गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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सतगुरु संगत सार है सकल कुसँंग सब जीव ।
पानी में निकसै नहीं अनेक जतन कर घीव ॥२२॥
परमानंद से बिछुड़ता यह मन हंसा काग ।
मुक्ति नहीं सतगुरु बिना कहाँ छिपै लै दाग ॥२३॥
कमरी के रंग ना चढ़ै कोइला नहीं सफेद ।
सतगुरु बिन सूझै नहीं कहा पढ़त है बेद ॥२४॥
कौड़ी बदले जात है यह मानिक नग हंस ।
पाँचो सेती बँध रहा जुग जुग होत बिधंस ॥२५॥
पाँच पचीस कुसंगनी सुन्न सिखर नहिं न्हाहिं ।
सतगुरु सूँ मेला नहीं यों चौरासी जाहिं ॥२६॥
सतगुरु सूरत नगर से आये हैं बड़ काज ।
काम कदर जानै नहीं हंसा चढ़ै जहाज ॥२७॥
कस्तूरी को बासना मिरगा लेत सुबास ।
निरख परख आवै नहीं बहुरि ढँढोरै घास ॥२८॥
कस्तूरी महकंत है साहब है संबूह ।
नौका चढ़ै न नाम की अंधे डूबत कूँह ॥२६॥
॥ संगत का अंग ॥
संगत कीजै साध की संसारी भटकंत ।
पिंजर सूआ बसत है किस कूँ बूझै पंथ ॥ १ ॥
सतगुरु की संगत भली हंसा थीर मुकाम ।
जुगन जुगन के बीछुरे परसे लोक निदान ॥ २ ॥
साधौँ की संगत करै बड़ भागी बड़ देव ।
आपन तौ संसा नहीं और उतारै खेव ॥ ३ ॥
संगत सुर की कीजिये असुर न आवै होस ।
बुध भ्रष्टी सूँ संग क्या उलटा देही दोस ॥ ४ ॥
संगत सुर की कीजिये असुरन सूँ क्या हेत ।
डार मूल पावै नहीं ज्यों मूली का खेत ॥ ५ ॥