गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 57, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंबिनती का अंग ४६
बैराग नाम है त्याग का पाँच पचीसौ संग ।
ऊपर की केंचुल तजी अंतर बिषय भुअंग ॥ २ ॥
असन बसन सब तज गये तज गये गाँव गिरेह ।
माहें संसा मूल है दुरलभ तजना येह ॥ ३ ॥
बाज कुही१ गत ज्ञान की गगन गरज गरजंत ।
लूटै सुन्न अकास तें संसा सरप भछंत ॥ ४ ॥
नित ही जामै नित मरै संसय माहिं सरीर ।
जिनका संसा मिट गया सो पीरन सिर पीर ॥ ५ ॥
ज्ञान ध्यान दो सार है तीजे तत्त अनूप ।
चौथे मन लागा रहै सो भूपन सिर भूप ॥ ६ ॥
कासी करवत लेत है आन कटावै सीस ।
बन बन भटका खात है पावत ना जगदीस ॥ ७ ॥
संसा तो संसार है तन पर धारै भेख ।
मरकब२ होहिं कुम्हार के सन्यासी अरु सेख ॥ ८ ॥
मन की भीनी ना तजी दिलही माहिं दलाल ।
हर दम सौदा करत है करम कुसङ्गति काल ॥ ६ ॥
मन सेती खोटी गढ़ै तन सूँ सुमिरन कीन ।
माला फेरे क्या हुआ दुर कुट्टन बेदीन ॥ १० ॥
तन मन एक वजूद कर सुरत निरत लौ लाय ।
बेड़ा पार समुद्र होइ एक पलक ठहराय ॥ ११ ॥
दृष्टि पड़े तो फना३ है धर४ अंबर५ कैलास६ ।
किरतम बाजी झूठ है सुरत समोवो स्वाँस ॥ १२ ॥
सुरत स्वाँस कूँ एक कर कंज७ किनारे लाय ।
जा का नाम बिराग है पाँच पचीसो खाय ॥ १३ ॥
(१) शिकरा । (२) कुम्हार के लादने के जानवर यानी गधे । (३) नाश होने वाला
है । (४) धरती । (५) आकाश । (६) स्वर्गादि । (७) शिव-नेत्र ।