गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंगत का अंग ४७
जनम पुरबला सूझई जरिहैं बारंबार ।
बिषय बासना उर बसै तक कूँ करिहैं छार ॥२६॥
सती न संका जरन की काम लुब्ध१ घट बीच ।
सकल सखी झूलन चलीं जैसे सावन तीज ॥३०॥
जनम इक्कीस जो सँग जरै तौ स्वर्गापुर बास ।
मन इच्छा फल पावहीं पुरुष समीप निवास ॥३१॥
नारी पुरुष पिरेम सँू बैठे स्वर्ग अकास ।
नव करोर दिब२ बरस लग पुरवत मन की आस ॥३२॥
करनी भरनी भुगत कर पैठत हैं मृत लोक ।
बिना भगित भावै नहीं सब संगत में दोष ॥३३॥
तपी तपै तन कूँ दहै पाँचो इंद्री साध ।
नहिं इच्छा दीदार की भूले आदि अनाद ॥३४॥
लाख बज्र कूँ झेल कर सूरे जूझैं खेत ।
बादी जोगी हठ करें चिनगी बरखै रेत ॥३५॥
बादी जोगी बँध रहा मन इच्छा बड़ राज ।
अंत बेर यों मारिये ज्यों तीतर पर बाज ॥३६॥
तन तो बाँबी हो गया मन की गई न बान ।
स्वर्ग पहुँच दोजख गये सतगुरु लगे न कान ॥३७॥
तन की तारी लावई मनसा जरै मसाल ।
राज पाय नरकै परै बाँधी पोट जवाल३ ॥३८॥
पाँचो इंद्री मन छठा फिरता डाँवाँडोल ।
सप्तपुरी का राज तज लगे तपस्या झोल ॥३६॥
तप से धीर न होत है यह मन रंगा राज ।
साहब की नहिं बंदगी साजा झूठा साज ॥४०॥
(१) लोभ । (२) देवताओं का बरस । (३) खराबी ।