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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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४८ गरीबदास जी की बानी
तप तारी तन में लगी परगन१ की तकसीस ।
साहब की नहिं बंदगी सतगुरु ना बकसीस ॥४१॥
मन इच्छा नित तू करै राज करन मन लोभ ।
बहु विध घट में कामना ज्यों बिरछा पर गोभ२ ॥४२॥
सँगत कुसंगत अंतरा इकसाँ ही मत जान ।
ज्यों सोवत है सेज पर त्यों धरे अंत मसान ॥४३॥
पारख३ प्रेम न आवही ना कहिं हाट जुखंत ।
सौदा तबहीं होत है भेटैं सतगुरु संत ॥४४॥
जैसे माता गर्भ को राखै जतन बनाय ।
ठेस लगै तो छीन है ऐसे भगति दुराय४ ॥४५॥
दम सुमार आधार रख पलकों मद्ध धियान ।
संतों की संगति करै समझ बूझ गुरु ज्ञान ॥४६॥
इड़ा पिंगला सोध कर चढ़ गिरवर कैलास ।
दो दल की घाटी जहाँ भगल बिदाहै२ दास ॥४७॥
ब्रह्म रंध्र के द्वार को खोलत है कोइ एक ।
द्वारे से फिर जात हैं ऐसे बहुत अनेक ॥४८॥
संख भगल छल होत है नद है परले पार ।
संगत सतगुरु की करै तब पावै दीदार ॥४६॥
संसारी सूँ साख क्या ऊसर बरषा देख ।
बोवै बीज न खेत हित तो क्या काटै मेख ॥५०॥
नाम रते निरगुन कला मानस नहीं मुरार६ ।
ज्यों पारस लोहा लगै कटिहै करम लगार ॥५१॥
॥ बैराग का अंग ॥
बैराग नाम है त्याग का पाँच पचीसौ माहिं ।
जब लग संसा सरप है तब लग त्यागी नाहिं ॥ १ ॥
(१) परगना । (२) नया कुला । (३) परखने में । (४) छिपाय । (५) घास निकालने
के लिए खेत को फिर से जोतने का नाम । (६) मुराद ।