै कुलीन ॥१२॥
लोहे चुम्बक प्रीतड़ी¹ दोनौँ जड़ जगदीस ।
चेतन चेतन तें मिलै ल्हीस मिलत है ल्हीस ॥१३॥
रूमी² बस्तर अंतरा लोहा पारस बीच ।
चार जुगन मेला नहीं रहते निकट नगीच ॥१४॥
ऐसा नीच न जान दे साहब के दरबार ।
समझत नहिं अज्ञान बुध लग रहे करम लगार ॥१५॥
करम भरम भारी लगे मनसा चंचल चाव ।
बुध बेधै नहिं सुरत सत महल न लगे लगाव ॥१६॥
पिंग
४६ गरीबदास जी की बानी
ज्यों कुंजर सिर धुनत है अगला१ जनम सुभंत ।
अबकी हेले२ नर करे तो सेऊँ पूरे संत ॥१८॥
राज दुवारे जाय कर रापत३ रोवै काहि ।
पग जंजीर न डारिये कजली बन कूँ जाहि ॥१९॥
सीस महावत बसत है अंकुस मोड़ समोड़ ।
बचन फिरत है पलक में साँईं नहीं लोड़४ ॥२०॥
ऐसा हाफिज५ फील है रहत गयंद गियान ।
राज दुवारे बन्धिया बिन साँईं के ध्यान६ ॥२१॥
सुन्न समुद जो मन रहै तो नहि भरमै प्रान ।
अरस कुरस से भिन्न है देखे अकल अमान ॥२२॥
सुन्न सरोवर सिखर सर सूभर७ तालम ताल ।
मन मरजीया छोड़िये लावै हीरा लाल ॥२३॥
सुन्न सरोवर सैर कर गगन उड़ाना मन्न ।
अगम भूमि भूलै नहीं लावै नाम रतन ॥२४॥
सुन्न सिखर संगत करै मूलै खोज न पंथ ।
संगत का अंग ४७
जनम पुरबला सूझई जरिहैं बारंबार ।
बिषय बासना उर बसै तक कूँ करिहैं छार ॥२९॥
सती न संका जरन की काम लुब्ध१ घट बीच ।
सकल सखी झूलन चलीं जैसे सावन तीज ॥३०॥
जनम इकीस जो सँग जरै तौ स्वर्गापुर बास ।
मन इच्छा फल पावहीं पुरुष समीप निवास ॥३१॥
नारी पुरुष पिरेम सँू बैठे स्वर्ग अकास ।
नव करोर दिब२ बरस लग पुरवत मन की आस ॥३२॥
करनी भरनी भुगत कर पैठत हैं मृत लोक ।
बिना भगित भावै नहीं सब संगत में दोष ॥३३॥
तपी तपै तन कूँ दहै पाँचो इंद्री साध ।
नहिं इच्छा दीदार की भूले आदि अनाद ॥३४॥
लाख बज्र कूँ झेल कर सूरे जूझैं खेत ।
बादी जोगी हठ करें चिनगी बरखै रेत ॥३५॥
बादी जोगी बँध रहा मन इच्छा बड़ राज ।
अंत बेर यों मारिये ज्यों तीतर पर बाज ॥३६॥
तन तो बाँबी हो गया मन की गई न बान ।
स्वर्ग पहुँच दोजख गये सतगुरु लगे न कान ॥३७॥
तन की तारी लावई मनसा जरै मसाल ।
राज पाय नरकै परै बाँधी पोट जवाल३ ॥३८॥
पाँचो इंद्री मन लठा फिरता डाँवाँडोल ।
सप्तपुरी का राज तज लगे तपस्या झोल ॥३९॥
तप से धीर न होत है यह मन रंगा राज ।
साहब की नहिं बंदगी साजा झूठा साज ॥४०॥
(१) लोभ । (२) देवताओं का बरस । (३) खराबी ।
४४ गरीबदास जी की बानी
सतगुरु संगत सार है सकल कुसँंग सब जीव ।
पानी में निकसै नहीं अनेक जतन कर घीव ॥२२॥
परमानंद से बिछुड़ता यह मन हंसा काग ।
मुक्ति नहीं सतगुरु बिना कहाँ छिपै लै दाग ॥२३॥
कमरी के रंग ना चढ़ै कोइला नहीं सफेद ।
सतगुरु बिन सूझै नहीं कहा पढ़त है बेद ॥२४॥
कौड़ी बदले जात है यह मानिक नग हंस ।
पाँचो सेती बँध रहा जुग जुग होत बिधंस ॥२५॥
पाँच पचीस कुसंगनी सुन्न सिखर नहिं न्हाहिं ।
सतगुरु सूँ मेला नहीं यों चौरासी जाहिं ॥२६॥
सतगुरु सूरत नगर से आये हैं बड़ काज ।
काम कदर जानै नहीं हंसा चढ़ै जहाज ॥२७॥
कस्तूरी को बासना मिरगा लेत सुबास ।
निरख परख आवै नहीं बहुरि ढँढोरै घास ॥२८॥
कस्तूरी महकंत है साहब है संबूह ।
नौका चढ़ै न नाम की अंधे डूबत कूँह ॥२६॥
॥ संगत का अंग ॥
संगत कीजै साध की संसारी भटकंत ।
पिंजर सूआ बसत है किस कूँ बूझै पंथ ॥ १ ॥
सतगुरु की संगत भली हंसा थीर मुकाम ।
जुगन जुगन के बीछुरे परसे लोक निदान ॥ २ ॥
साधौँ की संगत करै बड़ भागी बड़ देव ।
आपन तौ संसा नहीं और उतारै खेव ॥ ३ ॥
संगत सुर की कीजिये असुर न आवै होस ।
बुध भ्रष्टी सूँ संग क्या उलटा देही दोस ॥ ४ ॥
संगत सुर की कीजिये असुरन सूँ क्या हेत ।
डार मूल पावै नहीं ज्यों मूली का खेत ॥ ५ ॥
संगत का अंग ४५
संगत सुर की जो रहै असुरों की है गंध।
सुर हैं स्वर्गलोक के असुर मलीने जिंद ॥६॥
सूआ सतगुरु कहत है पिंजरे परे परान।
खिड़की खुलते उड़ गया मंतर लगा न कान ॥७॥
अंतर हेत न प्रीत पद सूए ज्यों संसार।
पिंजरा खाली तासु का उड़ गया बनों मँझार ॥८॥
सत गुर दत दाता१ कहै बानी बड़ी बलंद।
मुख बोले क्या होत है अंतर हेत न अंध ॥६॥
सुअटा खाली रह गया पार पहुँचा नाहिं।
राम राम प्रानी कहै जम की नगरी जाहिं ॥१०॥
सुअटा पढ़ै सुभान गत अंतर नहीं उचार।
कुंज२ कुरल३ अंड पोखहीं कोसन सहस हजार ॥११॥
कुरल अंड हर हेत जप अललपच्छ गहि तार।
हिरदा सुद्ध सरीर सर४ कच्छप दृष्ट निहार ॥१२॥
ऐसी संगत जो मिलै तौ सांई सूँ भेट।
ऊपरली बरबाद है जम मारैगा फेट ॥१३॥
कुरला कच्छप अलल कूँ किन समझाया ज्ञान।
आड़ा परदा है नहीं हिरदे अंतर ध्यान ॥१४॥
ऐसी संगत जो मिलै भगत गर्भ प्रहलाद५।
नारद से सतगुरु मिलैं सूझै अगम अगाध ॥१५॥
सुकदे गर्भ जोगेश्वर५ ध्रुव का ध्यान अमान।
लाख बरस के बह गये पाँच बरस परवान ॥१६॥
जैसे मीन समुद्र में दसो दिसा कूँ जाय।
हृदय कमल में पैठ कर जो खोजै सो पाय ॥१७॥
(१) तोता के पढ़ाने की बोली। (२) कुंजबन चिड़िया। (३) कोक चिड़िया।
(४) तालाब। (५) कहते हैं कि प्रहलाद और सुकदेव माँ के पेट से भक्त पैदा हुए।
७
४६ गरीबदास जी की बानी
ज्यों कुंजर सिर धुनत है अगला१ जनम सुझंत ।
अबकी हेले२ नर करे तो सेऊँ पूरे संत ॥१८॥
राज दुआरे जाय कर रापत३ रोवै काहि ।
पग जंजीर न डारिये कजली बन कूँ जाहि ॥१९॥
सीस महावत बसत है अंकुस मोड़ समोड़ ।
बचन फिरत है पलक में साँईं नाहीं लोड़४ ॥२०॥
ऐसा हाफिज५ फील है रहत गयंद गियान ।
राज दुआरे बन्धिया बिन साँईं के ध्यान६ ॥२१॥
सुन्न समुद जो मन रहै तो नहि भरमै प्रान ।
अरस कुरस से भिन्न है देखे अकल अमान ॥२२॥
सुन्न सरोवर सिखर सर सूभर७ तालम ताल ।
मन मरजीया छोड़िये लावै हीरा लाल ॥२३॥
सुन्न सरोवर सैर कर गगन उड़ाना मन्न ।
अगम भूमि भूलै नहीं लावै नाम रत्न ॥२४॥
सुन्न सिखर संगत करै मूलै खोज न पंथ ।
फेर उलट हटिहै नहीं रावत जेहा दंत८ ॥२५॥
सती पुकारै सर९ चढ़ी मुख बोलत है राम ।
कौतुक देखन सो गये जिनके मन सहकाम ॥२६॥
सती जरै अरु सर जरै कौतुक१० देखनहार ।
धाम जहाँ का तहाँ है मिलै रूप संसार ॥२७॥
सती बहुर उपजै नहीं घर जाने की प्रीत ।
सती रटत है राम कूँ कौतुक गावै गीत ॥२८॥
(१) पुरवला । (२) बार । (३) हाथी । (४) इच्छा । (५) कुरान को याद किये हुए ।
(६) मशहूर है कि हाथी को अपना पिछला जन्म याद रहता है कि मैं कौन था और
भगवन्त को भूल जाने से पशु जोनि पाई इसी सोच में हाथी खड़ा खड़ा अपना शरीर
और सिर धुनता है और प्रण करता है कि अगले जन्म में जो दया से मनुष्य तन पाऊँगा
तो मालिक को कभी न बिसारूँगा । (७) शुभ्र = प्रकाशमान । (८) जैसे हाथी के दाँत
बाहर निकले हुए फिर भीतर नहीं पैठते । (९) चिता । (१०) तमाशाई ।
संगत का अंग ४७
जनम पुरबला सूझई जरिहैं बारंबार ।
बिषय बासना उर बसै तक कूँ करिहैं छार ॥२६॥
सती न संका जरन की काम लुब्ध१ घट बीच ।
सकल सखी झूलन चलीं जैसे सावन तीज ॥३०॥
जनम इक्कीस जो सँग जरै तौ स्वर्गापुर बास ।
मन इच्छा फल पावहीं पुरुष समीप निवास ॥३१॥
नारी पुरुष पिरेम सँू बैठे स्वर्ग अकास ।
नव करोर दिब२ बरस लग पुरवत मन की आस ॥३२॥
करनी भरनी भुगत कर पैठत हैं मृत लोक ।
बिना भगित भावै नहीं सब संगत में दोष ॥३३॥
तपी तपै तन कूँ दहै पाँचो इंद्री साध ।
नहिं इच्छा दीदार की भूले आदि अनाद ॥३४॥
लाख बज्र कूँ झेल कर सूरे जूझैं खेत ।
बादी जोगी हठ करें चिनगी बरखै रेत ॥३५॥
बादी जोगी बँध रहा मन इच्छा बड़ राज ।
अंत बेर यों मारिये ज्यों तीतर पर बाज ॥३६॥
तन तो बाँबी हो गया मन की गई न बान ।
स्वर्ग पहुँच दोजख गये सतगुरु लगे न कान ॥३७॥
तन की तारी लावई मनसा जरै मसाल ।
राज पाय नरकै परै बाँधी पोट जवाल३ ॥३८॥
पाँचो इंद्री मन छठा फिरता डाँवाँडोल ।
सप्तपुरी का राज तज लगे तपस्या झोल ॥३६॥
तप से धीर न होत है यह मन रंगा राज ।
साहब की नहिं बंदगी साजा झूठा साज ॥४०॥
(१) लोभ । (२) देवताओं का बरस । (३) खराबी ।
४८ गरीबदास जी की बानी
तप तारी तन में लगी परगन१ की तकसीस ।
साहब की नहिं बंदगी सतगुरु ना बकसीस ॥४१॥
मन इच्छा नित तू करै राज करन मन लोभ ।
बहु विध घट में कामना ज्यों बिरछा पर गोभ२ ॥४२॥
सँगत कुसंगत अंतरा इकसाँ ही मत जान ।
ज्यों सोवत है सेज पर त्यों धरे अंत मसान ॥४३॥
पारख३ प्रेम न आवही ना कहिं हाट जुखंत ।
सौदा तबहीं होत है भेटैं सतगुरु संत ॥४४॥
जैसे माता गर्भ को राखै जतन बनाय ।
ठेस लगै तो छीन है ऐसे भगति दुराय४ ॥४५॥
दम सुमार आधार रख पलकों मद्ध धियान ।
संतों की संगति करै समझ बूझ गुरु ज्ञान ॥४६॥
इड़ा पिंगला सोध कर चढ़ गिरवर कैलास ।
दो दल की घाटी जहाँ भगल बिदाहै२ दास ॥४७॥
ब्रह्म रंध्र के द्वार को खोलत है कोइ एक ।
द्वारे से फिर जात हैं ऐसे बहुत अनेक ॥४८॥
संख भगल छल होत है नद है परले पार ।
संगत सतगुरु की करै तब पावै दीदार ॥४६॥
संसारी सूँ साख क्या ऊसर बरषा देख ।
बोवै बीज न खेत हित तो क्या काटै मेख ॥५०॥
नाम रते निरगुन कला मानस नहीं मुरार६ ।
ज्यों पारस लोहा लगै कटिहै करम लगार ॥५१॥
॥ बैराग का अंग ॥
बैराग नाम है त्याग का पाँच पचीसौ माहिं ।
जब लग संसा सरप है तब लग त्यागी नाहिं ॥ १ ॥
(१) परगना । (२) नया कुला । (३) परखने में । (४) छिपाय । (५) घास निकालने
के लिए खेत को फिर से जोतने का नाम । (६) मुराद ।
बिनती का अंग ४६
बैराग नाम है त्याग का पाँच पचीसौ संग ।
ऊपर की केंचुल तजी अंतर बिषय भुअंग ॥ २ ॥
असन बसन सब तज गये तज गये गाँव गिरेह ।
माहें संसा मूल है दुरलभ तजना येह ॥ ३ ॥
बाज कुही१ गत ज्ञान की गगन गरज गरजंत ।
लूटै सुन्न अकास तें संसा सरप भछंत ॥ ४ ॥
नित ही जामै नित मरै संसय माहिं सरीर ।
जिनका संसा मिट गया सो पीरन सिर पीर ॥ ५ ॥
ज्ञान ध्यान दो सार है तीजे तत्त अनूप ।
चौथे मन लागा रहै सो भूपन सिर भूप ॥ ६ ॥
कासी करवत लेत है आन कटावै सीस ।
बन बन भटका खात है पावत ना जगदीस ॥ ७ ॥
संसा तो संसार है तन पर धारै भेख ।
मरकब२ होहिं कुम्हार के सन्यासी अरु सेख ॥ ८ ॥
मन की भीनी ना तजी दिलही माहिं दलाल ।
हर दम सौदा करत है करम कुसङ्गति काल ॥ ६ ॥
मन सेती खोटी गढ़ै तन सूँ सुमिरन कीन ।
माला फेरे क्या हुआ दुर कुट्टन बेदीन ॥ १० ॥
तन मन एक वजूद कर सुरत निरत लौ लाय ।
बेड़ा पार समुद्र होइ एक पलक ठहराय ॥ ११ ॥
दृष्टि पड़े तो फना३ है धर४ अंबर५ कैलास६ ।
किरतम बाजी झूठ है सुरत समोवो स्वाँस ॥ १२ ॥
सुरत स्वाँस कूँ एक कर कंज७ किनारे लाय ।
जा का नाम बिराग है पाँच पचीसो खाय ॥ १३ ॥
(१) शिकरा । (२) कुम्हार के लादने के जानवर यानी गधे । (३) नाश होने वाला
है । (४) धरती । (५) आकाश । (६) स्वर्गादि । (७) शिव-नेत्र ।
५० गरीबदास जी की बानी
पाँच पचीसो भून कर बिरह अगिन तन जार ।
सो अबिनासी ब्रह्म है खेलै अधर अधार ॥१४॥
त्रिकुटी आगे झूलता बिनहीं बाँस¹ बरंत² ।
अजर अमर आनंद पद परखै सुरत निरंत ॥१५॥
यह महिमा कासे कहूँ नैनों माहीं नूर ।
पल पल में दीदार है सुरत सिंधु भरपूर ॥१६॥
झीना दरसै दास को पुहुप रूप परमान ।
बिन ही बेली गहबरे³ है सो अकल⁴ अमान ॥१७॥
अकल अभूमी⁵ आदि है जा के नाहीं अंत ।
दिलही अंदर देव है निर्मल निर्गुन तंत ॥१८॥
तन मन सेती दूर है माहैं मंझ मिलाप ।
तरवर छाया बिरिछ में है सो आपै आप ॥१६॥
नौ तत के तो पाँच हैं पाँच तत्त के आठ ।
आठ तत्त का एक है गुरू लखाई बाट ॥२०॥
चार पदारथ एक कर सुरत निरत मन पौन ।
असल फकीरी जोग यह गगन मॅडल कूँ गौन ॥२१॥
पंछी घाला आलना⁶ तरवर छाया देख ।
गरभ जून के कारने मन में किया विवेक ॥२२॥
जैसे पंछी बन रमा संझा ले बिसराम ।
प्रात समय उड़ जात है सो कहिये निःकाम ॥२३॥
जा के नाद न बिंदु है घट मठ नहीं मुकाम ।
गरीबदास सेवन करै आदि अनादं राम ॥२४॥
॥ लै का अंग ॥
लै⁷ लागी तब जानिये जग सँ रहै उदास ।
नाम रटै निरभय कला हर दम हीरा स्वाँस ॥ १ ॥
(१) खंभा । (२) रस्सी । (३) घने पेड़ । (४) अकाल । (५) बेठौर । (६) खोता लगाया । (७) लौ ।
लै का अंग ५१
लै लागी तब जानिये जग सूँ रहै उदास ।
नाम रटै निरदुंद होय अनहदपुर में बास ॥ २ ॥
लै लागी तब जानिये हरदम नाम उचार ।
एकै मन एकै दिसा साँई के दरबार ॥ ३ ॥
लै लागी तबै जानिये हरदम नाम उचार ।
एकै मन एकै दिसा खड़ा रहै दरबार ॥ ४ ॥
लै लागी तब जानिये हर दम नाम उचार ।
धीरे धीरे होयगा वह अल्लह दीदार ॥ ५ ॥
लै लागी तब जानिये हर दम नाम हनोज ।
बिकट पंथ पावै नहीं मौनी केसा खोज १॥ ६ ॥
लै लागी तब जानिये हर दम नाम हनोज ।
मैं मेरी कूँ पटक दे सिर से डारो बोझ ॥ ७ ॥
लै लागी तब जानिये लै की लगै दुकान ।
ले लँगर २ सौदा करै छाँड़ महातम मान ॥ ८ ॥
लै लागी तब जानिये लै की लगै दुकान ।
बखत परे सौदा करै कोठे डारै ज्ञान ३ ॥ ९ ॥
महँगा सस्ता देख ले सौदा करै बिचार ।
दुगुने तिगुने चौगुने करिहै साहूकार ॥ १०॥
महँगा सस्ता देख ले सौदा करै समोय ४।
दूने तिगुने चौगुने कर ले जाता कोय ॥ ११॥
पूँजी साहूकार की बंजारा संसार ।
पूँजी माल गँवाइया नाहक बहै बिगार ॥ १२॥
ये पुरपट्टन ये गली बहुरि न देखै आय ।
सतगुरु सूँ सौदा हुआ भर ले माल अघाय ॥ १३॥
(१) जैसे गूँगा किसी बेजाने हुए स्थान या मनुष्य की खोज में सैन से पूछै तो पता
नहीं लग सकता । (२ खैरात-खाना । (३) कोठे पर ज्ञान को पटक दे । (४) घुस कर ।
५२ गरीबदास जी की बानी
ये पुरपट्टन ये गली बहुरि न देखै आय।
सतगुरु सूं सौदा हुआ लीजै माल लदाय ॥१४॥
ये मुकते१ निज पैठ हैं ये मुकते बाजार।
सतगुरु सूं सौदा भया भरले बालद२ लार ॥१५॥
राम नाम निज सार है राम नाम निज मूल।
राम नाम सौदा करो राम नाम नहिं भूल ॥१६॥
इस दुनियाँ में आय कर इन चारों कूँ बंध।
काम क्रोध छोह चूहरा३ लोभ लपटिया अंध ॥१७॥
मोह मवासी पकर ले ममता का सिरताज।
दुरमत दामनगीर होइ निःचल नगरी राज ॥१८॥
ज्ञान जोग अरु भगित ले सील संतोष समाधि।
लै लागी तब जानिये छूटै सकल उपाधि ॥१९॥
ज्ञान जोग अरु भगित ले सील संतोष बिबेक।
लै लागी तब जानिये जब दिल आवै एक ॥२०॥
गगन गरज भाठी चुए हीरा घंटिक सार।
लै लागी तब जानिए उतरै नहीं खुमार ॥२१॥
गगन गरज भाटी झरै चोखा फूल चुअंत।
सिर के साँटे पाईये कोई साधु पिअंत ॥२२॥
गगन गरज घन बरषहीं बाजै दीरघ नाद।
अमरापुर आसन करैं जिन्ह के मते अगाध ॥२३॥
गगन गरज घन बरषहीं बाजै अनहद तूर।
लै लागी तब जानिये सन्मुख सदा हजूर ॥२४॥
गगन गरज घन बरषहीं दामिन खिमै अखंड।
दास गरीब कबीर है सकलदीप नौ खंड ॥२५॥
(१) अनेक। (२) बैल। (३) भंगी।
साँच का अंग ५३
॥ साँच का अंग ॥
साँचा सतगुरु जो मिलै हंसा पावै थीर।
झकझोले जूनी मिटै मुरसिद गहिर गंभीर ॥ १ ॥
साँचे कूँ तो साँच है कूड़े कूँ है कूड़।
बैल होत कंगाल का गल में पहरे जूड़ ॥ २ ॥
साँचे कूँ परनाम है झूठे के सिर दंड।
ठौर नहीं तिहुँ लोक में भरमत है नौ खंड ॥ ३ ॥
साँचे का सेवन करो झूठे कूँ ले लूट।
साँच सब्द सूँ यों डरै ज्यों स्याने की मूठ१ ॥ ४ ॥
साँचे का सुमिरन करो झूठे द्यो जंजाल।
साँचा साहब आप है झूठ कपट सब काल ॥ ५ ॥
साँचे के चरनों लगो झूठे का ल्यो सीस।
साँच सकल में रहेगा झूठ न बिस्वे बीस ॥ ६ ॥
साँचे कूँ सब सौंप द्यो भगित बंदगी नाम।
झूठा कपटी मारिये हमरे कौने काम ॥ ७ ॥
साँचे कूँ स्वर्गापुरी झूठा दोजख माहिं।
चंद सूर की आयु२ लग दोजख निकसै नाहिं ॥ ८ ॥
साँचे संकर रीझहीं ब्रह्मा जोड़ैं प्रीत।
बिसनू करैं प्रतिपाल हद३ सकल संत संगीत ॥ ६ ॥
साहब जिन्ह के उर बसै झूठ कपट नहिं अंग।
तिन्हका दरसन न्हान है कहँ परबी फिर गङ्ग ॥१०॥
साँचे के सन्मुख रहो झूठे सूँ क्या नेह।
संख जुगन जुग परैगी झूठे के मुख खेह ॥११॥
झूठा सब संसार है साँचा है सो एक।
पारब्रह्म सतपुरुष पद सब वसुधा४ की टेक ॥१२॥
(१) गुनी के जादू का बान। (२) आयुर्दाय। (३) बहुत। (४) पृथ्वी।
८
५४ गरीबदास जी की बानी
साँचे साँईं संत जन झूठे हैं सब लोक ।
मेढक मछली तड़फड़ै ज्यों ओछे जल जोंक ॥१३॥
साँचे सदा मसंद१ पर उस चंगे दरबार ।
झूठों के जूती पड़े जम किंकर की मार ॥१४॥
झूठे कपटी जीव सब साँचे संत सुजान ।
तिरबाचा छूटै नहीं झूठों ना कर कान ॥१५॥
साँचों के संग चालिये झूठों संग न जाह ।
रावन मिलता है नहीं बीभीखन की बाँह ॥१६॥
बीभीखन लंका दई रावन कटिहै मूड़ ।
साँचे साधू भँवर हैं झूठे गोबर भूढ़२ ॥१७॥
झूठा कंसा मारिये फिर चानूर चमार ।
रुकमिन कूँ ब्याहन गया सीस कटा सिसुपाल ॥१८॥
बालि सहस्राबाहु से मारे छाती तोर ।
साँचा जन प्रहलाद है झूठी जल गइ होरि३ ॥१६॥
हिरनाकुस के उदर कूँ नख से गेरा फार ।
निरगुन सूँ सरगुन भये धर नरसिंघ औतार ॥२०॥
द्रोपदि चीर बधाइया४ पीतांबर पटनाल ।
दूसासन से पच गये कौरों पड़ा जवाल५ ॥२१॥
दुर्जोधन की मेदनी होगई खंड बिहंड ।
द्रोनाचार्ज भीषम पिता बचे न धर सिर दंड ॥२२॥
गज अरु ग्राह उवारिया पसू जूनि सूँ संत ।
दान मेड़ छाँड़ी नहीं करन तुड़ाये दंत६ ॥२३॥
(१) तकिया मसनद । (२) गुजुवा । (३) होलका जो अग्नि से अमर समझी
जाती थी अपने भतीजे प्रहलाद भक्त को जलाने के लिये गोद में लेके आग में बैठी सो
आप ही जल गई और प्रह्लाद बच गये । (४) बढ़ाया । (५) खराबी । (६) राजा करन
के दान के समय सोना कम हो जाने पर अपना दाँत तोड़ डाला कि उसमें से जड़ा हुआ
सोना निकाल कर दान कर सकें ।
साँच का अंग ५५
महाभारत के जंग में पाँच उबारे पंड ।
जुगन जुगन की भक्तनी घंटा लै रख अंड १ ॥२४॥
साँचों के संगति रहै झूठों सेतीं दूर ।
परमेसुर करुना मई रहै सकल घट पूर ॥२५॥
बालमीक आये सुपच बजा पाँच-जन नाद ।
पंडों जग असुमेध में एकै पाया साध२ ॥२६॥
(१) भगवंत ने अरुही चिड़िया की प्रार्थना पर महाभारत के मैदान में उसके अंडों
की रक्षा के लिये हाथी का घंटा गिरा कर उन को ढाँक कर बचा दिया । (२) पांडवों के
राजसूय यज्ञ में यद्यपि पृथ्वी भर के सब ऋषीश्वर और मुनीश्वर और योगीश्वर आदि
उपस्थित थे पर श्रीक्रुशन का पंचजन्य शंख जो चिन्ह यज्ञ के सुफल होने का है नहीं बजा ।
राजा युधिष्ठिर ने कारण पूछा तो श्रीक्रुशन ने उत्तर दिया कि यह सब जो जमा हुए हैं
अहंकारी हैं इनमें कोई सच्चा भक्त नहीं है, जाओ बाल्मीकि नामक स्वपच अर्थात् डोम
को जो सच्चा भक्त और महात्मा है आदर सहित बुला लाओ तब यज्ञ सुफल होगा ।
यह सुनकर भीमसेन स्वपच को बुलाने को भेजे गये । भीमसेन ने अहंकार से स्वपच से
कहा कि चल तुझे राजा ने याद किया है । स्वपच ने जवाब दिया कि मैं पूजा पर बैठा
हूँ जरा माला मेरी खूँटी से उतार कर मुझे दे दीजिये तो जाप करके तुर्त चला आऊँ ।
भीमसेन ने कुभाव से माला को खूँटी से उतार कर देना चाहा पर यद्यपि उनको अस्सी
हजार हाथी का बल था उस माला को न उठा सके, फिर भी अहङ्कार न छूटा और नाक
भौँ चढ़ा कर बोले कि तूही उठ कर लेले मुझे देर होती है । जब भीमसेन लौट कर गये तो
श्रीक्रुशन से कहा कि महाराज स्वपच थोड़ी देर में हाजिर होता है । श्रीक्रुशन हँस कर
युधिष्ठिर से बोले कि आप खुद जाकर बुला लाइये । जब राजा युधिष्ठिर स्वपच के घर
पहुँचे तो उसे खिचड़ी पकाते पाया, बड़ी आधीनता से प्रार्थना की कि यज्ञ में सुशोभित
होकर उसे सुफल कीजिये । स्वपच बोला कि मैं तो नीच डोम यज्ञ में बैठने योग्य नहीं
हूँ पर राजा की आज्ञा सिर आँखों पर धरता हूँ जरा खिचड़ी खा लूँ । राजा ने जवाब
दिया सब काम से निपट लीजिये मुझे जल्दी नहीं है । स्वपच ने हाँडी से थोड़ी खिचड़ी
निकाल कर राजा के सामने धरी, राजा ने यह कह कर कि धन्य भाग उसके जिसे भक्तों
का प्रसाद मिले पूरे भाव से हाथ फैलाया परन्तु स्वपच ने अपना हाथ खींच लिया कि
ऐसा नहीं हो सकता और उठकर राजा के साथ हो लिया । जब यज्ञ में पहुँचा तो श्रीक्रुशन
ने पांडवों की स्त्री द्रोपदी से उत्तम उत्तम प्रकार के भोजन बनवा रक्खे थे जिसे थालों में
रुकमिणी जी ने सजाकर स्वपच के सामने धरा । स्वपच मीठे सलोने खट्टे इत्यादि सब
प्रकार के भोजन एक साथ सान कर मुंह में भरने लगा । यह तमाशा देख कर द्रोपदी के
जी में आया कि आखिर डोम मेरे पकाये हुए उत्तम खानों का स्वाद क्या जाने । इस
खयाल के उपजते ही स्वपच ने हाथ खींच लिया और पंचजन्य शंख जो उसके आते ही
बजने लगा था एक बारगी बन्द हो गया तब लोग फिर श्रीक्रुशन के समीप आये । श्रीक्रुशन
बोले कि द्रोपदी से पूछो कि उसके जी में क्या खयाल गुजरा । द्रोपदी बड़ी लज्जित
५६ गरीबदास जी की बानी
भेखों के लसकर फिरैं बानी चोर कठोर ।
सतगुर धाम न परसहीँ चौरासी के ढोर१ ॥२७॥
पारंगत२ परिचय नहीं बानी कहै बनाय ।
धरमराय दरगह३ सड़ै झूठा लतरी४ खाय ॥२८॥
कपटी कूँ भावै नहीं भगित मुक्ति की रीत ।
झूठा लंगर फिरत है साधों टोहत सीत५ ॥२६॥
साँचे सूरे संत हैं मरदाने जूझार६ ।
लाख दोस ब्यापै नहीं एक नाम की लार ॥३०॥
सत्त सुकृत अरु बंदगी जा उर ज्ञान विवेक ।
साध रूप साँईं मिले पूरन ब्रह्म अलेख ॥३१॥
सत्त सुकृत संतोप सर आधीनी अधिकार ।
दया धरम जा उर बसै सो साँईं दीदार ॥३२॥
आदि अंत मध संत हैं रंचक झूठ जहान ।
कपटी जुग जुग कपट है लख चौरासी खान ॥३३॥
साँचे कूँ संका नहीं झूठे भय घर माहिं ।
बिचार का अंग ५७
साहब सेती दोसती सन्तों सेती प्यार ।
तिन्ह को संका है नहीं धरमराय दरबार ॥३८॥
॥ बिचार का अंग ॥
ज्ञान बिचार न ऊपजै क्या मुख बोलै राम ।
संख बजावै बादई रते न निरगुन नाम ॥ १ ॥
ज्ञान बिचार बिबेक बिन क्यों दम तोरै स्वाँस ।
कहा होत हरि नाम सूँ जो दिल ना बिस्वास ॥ २ ॥
ज्ञान बिचार बिबेक बिन क्यों भौंकत है स्वान ।
दस योजन जल में रहै भीजत ना पाखान ॥ ३ ॥
ज्ञान बिचार बिबेक बिन क्यों रेंकत खर गीध ।
कहा होत हरि नाम सूँ जो मन नाहीं सीध ॥ ४ ॥
समझ बिचारे बोलना समझ बिचारे चाल ।
समझ बिचारे जागना समझ बिचारे ख्याल ॥ ५ ॥
करै बिचारै समझ कर खोज बूझ का खेल ।
बिना मथे निकसै नहीं है तिल अंदर तेल ॥ ६ ॥
जैसे तिल में तेल है यौं काया मध राम ।
कोल्हू में डारे बिना तत्त नहीं सहकाम ॥ ७ ॥
बिचार नाम है समझ का समझ न परी परख ।
अकलमंद एकै घना बिना अकल क्या लख ॥ ८ ॥
बिना बिचारे क्या लहै कस्तूरी भटकंत ।
बिन बूझे नहिं पाइये गाँव डगर मग पंथ ॥ ६ ॥
ज्ञान सफा के चौक में जहाँ बिचार बिबेक ।
कुटिलाई जिव बहुत हैं निरमल अंगा एक ॥१०॥
बिना बिचारे भरम है सुरपति सारखा होय ।
गौतम रिषि गुरुवा बड़े जा की पत्नी जोय१ ॥११॥
(१) बिना विचार के इन्द्र सरीखा दूषित हो जाता है जिसने अहिल्या के संग
प्रसङ्ग किया ।
द्वितीय खण्ड: सतलोक-वर्णन, काल-निरंजन माया भेद
५८ गरीबदास जी की बानी
बिना बिचारे बिचरता बैरागी सुकदेव ।
सप्त पुरी में गमन कर ढूँढ़े जनक बिदेह¹ ॥१२॥
गोरखनाथ सुनाथ है जंतर मंतर जोग ।
सतगुरु मिले कबीर से काटे दीरघ रोग² ॥१३॥
गँधरपसेन गदहा भया पुत्तर पिता सराप ।
बिना बिचारे पैठ माँ सुना उरबासी लाप³ ॥१४॥
जादो गये बिचार बिन भरमे छप्पन क्रोड़ ।
दुर्बासा से छल किया लागी मोटी खोड़⁴ ॥१५॥
(१) शुकदेव जी के पिता व्यास जी ने उनको बहुत समझाया कि घर के त्याग
करने से कुछ परमार्थ का काम नहीं बनता पर शुकदेव जी के मन में यह बात न बैठती थी
सातो पुरी इत्यादि की यात्रा करते ही रहे तब व्यासजी ने थक कर उनसे कहा कि
एक बेर राजा जनक से मिल लो फिर जो जी में आवे सो करो । शुकदेव जी राजी हुए
और राजा जनक के पास गये । राजा जनक को राज्य कार्य में फँसा हुआ देख कर इन
के मन से उनकी महिमा जाती रही । जब जनक ने पूछा कि कैसे आये तो उत्तर दिया
कि पिता जी से आपके ज्ञानी और विदेह होने की महिमा सुनी थी सो देख लिया और
हम तो बन में एकान्त वास करेंगे । इस पर राजा जनक ने अपने तपोबल से ऐसा
चमत्कार किया कि राज्य भवन में जहाँ वह बैठे थे बड़े जोर से आग लग गई । राजा
जनक निश्चिन्त बैठे अपना काम करते रहे परन्तु शुकदेव जी अपनी कोपीन और
कमंडल सम्हाल कर भागने लगे । इस पर राजा हँसे और कहा कि इसी को त्याग
कहते हो ! मेरा सब महल और माल जल रहा है सो मुझे फिकर नहीं है और तुम एक
लँगौटी के बचाने में बेचैन हो गये, याद रक्खो कि जितना तुम को अपनी लँगौटी
और कमण्डल का बन्धन है उतना मुझे अपने सकल राज का नहीं है । त्याग मन में
होता है तन से नहीं, जब तुम्हारे संग तन, दसों इन्द्री, मन और पंच भूत का कुटुम्ब
लगा है तो बाहरी कुटुम्ब के त्याग से क्या होता है । शुकदेव जी यह सुन कर बहुत
लज्जित हुए और फिर बन बास का ख्याल छोड़ दिया । (२) गोरखनाथ जी कबीर साहब
का नाम सुन कर उनकी परीक्षा के अभिप्राय से काशी में आये और आकाश में त्रिशूल
पर आसन मार कर बैठे और कबीर साहब को आवाज दी कि यहीं आवो तो वार्तालाप
करें । कबीर साहब ने जवाब दिया कि आप बड़े सिद्ध हैं मैं तो महा अधम हूँ क्योंकर
आप तक पहुँच सकता हूँ । फिर कबीर साहब ने सत्यलोक में जो पिण्ड और ब्रह्मांड के
परे है आसन लगाकर गोरखनाथ को दया से दर्शन दिये । गोरखनाथ चकित हो गये
और कबीर साहब के पूरे सतगुरु होने के कायल होकर चरणों पर गिरे यह कबीर
गोरख की गोष्ठी में प्रसिद्ध कथा है ।
(३) राजा गन्धर्पसेन को उरबसी अप्सरा का गान सुनकर मोहित होने से गदहे
का चोला धारण करना पड़ा। (४) खोड़ = बड़ा अपराध—एक समय दुर्बासा ऋषि