गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 53, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंगत का अंग ४५
संगत सुर की जो रहै असुरों की है गंध।
सुर हैं स्वर्गलोक के असुर मलीने जिंद ॥६॥
सूआ सतगुरु कहत है पिंजरे परे परान।
खिड़की खुलते उड़ गया मंतर लगा न कान ॥७॥
अंतर हेत न प्रीत पद सूए ज्यों संसार।
पिंजरा खाली तासु का उड़ गया बनों मँझार ॥८॥
सत गुर दत दाता१ कहै बानी बड़ी बलंद।
मुख बोले क्या होत है अंतर हेत न अंध ॥६॥
सुअटा खाली रह गया पार पहुँचा नाहिं।
राम राम प्रानी कहै जम की नगरी जाहिं ॥१०॥
सुअटा पढ़ै सुभान गत अंतर नहीं उचार।
कुंज२ कुरल३ अंड पोखहीं कोसन सहस हजार ॥११॥
कुरल अंड हर हेत जप अललपच्छ गहि तार।
हिरदा सुद्ध सरीर सर४ कच्छप दृष्ट निहार ॥१२॥
ऐसी संगत जो मिलै तौ सांई सूँ भेट।
ऊपरली बरबाद है जम मारैगा फेट ॥१३॥
कुरला कच्छप अलल कूँ किन समझाया ज्ञान।
आड़ा परदा है नहीं हिरदे अंतर ध्यान ॥१४॥
ऐसी संगत जो मिलै भगत गर्भ प्रहलाद५।
नारद से सतगुरु मिलैं सूझै अगम अगाध ॥१५॥
सुकदे गर्भ जोगेश्वर५ ध्रुव का ध्यान अमान।
लाख बरस के बह गये पाँच बरस परवान ॥१६॥
जैसे मीन समुद्र में दसो दिसा कूँ जाय।
हृदय कमल में पैठ कर जो खोजै सो पाय ॥१७॥
(१) तोता के पढ़ाने की बोली। (२) कुंजबन चिड़िया। (३) कोक चिड़िया।
(४) तालाब। (५) कहते हैं कि प्रहलाद और सुकदेव माँ के पेट से भक्त पैदा हुए।
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