गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ गरीबदास जी की बानी
ये पुरपट्टन ये गली बहुरि न देखै आय।
सतगुरु सूं सौदा हुआ लीजै माल लदाय ॥१४॥
ये मुकते१ निज पैठ हैं ये मुकते बाजार।
सतगुरु सूं सौदा भया भरले बालद२ लार ॥१५॥
राम नाम निज सार है राम नाम निज मूल।
राम नाम सौदा करो राम नाम नहिं भूल ॥१६॥
इस दुनियाँ में आय कर इन चारों कूँ बंध।
काम क्रोध छोह चूहरा३ लोभ लपटिया अंध ॥१७॥
मोह मवासी पकर ले ममता का सिरताज।
दुरमत दामनगीर होइ निःचल नगरी राज ॥१८॥
ज्ञान जोग अरु भगित ले सील संतोष समाधि।
लै लागी तब जानिये छूटै सकल उपाधि ॥१९॥
ज्ञान जोग अरु भगित ले सील संतोष बिबेक।
लै लागी तब जानिये जब दिल आवै एक ॥२०॥
गगन गरज भाठी चुए हीरा घंटिक सार।
लै लागी तब जानिए उतरै नहीं खुमार ॥२१॥
गगन गरज भाटी झरै चोखा फूल चुअंत।
सिर के साँटे पाईये कोई साधु पिअंत ॥२२॥
गगन गरज घन बरषहीं बाजै दीरघ नाद।
अमरापुर आसन करैं जिन्ह के मते अगाध ॥२३॥
गगन गरज घन बरषहीं बाजै अनहद तूर।
लै लागी तब जानिये सन्मुख सदा हजूर ॥२४॥
गगन गरज घन बरषहीं दामिन खिमै अखंड।
दास गरीब कबीर है सकलदीप नौ खंड ॥२५॥
(१) अनेक। (२) बैल। (३) भंगी।