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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 54

४६ गरीबदास जी की बानी
ज्यों कुंजर सिर धुनत है अगला१ जनम सुझंत ।
अबकी हेले२ नर करे तो सेऊँ पूरे संत ॥१८॥
राज दुआरे जाय कर रापत३ रोवै काहि ।
पग जंजीर न डारिये कजली बन कूँ जाहि ॥१९॥
सीस महावत बसत है अंकुस मोड़ समोड़ ।
बचन फिरत है पलक में साँईं नाहीं लोड़४ ॥२०॥
ऐसा हाफिज५ फील है रहत गयंद गियान ।
राज दुआरे बन्धिया बिन साँईं के ध्यान६ ॥२१॥
सुन्न समुद जो मन रहै तो नहि भरमै प्रान ।
अरस कुरस से भिन्न है देखे अकल अमान ॥२२॥
सुन्न सरोवर सिखर सर सूभर७ तालम ताल ।
मन मरजीया छोड़िये लावै हीरा लाल ॥२३॥
सुन्न सरोवर सैर कर गगन उड़ाना मन्न ।
अगम भूमि भूलै नहीं लावै नाम रत्न ॥२४॥
सुन्न सिखर संगत करै मूलै खोज न पंथ ।
फेर उलट हटिहै नहीं रावत जेहा दंत८ ॥२५॥
सती पुकारै सर९ चढ़ी मुख बोलत है राम ।
कौतुक देखन सो गये जिनके मन सहकाम ॥२६॥
सती जरै अरु सर जरै कौतुक१० देखनहार ।
धाम जहाँ का तहाँ है मिलै रूप संसार ॥२७॥
सती बहुर उपजै नहीं घर जाने की प्रीत ।
सती रटत है राम कूँ कौतुक गावै गीत ॥२८॥
(१) पुरवला । (२) बार । (३) हाथी । (४) इच्छा । (५) कुरान को याद किये हुए ।
(६) मशहूर है कि हाथी को अपना पिछला जन्म याद रहता है कि मैं कौन था और
भगवन्त को भूल जाने से पशु जोनि पाई इसी सोच में हाथी खड़ा खड़ा अपना शरीर
और सिर धुनता है और प्रण करता है कि अगले जन्म में जो दया से मनुष्य तन पाऊँगा
तो मालिक को कभी न बिसारूँगा । (७) शुभ्र = प्रकाशमान । (८) जैसे हाथी के दाँत
बाहर निकले हुए फिर भीतर नहीं पैठते । (९) चिता । (१०) तमाशाई ।